रांची का छात्र आंदोलन अब सिर्फ भर्ती परीक्षाओं की गड़बड़ी का सवाल नहीं रहा, बल्कि सरकार की विश्वसनीयता की परीक्षा बन गया है। सरकार 98 प्रतिशत मांगें मानने का दावा कर रही है, फिर भी आंदोलन खत्म नहीं हो रहा—क्योंकि असली विवाद सीबीआई जांच पर अटका है।
सवाल यह है कि सरकार सीबीआई जांच से पीछे क्यों हट रही है? इसका सीधा अर्थ यह नहीं कि सरकार दोषी है, लेकिन इतना जरूर है कि स्वतंत्र जांच से उसे राजनीतिक और प्रशासनिक असहजता का डर हो सकता है। सीबीआई जांच हुई तो जांच का दायरा उन अधिकारियों और पूरी भर्ती व्यवस्था तक पहुंच सकता है, जिन पर सरकार की जवाबदेही बनती है। इससे पुराने फैसले, प्रशासनिक भूमिका और राजनीतिक संरक्षण के सवाल भी उठ सकते हैं।
सरकार के सामने सबसे बड़ी समस्या यह है कि जितना वह आंदोलन को दबाने की कोशिश करेगी, उतना ही सीबीआई जांच का सवाल बड़ा होता जाएगा। 10 अगस्त की पुलिस कार्रवाई और अब 20 अगस्त के मुख्यमंत्री आवास घेराव के ऐलान ने इसे और गंभीर बना दिया है।
सरकार के लिए बेहतर रास्ता आंदोलन को बल से खत्म करना नहीं, बल्कि एक ऐसी स्वतंत्र और विश्वसनीय जांच स्वीकार करना है जिस पर छात्रों को भी भरोसा हो। आखिर सवाल केवल परीक्षाओं का नहीं, हजारों युवाओं के भविष्य और शासन पर उनके भरोसे का है।

