भरत भूषण तिवारी एनकाउंटर मामले में बिहार सरकार के 24 जुलाई के दो आदेशों ने एक बार फिर कई सवाल खड़े कर दिए हैं। तत्कालीन जगदीशपुर SDPO राजेश कुमार शर्मा को पुलिस मुख्यालय में प्रतीक्षा में रखा गया है, जबकि जगदीशपुर SDO संजित कुमार को पद से मुक्त कर सामान्य प्रशासन विभाग में योगदान देने को कहा गया है।
सरकारी आदेशों में इन बदलावों को भरत तिवारी मामले से जोड़ने का कोई कारण दर्ज नहीं है। इसलिए इन्हें सीधे एनकाउंटर मामले में दंडात्मक कार्रवाई कहना सही नहीं होगा। लेकिन इन फैसलों की टाइमिंग इन्हें सामान्य तबादले से अलग जरूर करती है।
17 जून को भरत तिवारी की पुलिस कार्रवाई में मौत हुई। परिवार ने इसे फर्जी एनकाउंटर बताते हुए पुलिस अधिकारियों पर गंभीर आरोप लगाए। मामला बढ़ा तो सरकार ने न्यायिक जांच आयोग बनाया। पुलिस अधिकारियों के खिलाफ FIR हुई और मामला सुप्रीम कोर्ट से होते हुए पटना हाईकोर्ट पहुंचा।
अब घटनाक्रम देखिए—23 जुलाई को पटना हाईकोर्ट सरकार से जवाब मांगता है। 24 जुलाई को भरत तिवारी का परिवार मुख्यमंत्री से मिलता है और उसी तारीख को अधिकारियों से संबंधित ये दोनों आदेश जारी होते हैं।
यहीं से सबसे बड़ा सवाल पैदा होता है—
जो प्रशासनिक कदम घटना के तत्काल बाद उठाया जा सकता था, उसके लिए 37 दिन का इंतजार क्यों हुआ?
राजेश कुमार शर्मा का मामला और महत्वपूर्ण है। एनकाउंटर के समय वे जगदीशपुर के SDPO थे। पहले उनका तबादला मद्यनिषेध एवं राज्य स्वापक नियंत्रण ब्यूरो में किया गया। अब वहां से भी हटाकर उन्हें पुलिस मुख्यालय में IG की प्रतीक्षा में रखा गया है।
यदि निष्पक्ष जांच के लिए उन्हें सक्रिय पद से अलग रखना जरूरी था तो यह फैसला पहले क्यों नहीं हुआ? और यदि इसकी जरूरत नहीं थी तो अब ऐसा क्या बदला कि सरकार को दूसरा आदेश जारी करना पड़ा?
SDO संजित कुमार को हटाए जाने से सवाल पुलिस विभाग से आगे पूरे स्थानीय प्रशासन की भूमिका तक पहुंचता है। हालांकि उनकी किसी कथित भूमिका पर निष्कर्ष निकालना जांच पूरी होने से पहले उचित नहीं होगा।
सरकार के पास अपना पक्ष भी है। वह कह सकती है कि उसने मामले में न्यायिक जांच कराई, कानूनी प्रक्रिया को स्वतंत्र रूप से आगे बढ़ने दिया और अब आवश्यक प्रशासनिक फैसले भी लिए जा रहे हैं। तबादला किसी अधिकारी को दोषी ठहराना नहीं होता।
लेकिन सरकार की असली परीक्षा इन तबादलों से नहीं होगी।
असली परीक्षा यह होगी कि FIR की जांच कहां तक पहुंची? फॉरेंसिक साक्ष्य क्या कहते हैं? न्यायिक आयोग कब निष्कर्ष तक पहुंचेगा? और अगर किसी अधिकारी की जिम्मेदारी सामने आती है तो क्या सरकार उसके खिलाफ वास्तविक कार्रवाई करेगी?
क्योंकि भरत तिवारी मामले में अब सवाल केवल एक एनकाउंटर का नहीं रह गया है। सवाल यह भी है कि पुलिस पर गंभीर आरोप लगने की स्थिति में व्यवस्था खुद अपनी निष्पक्ष जांच कितनी तेजी से कर सकती है।
और इसलिए 24 जुलाई की कार्रवाई सरकार को तत्काल राजनीतिक राहत तो दे सकती है, लेकिन 37 दिनों से उठ रहे सवालों का जवाब नहीं।
सबसे बड़ा सवाल यही है—
“यह कार्रवाई सरकार की स्वाभाविक प्रशासनिक प्रक्रिया है, या हाईकोर्ट, न्यायिक जांच और परिवार के लगातार बढ़ते दबाव का परिणाम?”
इसका जवाब तबादले के आदेश में नहीं, आने वाले दिनों में जांच की रफ्तार और उसके नतीजे में मिलेगा।

