हर साल 15 अगस्त को पूरे देश की निगाहें दिल्ली के ऐतिहासिक लाल किले पर टिकी होती हैं। यहीं से प्रधानमंत्री तिरंगा फहराते हैं और राष्ट्र को संबोधित करते हैं। लेकिन क्या आपने कभी सोचा है कि स्वतंत्रता दिवस के इस सबसे बड़े समारोह के लिए लाल किले को ही क्यों चुना गया? दरअसल, यह किला भारत के गौरवशाली इतिहास, आजादी के संघर्ष और राष्ट्रीय स्वाभिमान का प्रतीक है। इसकी ऐतिहासिक विरासत ही इसे स्वतंत्रता दिवस के आयोजन का सबसे खास स्थल बनाती है।
लाल किला बना कैसे?
लाल किले का निर्माण मुगल सम्राट शाहजहां ने वर्ष 1638 में शुरू कराया था, जो करीब 11 साल बाद 1649 में पूरा हुआ। शुरुआत में इसे ‘किला-ए-मुबारक’ कहा जाता था, लेकिन लाल बलुआ पत्थरों से बनी इसकी भव्य दीवारों के कारण यह लाल किला के नाम से प्रसिद्ध हो गया। यह सिर्फ एक ऐतिहासिक इमारत नहीं, बल्कि मुगल शासन की सत्ता का प्रमुख केंद्र था और लंबे समय तक दिल्ली साम्राज्य की राजधानी भी रही।
18वीं सदी में लगातार हुए मराठा, जाट, सिख और गुर्जर हमलों से मुगल साम्राज्य कमजोर पड़ गया। इसी मौके का फायदा उठाते हुए अंग्रेजों ने 1803 में दिल्ली पर कब्जा कर लिया। उन्हें अच्छी तरह पता था कि लाल किला सिर्फ एक किला नहीं, बल्कि सत्ता और शासन का सबसे बड़ा प्रतीक है। इसलिए दिल्ली पर नियंत्रण के साथ-साथ लाल किले पर कब्जा बनाए रखना भी ब्रिटिश शासन के लिए बेहद अहम था। बाद के वर्षों में यही किला अंग्रेजी हुकूमत की ताकत का प्रतीक बन गया।
1857 की क्रांति ने बदल दी लाल किले की पहचान
1857 की क्रांति ने लाल किले को आजादी के संघर्ष का सबसे बड़ा प्रतीक बना दिया। जब विद्रोही सैनिक दिल्ली पहुंचे, तो उन्होंने अंतिम मुगल सम्राट बहादुर शाह जफर को अपना नेता घोषित किया। हालांकि अंग्रेजों ने विद्रोह को कुचलते हुए बहादुर शाह जफर को गिरफ्तार कर रंगून निर्वासित कर दिया और उनके बेटों की हत्या कर दी। इसके बाद ब्रिटिश शासन ने लाल किले के कई हिस्सों को ध्वस्त कर दिया और यहां मौजूद शाही धरोहरों को लूट लिया। तभी से लाल किला केवल मुगल शासन की पहचान नहीं, बल्कि अंग्रेजी हुकूमत के खिलाफ भारतीयों के संघर्ष और बलिदान का प्रतीक भी बन गया।
नेताजी और आजाद हिंद फौज का नारा “चलो दिल्ली”
आजादी की लड़ाई में लाल किले का महत्व तब और बढ़ गया, जब नेताजी सुभाष चंद्र बोस के नेतृत्व में आजाद हिंद फौज (INA) ने अंग्रेजों के खिलाफ निर्णायक संघर्ष छेड़ा। नेताजी के प्रसिद्ध नारे “चलो दिल्ली” का लक्ष्य केवल राजधानी तक पहुंचना नहीं, बल्कि लाल किले पर तिरंगा फहराकर भारत की आजादी का संदेश देना भी था। तभी से लाल किला स्वतंत्रता और राष्ट्रीय गौरव का एक मजबूत प्रतीक बन गया।
द्वितीय विश्व युद्ध के बाद अंग्रेजों ने आजाद हिंद फौज (INA) के तीन प्रमुख अधिकारियों—प्रेम सहगल, गुरबख्श सिंह ढिल्लों और शाहनवाज खान—पर लाल किले में ऐतिहासिक मुकदमा चलाया। इस ट्रायल ने पूरे देश में ब्रिटिश शासन के खिलाफ जनाक्रोश को और तेज कर दिया, जिससे स्वतंत्रता आंदोलन को नई ऊर्जा मिली। इतिहासकारों के अनुसार, आजादी के बाद लाल किले को भारतीय सम्मान और स्वाभिमान के प्रतीक के रूप में फिर से स्थापित करना बेहद महत्वपूर्ण माना गया।
नेहरू और वह ऐतिहासिक पल
1947 में देश की आजादी के साथ लाल किला नए भारत की पहचान बन गया। आजादी के बाद पंडित जवाहरलाल नेहरू ने लाल किले से तिरंगा फहराकर देश को नया संदेश दिया। हालांकि, इतिहासकारों के अनुसार 15 अगस्त 1947 को उन्होंने सबसे पहले तिरंगा दिल्ली के प्रिंसेज पार्क में फहराया था, जबकि लाल किले पर ध्वजारोहण 16 अगस्त को हुआ। तभी से हर वर्ष स्वतंत्रता दिवस पर प्रधानमंत्री लाल किले की प्राचीर से तिरंगा फहराते हैं और राष्ट्र को संबोधित करने की परंपरा निभाई जाती है।
लाल किला आज भी क्यों अहम है?
लाल किले का इतिहास भारत की सत्ता, संघर्ष और आजादी की पूरी यात्रा को दर्शाता है। कभी यह मुगल साम्राज्य की ताकत का केंद्र था, फिर 1857 की क्रांति और आजाद हिंद फौज के ऐतिहासिक मुकदमों का गवाह बना। आजादी के बाद यही किला स्वतंत्र भारत की संप्रभुता और राष्ट्रीय गौरव का प्रतीक बन गया। यही कारण है कि हर साल 15 अगस्त को लाल किले पर फहराया जाने वाला तिरंगा सिर्फ एक परंपरा नहीं, बल्कि देश के संघर्ष, बलिदान और आजादी की अमर गाथा का प्रतीक माना जाता है।

