15 अगस्त 1947 को आजादी के वक्त भारत आर्थिक चुनौतियों से घिरा एक नवोदित देश था। पश्चिमी देशों में कई लोगों को आशंका थी कि भारत ज्यादा समय तक एकजुट नहीं रह पाएगा। लेकिन आजादी के 80 साल बाद भारत ने अपनी मजबूती, विकास और आत्मनिर्भरता के दम पर उन सभी आशंकाओं को गलत साबित कर दिया है।
आजादी के बाद भारत को बंटवारे और कई युद्धों जैसी चुनौतियों से जूझना पड़ा। उस समय हथियारों, सैन्य उपकरणों और रक्षा तकनीक के लिए देश काफी हद तक विदेशी ताकतों पर निर्भर था। शुरुआती दौर में घरेलू रक्षा उद्योग सीमित था, लेकिन 80 साल में भारत ने लंबी छलांग लगाई है। आज देश अपनी रक्षा जरूरतों को पूरा करने के साथ-साथ सैन्य उपकरणों के निर्यात की दिशा में भी तेजी से आगे बढ़ रहा है।
आज भारत रक्षा क्षेत्र में आत्मनिर्भरता की नई मिसाल पेश कर रहा है। देश युद्धपोत, लड़ाकू विमान, हेलीकॉप्टर, तोप, रडार, मिसाइल और ड्रोन बनाने के साथ इन्हें दूसरे देशों को भी निर्यात कर रहा है। वित्त वर्ष 2025-26 में रक्षा निर्यात रिकॉर्ड ₹38,424 करोड़ पर पहुंच गया, जो पिछले साल के मुकाबले 62.66% ज्यादा है। भारतीय रक्षा उत्पाद अब 80 से अधिक देशों तक पहुंच रहे हैं, यानी कभी आयात पर निर्भर भारत आज दुनिया के रक्षा बाजार में अपनी जगह बना रहा है।
गोलियों को मोहताज भारत
1962 के चीन युद्ध ने भारत की रक्षा तैयारियों की कई कमजोरियां उजागर कर दीं। गोला-बारूद और जरूरी सैन्य उपकरणों के लिए निर्भरता ने देश को बड़ा सबक दिया। भारत ने इन चुनौतियों से सीखते हुए स्वदेशी रक्षा क्षमता मजबूत करने पर जोर दिया। इसी दिशा में DRDO की स्थापना ने देश में रक्षा अनुसंधान और तकनीक के विकास को नई मजबूती दी।
मिसाइलों वाले भारत की नींव
DRDO के गठन के बाद भारत ने मिसाइल, रडार, टैंक, विमान और इलेक्ट्रॉनिक रक्षा तकनीक के स्वदेशी विकास पर तेजी से काम शुरू किया। 1983 में शुरू हुए इंटीग्रेटेड गाइडेड मिसाइल डेवलपमेंट प्रोग्राम ने इस प्रयास को नई दिशा दी। इसके तहत पृथ्वी, अग्नि, आकाश, त्रिशूल और नाग जैसी मिसाइल प्रणालियों पर काम हुआ। तकनीकी पाबंदियों और सीमित संसाधनों के बावजूद इस कार्यक्रम ने भारत की स्वदेशी मिसाइल क्षमता की मजबूत नींव रखी।
उद्योगों के दम पर बदली तस्वीर
लंबे समय तक भारत का रक्षा उत्पादन सरकारी संस्थानों और सार्वजनिक क्षेत्र की कंपनियों तक सीमित रहा, लेकिन 1990 के दशक के बाद निजी क्षेत्र के लिए भी रास्ते खुलने लगे। आज टाटा, एलएंडटी, भारत फोर्ज, महिंद्रा और अडानी जैसी कंपनियां रक्षा क्षेत्र में अहम भूमिका निभा रही हैं। आधुनिक युद्ध में ड्रोन, रडार, सेंसर, इलेक्ट्रॉनिक्स, सॉफ्टवेयर और साइबर तकनीक की बढ़ती जरूरत ने इस भागीदारी को और महत्वपूर्ण बना दिया है। वित्त वर्ष 2025-26 में भारत का रक्षा उत्पादन रिकॉर्ड ₹1.78 लाख करोड़ पहुंचा, जिसमें निजी क्षेत्र की हिस्सेदारी करीब 24% रही।
2014 के बाद हुआ कायापलट
भारत के रक्षा उद्योग की नींव भले ही कई दशक पहले रखी गई हो, लेकिन 2014 के बाद आत्मनिर्भरता पर खास जोर दिया गया। इसका असर आंकड़ों में साफ दिखता है। 2014-15 में करीब ₹46,429 करोड़ का रक्षा उत्पादन 2025-26 में बढ़कर ₹1.78 लाख करोड़ पहुंच गया, यानी करीब चार गुना बढ़ोतरी। वहीं रक्षा निर्यात ₹686 करोड़ से बढ़कर ₹38,424 करोड़ हो गया। यानी जो भारत कभी हथियारों के लिए विदेशों पर निर्भर था, वह अब अपनी रक्षा तकनीक दुनिया तक पहुंचा रहा है।
2020 के बाद आत्मनिर्भरता बनी रणनीति
2020 के बाद भारत की रक्षा खरीद नीति में स्वदेशीकरण पर खास जोर दिया गया। रक्षा अधिग्रहण प्रक्रिया में भारतीय डिजाइन और निर्माण को प्राथमिकता देने के साथ कई सैन्य उपकरणों के आयात पर चरणबद्ध रोक के लिए स्वदेशीकरण सूचियां जारी की गईं। इसके अलावा iDEX जैसी पहलों ने रक्षा क्षेत्र में स्टार्टअप और नई तकनीकों को बढ़ावा दिया। आज करीब 16,000 MSME देश के घरेलू रक्षा उद्योग को मजबूत करने में योगदान दे रहे हैं।
मिसाइल एक्सपोर्टर भारत
ऑपरेशन सिंदूर के दौरान भारत की स्वदेशी रक्षा क्षमता और सैन्य ताकत का प्रभाव दुनिया ने देखा। ब्रह्मोस मिसाइल की क्षमता ने खास तौर पर सबका ध्यान खींचा। अब कई देश भारत से ब्रह्मोस और अन्य रक्षा प्रणालियां खरीदने में रुचि दिखा रहे हैं। यह भारत की बढ़ती रक्षा आत्मनिर्भरता और वैश्विक स्तर पर मजबूत होती सैन्य साख का संकेत है।

