पाकिस्तान के सेना प्रमुख फील्ड मार्शल आसिम मुनीर देश के प्रशासनिक ढांचे में बड़े बदलाव की योजना बना रहे हैं। इस प्रस्ताव पर अमल हुआ तो पाकिस्तान के प्रांतीय नक्शे में दशकों बाद बड़ा फेरबदल देखने को मिल सकता है। फिलहाल पाकिस्तान चार प्रांतों- पंजाब, सिंध, खैबर पख्तूनख्वा और बलूचिस्तान में बंटा हुआ है। ‘द इकोनॉमिस्ट’ की रिपोर्ट के मुताबिक, आसिम मुनीर इन बड़े प्रांतों को छोटे प्रशासनिक हिस्सों में बांटने के पक्ष में हैं। इस योजना के तहत पाकिस्तान में 12 से 15 नए प्रांत बनाए जाने या देश को 160 छोटे प्रशासनिक क्षेत्रों में बांटने का विकल्प सामने आया है। हालांकि, यह प्रस्ताव अभी योजना के स्तर पर बताया जा रहा है। इस बदलाव का असर केवल पाकिस्तान की भौगोलिक सीमाओं तक सीमित नहीं रहेगा, बल्कि देश में सत्ता के बंटवारे और प्रशासनिक व्यवस्था पर भी पड़ सकता है। विश्लेषण के मुताबिक, बड़े प्रांतों को छोटे हिस्सों में बांटने से क्षेत्रीय राजनीतिक ताकत कमजोर हो सकती है। इससे केंद्र सरकार और सेना का प्रशासनिक व्यवस्था पर प्रभाव बढ़ने की संभावना भी जताई जा रही है।
क्या है आसिम मुनीर का प्लान
पाकिस्तान के पंजाब प्रांत की बड़ी आबादी के कारण प्रशासनिक व्यवस्था पर काफी दबाव है। रिपोर्ट के मुताबिक, ग्रामीण क्षेत्रों में रहने वाले लोगों को सरकारी सेवाओं का लाभ लेने के लिए कई घंटे का सफर तय करना पड़ता है। वहीं, पंजाब की एक-चौथाई से भी कम आबादी को घर पर सुरक्षित पेयजल की सुविधा मिल पाती है।
ऐसे हालात में आसिम मुनीर का मानना है कि पाकिस्तान के प्रांतों का आकार इतना बड़ा है कि उनका प्रभावी ढंग से संचालन करना मुश्किल हो जाता है। इसे देश के खराब प्रदर्शन की एक वजह के तौर पर देखा जा रहा है। हालांकि, पाकिस्तान की आर्थिक चुनौतियां केवल प्रशासनिक ढांचे तक सीमित नहीं हैं। देश पहले से ही धीमी आर्थिक वृद्धि, बढ़ती महंगाई और भारी कर्ज चुकाने के दबाव का सामना कर रहा है। इन समस्याओं की जड़ें प्रांतों के आकार से कहीं अधिक गहरी मानी जाती हैं।
आसिम मुनीर का बढ़ता असर
पाकिस्तान के इतिहास में दो-पांचवें से अधिक समय तक सेना का प्रत्यक्ष शासन रहा है। वहीं, लोकतांत्रिक तरीके से चुनी गई सरकारें भी अक्सर सेना के प्रभाव में काम करती रही हैं। ‘द इकोनॉमिस्ट’ की रिपोर्ट के मुताबिक, आसिम मुनीर जिन समस्याओं के समाधान के लिए छोटे प्रांत बनाने की वकालत कर रहे हैं, उनमें से कई के लिए सेना की भूमिका पर भी सवाल उठते रहे हैं। रिपोर्ट में सेना की महंगी जमीनों और कारोबार पर पकड़ के साथ-साथ सरकारी संसाधनों में उसकी बड़ी हिस्सेदारी का भी उल्लेख किया गया है। ऐसे में प्रांतों के पुनर्गठन की योजना कई सवाल खड़े करती है।
छोटे प्रांत बनाने के पक्ष में यह तर्क दिया जा सकता है कि इससे प्रशासनिक व्यवस्था बेहतर होगी और सरकार की पहुंच आम नागरिकों तक आसान हो सकेगी। हालांकि, इसके उलट अगर नए प्रांत आर्थिक और राजनीतिक रूप से कमजोर रहते हैं और उन्हें हर फैसले के लिए केंद्र पर निर्भर होना पड़ता है, तो सेना का उन पर प्रभाव बढ़ सकता है। ऐसी स्थिति में प्रांतों का पुनर्गठन प्रशासन को जनता के करीब लाने के बजाय सेना की पकड़ मजबूत करने का जरिया भी बन सकता है।
पंजाब और सिंध क्यों अहम हैं?
