कुरील द्वीप पर पुतिन की एंट्री से मचा हड़कंप! क्या है द्वितीय विश्व युद्ध वाला कनेक्शन?

रूस के राष्ट्रपति व्लादिमीर पुतिन ने हाल ही में विवादित कुरील द्वीप समूह के सबसे बड़े द्वीप इतुरुप का दौरा किया। साल 2010 के बाद यह पहली बार है, जब रूस का कोई राष्ट्रपति इस रणनीतिक क्षेत्र में पहुंचा है। पुतिन की यह यात्रा केवल प्रशासनिक या औपचारिक दौरा नहीं मानी जा रही, बल्कि इसे रूस के क्षेत्रीय दावे का मजबूत संदेश भी माना जा रहा है।
पुतिन के इस कदम के बाद कुरील द्वीपों को लेकर रूस और जापान के बीच दशकों से चला आ रहा विवाद एक बार फिर सुर्खियों में आ गया है। यह वही मुद्दा है, जो द्वितीय विश्व युद्ध की समाप्ति के बाद से दोनों देशों के रिश्तों में सबसे बड़ी बाधा बना हुआ है। इसी विवाद के कारण आज तक रूस और जापान के बीच औपचारिक शांति संधि पर हस्ताक्षर नहीं हो सके हैं।

पुतिन के कुरील द्वीप दौरे पर जापान ने तीखी प्रतिक्रिया दी है। प्रधानमंत्री सानाए ताकाइची ने इसे जापानी नागरिकों की भावनाओं के खिलाफ और पूरी तरह अस्वीकार्य कदम बताया। हालांकि, रूस ने जापान के विरोध को खारिज करते हुए स्पष्ट किया कि कुरील द्वीप उसके संप्रभु क्षेत्र का हिस्सा हैं और वहां की किसी भी गतिविधि पर फैसला लेने का अधिकार केवल मॉस्को को है।

पुतिन के इस दौरे में क्या-क्या हुआ?
इतुरुप पहुंचने से पहले राष्ट्रपति व्लादिमीर पुतिन ने सखालिन के पास रूसी पैसिफिक फ्लीट के सैन्य अभ्यास का निरीक्षण किया और युद्धपोत वेरयाग से लाइव मिसाइल ड्रिल देखी। इसके बाद उन्होंने इतुरुप द्वीप पर यासनी सीफूड प्रोसेसिंग प्लांट और दुर्लभ खनिज परियोजनाओं का दौरा किया। इस दौरान पुतिन ने स्थानीय कर्मचारियों और नागरिकों से भी मुलाकात कर क्षेत्र के विकास कार्यों की जानकारी ली।

द्वितीय विश्व युद्ध से क्या है कुरील द्वीप का कनेक्शन?
कुरील द्वीप विवाद की शुरुआत द्वितीय विश्व युद्ध के अंतिम दौर से हुई। 1945 के याल्टा सम्मेलन में सोवियत संघ को जापान के खिलाफ युद्ध में शामिल होने के बदले कुरील द्वीप और दक्षिणी सखालिन देने पर सहमति बनी। इसके बाद जापान के आत्मसमर्पण के बावजूद सोवियत सेना ने इतुरुप, कुनाशिर, शिकोतान और हबोमाई द्वीपों पर कब्जा कर लिया और वहां रहने वाले हजारों जापानी नागरिकों को हटाया गया।

बाद में 1951 की सैन फ्रांसिस्को शांति संधि में जापान ने कुरील द्वीपों पर अपना दावा छोड़ दिया, लेकिन सोवियत संघ इस समझौते का हिस्सा नहीं बना। जापान आज भी दावा करता है कि ये चारों दक्षिणी द्वीप ऐतिहासिक रूप से कुरील श्रृंखला का हिस्सा नहीं थे, इसलिए उन पर उसका अधिकार बरकरार है।

इन द्वीपों का 170 साल पुराना इतिहास
रूस और जापान के बीच कुरील द्वीपों को लेकर विवाद करीब 170 साल पुराना है। 1855 की शिमोदा संधि में दोनों देशों की सीमा तय हुई और इतुरुप जापान के हिस्से में आया। बाद में 1875 की सेंट पीटर्सबर्ग संधि के तहत जापान को पूरे कुरील द्वीप समूह का नियंत्रण मिला, जबकि सखालिन रूस के पास चला गया। लेकिन द्वितीय विश्व युद्ध के अंत में 1945 में सोवियत संघ ने कुरील के चार दक्षिणी द्वीपों पर कब्जा कर लिया और जापानी नागरिकों को वहां से हटा दिया। यही घटना आज तक चले आ रहे रूस-जापान सीमा विवाद की सबसे बड़ी वजह मानी जाती है।

चारों विवादित द्वीपों की पहचान
इतुरुप (Etorofu): 3,185 वर्ग किमी में फैला सबसे बड़ा द्वीप। यहां एयरपोर्ट, नौसैनिक सुविधाएं और दुर्लभ धातु रेनियम (Rhenium) के विशाल भंडार मौजूद हैं।
कुनाशिर (Kunashiri): जापान के होक्काइडो से महज 15-20 किमी दूर। यहां द्वीपों का प्रशासनिक केंद्र ‘युज्नो-कुरिल्स्क’ स्थित है।
शिकोतान (Shikotan): 250 वर्ग किमी में फैला द्वीप, जो अपने प्राकृतिक बंदरगाहों और सीफूड प्रोसेसिंग के लिए जाना जाता है।
हबोमाई (Habomai): छोटे-छोटे निर्जन टापुओं का समूह, जहां रूसी बॉर्डर गार्ड्स और रडार स्टेशन तैनात हैं

मॉस्को क्यों नहीं छोड़ना चाहता कुरील द्वीप?
रूस के लिए कुरील द्वीप केवल सीमा का हिस्सा नहीं, बल्कि उसकी सामरिक और आर्थिक सुरक्षा की मजबूत कड़ी हैं। ये द्वीप ओखोत्स्क सागर में रूसी नौसेना की गतिविधियों की सुरक्षा करते हैं और प्रशांत महासागर तक आसान पहुंच उपलब्ध कराते हैं। इसी वजह से रूस ने यहां आधुनिक मिसाइल और वायु रक्षा प्रणाली तैनात कर रखी है। इसके अलावा, इतुरुप द्वीप पर दुर्लभ धातु रेनियम के भंडार मौजूद हैं, जबकि आसपास का समुद्री क्षेत्र दुनिया के सबसे समृद्ध मत्स्य क्षेत्रों में गिना जाता है। इस कारण कुरील द्वीप रूस के लिए रणनीतिक और आर्थिक दोनों दृष्टि से बेहद महत्वपूर्ण हैं।

यूक्रेन युद्ध और नई भू-राजनीतिक गोलबंदी
यूक्रेन युद्ध के बाद जापान ने रूस पर पश्चिमी देशों के साथ मिलकर प्रतिबंध लगाए, जिसके जवाब में मॉस्को ने जापान को “गैर-मित्र देश” घोषित करते हुए दोनों देशों के बीच शांति संधि वार्ता रोक दी। ऐसे माहौल में राष्ट्रपति व्लादिमीर पुतिन का इतुरुप दौरा रूस के इस स्पष्ट संदेश के रूप में देखा जा रहा है कि वह कुरील द्वीपों पर अपने दावे से पीछे हटने वाला नहीं है। विशेषज्ञों का मानना है कि एशिया-प्रशांत क्षेत्र में बढ़ते सामरिक तनाव के बीच यह दशकों पुराना विवाद एक बार फिर वैश्विक चर्चा का केंद्र बन गया है।

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