कोरोना और चुनाव की जंग में क्या ज्यादा जरुरी?

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अनलॉक शुरू होने के ऐलान से लगने लगा था कि जिंदगी पटरी पर लौटने लगेगी। लेकिन पटरी पर आते-आते ऐसी अफरातफरी मची कि एक-एक कर राज्य के 14 जिलों में लॉकडाउन फिर से लागु करने पड़े। यह संख्या और बढ़ने की उम्मीद है। हालात देख चुनाव को लेकर भी चर्चा गर्म है कि समय पर हो भी पाएंगे या नहीं? जहाँ एक तरफ सत्ता पक्ष समय पर चाहता है वहीँ दूसरी तरफ विपक्ष इस माहौल को अनुकूल नहीं मान रहा। दोनों के अपने-अपने तर्क हैं और उसी के सहारे एक-दूसरे पर वे हमलावर हैं। बीच में फंसी है जनता, जो बयानबाजी और कोरोना की बढ़त पर निगाहें टिका, दोनों को तौल रही है। चुनाव आयोग इन सबसे इतर अपनी तैयारी में जुटा है। उसका दावा है कि वह पूरी तरह से तैयार है चुनाव कराने को। अब निर्भर कोरोना पर है कि वह होने देगा या नहीं।

जैसे-जैसे चुनाव कि घड़ी नजदीक आ रही है, कोरोना भी अपनी रफ़्तार तेजी से बढ़ा रहा है। शायद अनलॉक में इसे पनपने का बेहतर मौका मिला। आज बारह हजार से ज्यादा के इस आंकड़े का एक चौथाई ही था लॉकडाउन में। बाकी बढ़ोतरी लोगों के बाहर निकलने से हुई। अगली सरकार का चयन नवंबर में होना है, इसलिए अब समय भी ज्यादा नहीं है, जबकि हालात बदतर ही होते जा रहे हैं। इसलिए चुनाव के समय को लेकर चर्चाएं आम हो चली हैं। सत्ता पक्ष यानी JDU व BJP (LJP छोड़कर) नहीं चाहती है कि यह टले, जबकि RJD का टालने पर जोर है। उसका कहना है कि लोगों की जिंदगी पहले है सत्ता बाद में। वहीं JDU व BJP यह कहकर हमलावर हैं कि RJD की जमीन खिसक गई है, इसलिए चुनाव से डर रहा है। RJD के अनुसार JDU राष्ट्रपति शासन नहीं चाहता, इसलिए चुनाव-चुनाव चिल्ला रहा है। RJD के अलावा HAM के जीतनराम मांझी, पप्पू यादव, कांग्रेस सभी चुनाव न कराने के पक्ष में हैं। इसे टालने के लिए हाईकोर्ट में एक याचिका भी दायर की गई है। पक्ष-विपक्ष की इन दलीलों से एक तरह से कोरोना भी अब मुद्दा बनता जा रहा है।

ऐसा नहीं है कि बढ़ती संख्या से सत्ता पक्ष चिंतित नहीं है या विपक्ष ही जनता का हिमायती है। इसके पीछे भी चुनावी गणित भी काम कर रही है। कोरोना काल में एक-एक हजार की मदद, तीन महीने का राशन, प्रवासियों को रोजगार जैसी मदद के सहारे सत्ता पक्ष को मैदान साफ दिख रहा है। उसे लगता है कि इसके सहारे उसकी नैया फिर पार लग जाएगी। सातवां द्वार PM मोदी व CM नीतीश का चेहरा तोड़ देगा। अगर चुनाव में विलंब हुआ और राष्ट्रपति शासन के हालात आए तो मेहरबानियों को जनता भूल सकती है। सत्ता पक्ष की इस चाल को विपक्ष भी बखूबी समझ रहा है। वह जानता है कि इस समय खाली पुरानी बखिया उधेड़ने से काम नहीं बनने वाला। तत्काल मेहरबानी उसकी राह में रोड़ा बनेगी। अगर कुछ मोहलत मिलती है और हालात सामान्य होते हैं तो उसको फायदा होगा। अभी लोगों से मेल-मिलाप का समय भी नहीं है। ऐसे में सत्तापक्ष तो वर्चुअल मीटिंग के जरिये अपनी बात कार्यकर्ताओं व जनता तक पहुंचा भी ले रहा है, जबकि संसाधनों के अभाव के कारण विपक्ष इसमें फिसड्डी है। उसके सामने खुलकर मैदान में आना मजबूरी ही है।

बहरहाल कसरतें सभी दलों की जारी हैं। भीतर और बाहर दोनों तरफ। भीतर मतलब सीटों पर सहमति बना कर गठबंधन साधना और बाहर कायकर्ताओं को सक्रिय कर ज्यादा से ज्यादा वोटबैंक बढ़ाना। भीतरी मजबूती के लिए NDA में BJP और महागठबंधन में कांग्रेस अगुवाई कर रही हैं। NDA में LJP की 94 सीटों की मांग और उसके रवैये से नीतीश सहज नहीं हैं तो हम, रालोसपा व वीआइपी जैसे दलों की मांग को लेकर RJD। जदयू भाजपा पर दबाव बनाए है कि वह अपने कोटे से LJP को निपटाए और महागठबंधन में ऐसी ही स्थिति में कांग्रेस है। अभी BJP के प्रभारी भूपेंद्र यादव और कांग्रेस के शक्ति सिंह गोहिल इसी मुहिम में तीन-चार दिन जुटे रहे। उनकी कोशिश यही है कि घर को जल्दी ठीक कर बाहर मोर्चा खोला जाए।

इससे इतर आयोग समय पर चुनाव कराने की तैयारियों में जुट गया है। कोरोना ने उसके सामने भी चुनौती खड़ी कर दी है। चुनाव आयोग फिलहाल इस मूड में भी नहीं दिख रहा कि चुनाव टलने चाहिए। हां, राजनीतिक दलों में जरूर इस बात की चिंता है कि कोरोना के कहर के कारण कहीं मतदान का प्रतिशत न प्रभावित हो जाए। अगर वोट कम पड़े तो बाजी उसी की होगी जो ज्यादा से ज्यादा वोट डलवा लेगा। कुछ ऐसे ही हालात हैं लॉकडाउन लौटने के बाद बिहार में। कुछ समय बाद ही तस्वीर साफ होगी कि कोरोना जीतता है या चुनाव।

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