द्वितीय विश्व युद्ध में जापान के आत्मसमर्पण की 81वीं वर्षगांठ पर टोक्यो में आयोजित राष्ट्रीय श्रद्धांजलि समारोह ने एक बार फिर पूर्वी एशिया के पुराने विवादों को चर्चा में ला दिया। इस मौके पर सम्राट नारुहितो और देश की पहली महिला प्रधानमंत्री सनाए ताकाइची के भाषण खास तौर पर सुर्खियों में रहे। सम्राट ने युद्ध की त्रासदी पर गहरा खेद जताते हुए शांति का संदेश दिया, जबकि प्रधानमंत्री के संबोधन में जापान के युद्धकालीन अपराधों का स्पष्ट उल्लेख नहीं किया गया। दोनों नेताओं के अलग-अलग रुख ने एक बार फिर इतिहास, राजनीति और कूटनीति से जुड़े पुराने सवालों को सामने ला खड़ा किया।
सम्राट नारुहितो और पीएम ताकाइची: बयानों में अंतर क्यों?
जापान में सम्राट और प्रधानमंत्री की संवैधानिक जिम्मेदारियां अलग-अलग हैं, लेकिन आत्मसमर्पण दिवस पर उनके बयानों का अंतर सिर्फ औपचारिक भूमिका तक सीमित नहीं रहा। यह देश में इतिहास और द्वितीय विश्व युद्ध को लेकर मौजूद दो अलग-अलग सोच को भी दर्शाता है। सम्राट नारुहितो ने अपने संबोधन में युद्ध पर गहरा पश्चाताप व्यक्त करते हुए शांति और इतिहास से सीख लेने की बात कही। वहीं, जापानी शाही परिवार 1978 से यासुकुनी मंदिर से दूरी बनाए हुए है, क्योंकि उसी वर्ष वहां क्लास-ए युद्ध अपराधियों को भी सम्मानित किया गया था।
प्रधानमंत्री सनाए ताकाइची ने अपने संबोधन में हिरोशिमा, नागासाकी, ओकिनावा और विदेशों में जान गंवाने वाले जापानी सैनिकों व नागरिकों को श्रद्धांजलि अर्पित की। उन्होंने कहा कि युद्ध के बाद जापान ने वैश्विक शांति और विकास में लगातार योगदान दिया है। हालांकि, अपने भाषण में उन्होंने एशिया में जापान की युद्धकालीन कार्रवाइयों, युद्ध अपराधों या उनसे जुड़े विवादास्पद मुद्दों का कोई उल्लेख नहीं किया, जिससे उनके रुख को लेकर नई बहस छिड़ गई।
राजनीतिक ढाल के लिए इतिहास बदलने की कोशिश?
प्रधानमंत्री सनाए ताकाइची को पूर्व प्रधानमंत्री शिंजो आबे की राजनीतिक विरासत का प्रमुख चेहरा माना जाता है। आबे के कार्यकाल के बाद से जापानी नेतृत्व ने युद्धकालीन घटनाओं पर सार्वजनिक माफी मांगने की परंपरा से दूरी बनाई है। ताकाइची का तर्क है कि युद्ध के दशकों बाद की पीढ़ी को अतीत की गलतियों के लिए जिम्मेदार नहीं ठहराया जाना चाहिए। उनके आलोचक इसे इतिहास को कमजोर करने की कोशिश मानते हैं, जबकि समर्थकों के अनुसार यह जापान के राष्ट्रीय सम्मान और गौरव की रक्षा का हिस्सा है।
यासुकुनी मंदिर पर पड़ोसी देशों का गुस्सा
यासुकुनी मंदिर में जापान के लगभग 24 लाख युद्ध मृतकों को श्रद्धांजलि दी जाती है, लेकिन 1978 में द्वितीय विश्व युद्ध के 14 क्लास-ए युद्ध अपराधियों को भी वहां शामिल किए जाने के बाद यह मंदिर विवादों का केंद्र बन गया। चीन और दक्षिण कोरिया का मानना है कि जापानी नेताओं की मंदिर यात्रा या वहां चढ़ावा भेजना युद्धकालीन अत्याचारों को नजरअंदाज करने का संकेत है। इस बार भी रक्षा मंत्री शिंजिरो कोइजुमी समेत कई मंत्रियों के मंदिर जाने पर दोनों देशों ने कड़ा राजनयिक विरोध जताया।
ताकाइची का मंदिर न जाना मजबूरी या शांति की पहल?
