एन चंद्रशेखरन ने 1987 में TCS में इंटर्न के तौर पर अपने करियर की शुरुआत की थी। अपनी मेहनत और नेतृत्व क्षमता के दम पर वे 2009 में TCS के CEO और 2017 में टाटा संस के चेयरमैन बने। उनके नेतृत्व में टाटा ग्रुप ने एयर इंडिया के अधिग्रहण और डिजिटल विस्तार जैसे कई बड़े फैसले लिए। करीब तीन दशक तक समूह को अपनी सेवाएं देने के बाद अब चंद्रशेखरन के टाटा ग्रुप से विदाई लेने की खबर चर्चा में है।
उन्होंने कहा है कि फरवरी 2027 में मौजूदा कार्यकाल पूरा होने के बाद वह तीसरे कार्यकाल के लिए आवेदन नहीं करेंगे। उनके इस फैसले के पीछे टाटा ट्रस्ट्स के चेयरमैन नोएल टाटा के साथ मतभेद और समूह के भीतर गवर्नेंस को लेकर खींचतान को एक वजह माना जा रहा है। ऐसे में सवाल उठता है कि टाटा समूह के दो ताकतवर चेहरों के बीच दरार क्यों पड़ी और इसका असर आने वाले दिनों में समूह की कंपनियों पर क्या होगा?
चंद्रशेखरन ने क्यों लिया पद छोड़ने का फैसला?
कंपनी से जुड़े सूत्रों के मुताबिक, एन. चंद्रशेखरन के तीसरे कार्यकाल से पीछे हटने की बड़ी वजह नोएल टाटा के साथ बढ़ते मतभेद और टाटा समूह में जारी अंदरूनी खींचतान मानी जा रही है। बताया जा रहा है कि 18 अगस्त की AGM में उनके कार्यकाल को लेकर विवाद की आशंका थी। ऐसे में चंद्रशेखरन ने किसी संभावित टकराव से पहले ही अपने तरीके से पद छोड़ने का फैसला किया।
पिछले छह महीने में बढ़ गया था टकरार
नोएल टाटा और एन. चंद्रशेखरन के बीच मतभेदों की चर्चा पिछले करीब छह महीनों से चल रही थी। इसकी पहली बड़ी झलक 24 फरवरी को सामने आई, जब टाटा संस बोर्ड ने चंद्रशेखरन के कार्यकाल को अगले पांच साल के लिए बढ़ाने का फैसला टाल दिया। माना जाता है कि नोएल टाटा ने समूह की कुछ कंपनियों के घाटे, पूंजी निवेश और टाटा संस को अनलिस्टेड रखने जैसे मुद्दों पर आपत्ति जताई थी। बोर्ड में सर्वसम्मति नहीं बनने के बाद चंद्रशेखरन ने खुद प्रस्ताव टालने की पेशकश की, जिसके बाद से उनकी अगली पारी को लेकर असमंजस बना रहा।
इन कारणों के चलते नाखुश थे नोएल टाटा
जानकारों के मुताबिक, नोएल टाटा और एन. चंद्रशेखरन के बीच मतभेद सिर्फ कारोबारी रणनीति तक सीमित नहीं थे, बल्कि टाटा समूह के भविष्य को लेकर दोनों की सोच भी अलग थी। नोएल टाटा की ओर से समूह की कुछ कंपनियों के घाटे, पूंजी आवंटन और टाटा संस को अनलिस्टेड रखने को लेकर चिंताएं जताई जाती रही हैं। वहीं, चंद्रशेखरन को आधुनिक कॉर्पोरेट गवर्नेंस और कारोबारी विस्तार की सोच से जोड़कर देखा गया। ऐसे में दोनों के बीच टकराव को टाटा समूह की पारंपरिक विरासत और आधुनिक कारोबारी दृष्टिकोण के बीच मतभेद के तौर पर देखा जा रहा है।
अनलिस्टेड कंपनियों का बढ़ा नुकसान
चंद्रशेखरन के कार्यकाल में टाटा ग्रुप की लिस्टेड कंपनियों का प्रदर्शन मजबूत रहा और मार्केट कैप करीब 27 लाख करोड़ रुपये तक पहुंचा। लेकिन दूसरी ओर FY26 में एयर इंडिया, टाटा डिजिटल समेत 8 अनलिस्टेड कंपनियों को कुल 33,538 करोड़ रुपये का घाटा हुआ। इसी दौरान टाटा संस के चेयरमैन के तौर पर चंद्रशेखरन की सालाना सैलरी FY18 के 55.11 करोड़ से बढ़कर FY26 में 158.66 करोड़ रुपये हो गई। बढ़ते घाटे और बढ़ती एग्जीक्यूटिव सैलरी के बीच इस अंतर ने टाटा संस में कैपिटल एलोकेशन, गवर्नेंस और जवाबदेही को लेकर सवाल खड़े किए।
रतन टाटा के मौत के बाद बिगड़ा समीकरण
अक्टूबर 2024 में रतन टाटा के निधन के बाद नोएल टाटा के नेतृत्व में टाटा ट्रस्ट्स के भीतर गवर्नेंस और बोर्ड में प्रतिनिधित्व को लेकर मतभेद उभरने लगे। मेहली मिस्त्री के बाहर होने और वरिष्ठ ट्रस्टियों के बीच खींचतान ने समूह के शीर्ष स्तर पर बढ़ती असहमति को सामने ला दिया। हालांकि, जानकारों के मुताबिक इस पूरे विवाद की जड़ में कॉर्पोरेट गवर्नेंस, ट्रस्टियों की नियुक्ति, बोर्ड प्रतिनिधित्व, टाटा संस की संभावित लिस्टिंग और अनलिस्टेड कंपनियों का प्रदर्शन जैसे मुद्दे प्रमुख रहे।
अब आगे क्या होगा?
अब सबकी नजर टाटा संस के अगले चेयरमैन पर है। चंद्रशेखरन के उत्तराधिकारी की तलाश शुरू हो चुकी है और इस प्रक्रिया में टाटा ट्रस्ट्स व नोएल टाटा की भूमिका अहम मानी जा रही है। नए चेयरमैन के सामने कारोबार को आगे बढ़ाने के साथ टाटा संस और टाटा ट्रस्ट्स के बीच बेहतर तालमेल, बड़े निवेशों की जवाबदेही और समूह की भविष्य की रणनीति तय करने की चुनौती होगी।