पाकिस्तान के चारों प्रांत केवल प्रशासनिक इकाइयां नहीं हैं, बल्कि देश की राजनीति में भी इनकी अहम भूमिका है। पंजाब में लंबे समय से पाकिस्तान मुस्लिम लीग-नवाज़ (PML-N) का प्रभाव रहा है, वहीं सिंध को पाकिस्तान पीपल्स पार्टी (PPP) का मजबूत गढ़ माना जाता है। इन दोनों प्रांतों ने सैन्य शासन के दौर में भी राजनीतिक ताकत के स्वतंत्र केंद्र के रूप में अपनी भूमिका निभाई है। ऐसे में पंजाब और सिंध जैसे बड़े प्रांतों को छोटी इकाइयों में बांटने की संभावित योजना राजनीतिक लिहाज से काफी महत्वपूर्ण मानी जा रही है। इससे न केवल क्षेत्रीय राजनीति का समीकरण बदल सकता है, बल्कि सत्ता के मौजूदा केंद्रों पर भी असर पड़ने की आशंका है।
बदला हुआ राजनीति माहौल और मुनीर का बढ़ता कद
पाकिस्तान के योजना मंत्री अहसान इकबाल भी पहले देश में प्रांतों की संख्या बढ़ाने और छोटी प्रशासनिक इकाइयां बनाने की जरूरत पर जोर दे चुके हैं। इस प्रस्ताव के तहत 12 से 15 प्रांत और 160 जिलों तक के गठन की संभावना पर चर्चा हुई है। यह मुद्दा ऐसे समय में सामने आया है, जब फील्ड मार्शल आसिम मुनीर का पाकिस्तान की राजनीति में प्रभाव काफी बढ़ गया है। हालांकि देश में निर्वाचित सरकार मौजूद है, लेकिन राजनीतिक विश्लेषणों में मुनीर को सत्ता के सबसे प्रभावशाली चेहरों में गिना जाता है। उन्होंने पाकिस्तान मुस्लिम लीग-नवाज (PML-N) और पाकिस्तान पीपल्स पार्टी (PPP) के साथ तालमेल के जरिए अपनी स्थिति मजबूत की है। वहीं, देश की प्रमुख राजनीतिक ताकतों में शामिल इमरान खान जेल में बंद हैं। ऐसे राजनीतिक माहौल में प्रांतों के पुनर्गठन की इस संभावित योजना को सत्ता के समीकरणों से जोड़कर देखा जा रहा है। माना जा रहा है कि इस बदलाव का असर पाकिस्तान की राजनीति, क्षेत्रीय नेतृत्व और सत्ता के मौजूदा ढांचे पर पड़ सकता है।
खैबर पख्तूनख्वा में उथल-पुथल जारी
पाकिस्तान में प्रांतों के पुनर्गठन की चर्चा के बीच राजनीतिक तनाव भी बढ़ गया है। पूर्व प्रधानमंत्री इमरान खान की पार्टी पाकिस्तान तहरीक-ए-इंसाफ (PTI) और सरकार के बीच बातचीत विफल होने के बाद, उनके हजारों समर्थकों ने खैबर पख्तूनख्वा से इस्लामाबाद की ओर मार्च शुरू किया। सरकार ने राजधानी के आसपास सुरक्षा बढ़ा दी है और प्रदर्शनकारियों को प्रवेश से रोकने की तैयारी की है। इस घटनाक्रम से केंद्र सरकार और PTI शासित खैबर पख्तूनख्वा के बीच तनाव बढ़ा है, जबकि यह प्रांत पहले से ही उग्रवाद की चुनौती का सामना कर रहा है।
बलूचिस्तान और PoK में भी फैली है अशांति
पाकिस्तान के विभिन्न क्षेत्रों में जारी असंतोष भी देश के मौजूदा राजनीतिक ढांचे के सामने बड़ी चुनौती बना हुआ है। बलूचिस्तान में लंबे समय से अलगाववादी हिंसा जारी है। यहां प्राकृतिक संसाधनों, उनके बंटवारे और इस्लामाबाद की भूमिका को लेकर विवाद रहा है। ऐसे में बलूचिस्तान को छोटे हिस्सों में बांटने की किसी भी योजना से क्षेत्रीय सीमाओं, संसाधनों और स्थानीय राजनीतिक अधिकारों से जुड़े संवेदनशील मुद्दे उठ सकते हैं। दूसरी ओर, पाकिस्तान के कब्जे वाले कश्मीर (PoK) में भी शासन व्यवस्था, महंगाई, टैक्स और आर्थिक बदहाली को लेकर समय-समय पर विरोध प्रदर्शन होते रहे हैं। इन परिस्थितियों से स्पष्ट होता है कि पाकिस्तान में प्रांतों और प्रशासनिक इकाइयों का पुनर्गठन करना आसान नहीं होगा। इस प्रक्रिया में क्षेत्रीय हितों, संसाधनों के बंटवारे और स्थानीय लोगों की राजनीतिक आकांक्षाओं जैसे कई अहम मुद्दों पर विचार करना होगा।
प्रांतों को छोटे राज्यों में बांटने से क्या होगा फायदा
पाकिस्तान में मौजूदा राजनीतिक तनाव और चारों बड़े प्रांतों में जारी अस्थिरता के बीच छोटे प्रांत बनाने के पक्ष में प्रशासनिक तर्क भी दिए जा रहे हैं। 1947 में आजादी के बाद देश की आबादी और जरूरतों में काफी बदलाव आया है, जबकि कुछ प्रांतों का आकार इतना बड़ा है कि वहां प्रशासनिक कामकाज संभालना चुनौतीपूर्ण माना जाता है। ऐसे में, पंजाब, सिंध, खैबर पख्तूनख्वा और बलूचिस्तान को छोटी इकाइयों में बांटने से प्रशासनिक व्यवस्था में बदलाव आ सकता है। हालांकि, इसका असर केवल सीमाओं तक सीमित नहीं रहेगा, बल्कि देश में राजनीतिक शक्ति के संतुलन और सत्ता पर नियंत्रण के तरीके को भी प्रभावित कर सकता है।