सनाए ताकाइची को राष्ट्रवादी छवि वाले नेता के तौर पर देखा जाता है और वह पहले भी यासुकुनी मंदिर जा चुकी हैं। हालांकि, इस बार उन्होंने खुद मंदिर जाने के बजाय अपने प्रतिनिधि के माध्यम से चढ़ावा भेजा। विश्लेषकों का मानना है कि यह फैसला चीन और दक्षिण कोरिया के साथ पहले से तनावपूर्ण रिश्तों को और बिगड़ने से बचाने की कोशिश हो सकता है, खासकर ऐसे समय में जब क्षेत्रीय कूटनीतिक हालात बेहद संवेदनशील बने हुए हैं।
आलोचकों का कहना है कि यदि यह कदम वास्तव में मेल-मिलाप की दिशा में होता, तो प्रधानमंत्री सनाए ताकाइची अपने भाषण में एशियाई देशों के युद्ध पीड़ितों के प्रति भी संवेदना व्यक्त करतीं। लेकिन युद्धकालीन घटनाओं पर चुप्पी और यासुकुनी मंदिर में प्रतिनिधि के जरिए चढ़ावा भेजने के कारण उनके रुख को कई विशेषज्ञ एक रणनीतिक कूटनीतिक कदम मान रहे हैं। यही वजह है कि जापान आज भी अपनी शांतिप्रिय छवि और युद्धकालीन इतिहास को लेकर जारी विवादों के बीच संतुलन बनाने की चुनौती से जूझ रहा है।
यासुकुनी मंदिर क्या है और यह क्यों विवादास्पद है?
यासुकुनी मंदिर जापान का एक प्रमुख धार्मिक स्थल है, लेकिन इसकी पहचान लंबे समय से अंतरराष्ट्रीय विवादों से भी जुड़ी रही है। 1869 में स्थापित इस मंदिर में जापान के लिए जान गंवाने वाले करीब 24 लाख लोगों को श्रद्धांजलि दी जाती है। हालांकि, 1978 में द्वितीय विश्व युद्ध के 14 क्लास-ए युद्ध अपराधियों को भी यहां शामिल किए जाने के बाद यह चीन और दक्षिण कोरिया की नाराजगी का बड़ा कारण बन गया। यही वजह है कि जब भी कोई जापानी नेता मंदिर का दौरा करता है या वहां चढ़ावा भेजता है, पड़ोसी देश इसे जापान के युद्धकालीन अतीत और सैन्यवादी सोच के समर्थन के रूप में देखते हैं।
चीन और दक्षिण कोरिया की नाराजगी की असली वजह
द्वितीय विश्व युद्ध से पहले और उसके दौरान जापान ने चीन और कोरियाई प्रायद्वीप में अपना साम्राज्य फैलाया, जिसके दौरान बड़े पैमाने पर हिंसा और मानवाधिकार उल्लंघन के आरोप लगे। चीन और दक्षिण कोरिया का आरोप है कि जापान ने अपने युद्धकालीन अतीत को लेकर जर्मनी की तरह स्पष्ट और लगातार आत्ममंथन नहीं किया। इसी वजह से यासुकुनी मंदिर से जुड़े जापानी नेताओं के कदम पड़ोसी देशों में आज भी विवाद और नाराजगी का कारण बनते हैं।

