अग्निपथ पर नेपाल की ‘ना’! गोरखा भर्ती को लेकर क्या है पूरा विवाद?

भारतीय सेना और गोरखा सैनिकों का रिश्ता दो सदियों से भी पुराना है। नेपाल के हजारों युवा लंबे समय से भारतीय सेना की गोरखा रेजिमेंट का हिस्सा बनते रहे हैं। लेकिन 2022 में अग्निपथ योजना लागू होने के बाद यह भर्ती प्रक्रिया थम गई। नेपाल सरकार ने नई व्यवस्था के तहत भर्ती की मंजूरी नहीं दी, जिसके चलते पिछले कुछ वर्षों से नेपाली युवाओं की भारतीय सेना में भर्ती बंद है। अब इसी मुद्दे को लेकर नेपाल में पूर्व गोरखा सैनिक और युवा सरकार पर दबाव बना रहे हैं। उनका कहना है कि सरकार जल्द फैसला लेकर अग्निपथ योजना के तहत भर्ती का रास्ता साफ करे।

नेपाली गोरखा युवा क्यों कर रहे अग्निपथ योजना की मांग?
नेपाल में पूर्व गोरखा सैनिकों और युवाओं का मानना है कि अग्निपथ योजना के तहत चार साल की सैन्य सेवा, खाड़ी देशों में कम वेतन वाली नौकरियों की तुलना में कहीं बेहतर अवसर है। उनका कहना है कि इस दौरान अच्छी आय, प्रशिक्षण और अन्य सुविधाएं मिलती हैं, जबकि बड़ी संख्या में नेपाली युवा रोजगार के लिए सऊदी अरब, कतर और यूएई जैसे देशों में कठिन परिस्थितियों में काम करने को मजबूर होते हैं। पूर्व सैनिकों के मुताबिक, भारतीय सेना में भर्ती सिर्फ नौकरी का माध्यम नहीं, बल्कि 1815 की सुगौली संधि और 1947 के त्रिपक्षीय समझौते से जुड़ी दशकों पुरानी परंपरा और सम्मान का प्रतीक भी है। उनका कहना है कि भर्ती बंद रहने से इस ऐतिहासिक विरासत पर असर पड़ रहा है।

क्या है पूरा विवाद?
कोविड-19 महामारी के दौरान 2020 में भारतीय सेना में नेपाली गोरखाओं की भर्ती पर रोक लग गई थी। इसके बाद 2022 में भारत सरकार ने अग्निपथ योजना लागू की, जिसने पारंपरिक भर्ती व्यवस्था की जगह ले ली। हालांकि, नेपाल ने नई योजना के तहत भर्ती को मंजूरी नहीं दी। नेपाल का तर्क है कि 1947 के भारत-नेपाल-ब्रिटेन त्रिपक्षीय समझौते के अनुसार नेपाली गोरखा सैनिकों को भारतीय सैनिकों के समान वेतन, पेंशन और अन्य सुविधाएं मिलनी चाहिए। जबकि अग्निपथ योजना में अधिकांश अग्निवीर चार साल की सेवा के बाद सेवानिवृत्त हो जाते हैं और केवल 25% को ही स्थायी सेवा का अवसर मिलता है। इसी वजह से यह मामला अब भी अटका हुआ है।

भारत सरकार और भारतीय सेना का रुख?
अग्निपथ योजना को लेकर भारत का रुख साफ है। केंद्र सरकार और रक्षा अधिकारियों का कहना है कि अब सेना में भर्ती की पूरी प्रक्रिया इसी योजना के तहत होती है, इसलिए भारतीय और नेपाली युवाओं के लिए अलग-अलग नियम नहीं बनाए जा सकते। भारत का कहना है कि उसने अपने सभी दायित्वों का पालन किया है और अब यह फैसला नेपाल सरकार को करना है कि वह अपने नागरिकों को अग्निपथ योजना के तहत भारतीय सेना में भर्ती की अनुमति देती है या नहीं।

भर्ती रुकने के क्या हैं मायने?
नेपाल में भारतीय सेना के 1.2 लाख से अधिक पूर्व गोरखा सैनिक रहते हैं, जो दोनों देशों के बीच लंबे समय से मजबूत रिश्तों की एक अहम कड़ी माने जाते हैं। भारतीय सेना से मिलने वाली पेंशन और अन्य लाभ ग्रामीण नेपाल की अर्थव्यवस्था के लिए भी महत्वपूर्ण रहे हैं। खासकर पोखरा, स्यांगजा और गुल्मी जैसे इलाकों में कई परिवार इसी आय पर निर्भर हैं। ऐसे में भर्ती प्रक्रिया बंद होने से न केवल इस ऐतिहासिक सैन्य परंपरा पर असर पड़ा है, बल्कि स्थानीय स्तर पर आर्थिक चुनौतियां भी बढ़ने लगी हैं।

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