Global Game Changer BRICS! भारत का गेमप्लान जो बदल सकता है दुनिया की तस्वीर

BRICS Summit 2026: नई दिल्ली 11 से 13 सितंबर तक होने वाले 18वें BRICS शिखर सम्मेलन की मेजबानी के लिए पूरी तरह तैयार है। भारत मंडपम में आयोजित होने वाला यह सम्मेलन कई मायनों में ऐतिहासिक माना जा रहा है। BRICS अपने गठन के 20 साल पूरे कर रहा है, वहीं दुनिया इस समय अमेरिकी टैरिफ नीतियों, मध्य पूर्व के तनाव और वैश्विक आर्थिक अनिश्चितता जैसी चुनौतियों का सामना कर रही है।

ऐसे माहौल में 11 सदस्य देशों वाला विस्तारित BRICS समूह वैश्विक अर्थव्यवस्था और कूटनीति की दिशा तय करने में अहम भूमिका निभा सकता है। लोकल करेंसी में व्यापार, वैश्विक व्यापार व्यवस्था और नए रणनीतिक सहयोग जैसे मुद्दों पर होने वाली चर्चा भारत के लिए अपनी आर्थिक और कूटनीतिक स्थिति मजबूत करने का बड़ा अवसर मानी जा रही है।

ब्रिक्स बनाम G7: आंकड़ों के नजरिए से समझें
आज पूरी दुनिया की नजर BRICS देशों पर टिकी है, क्योंकि वैश्विक अर्थव्यवस्था में इस समूह का प्रभाव लगातार बढ़ रहा है। परचेजिंग पावर पैरिटी (PPP) के आधार पर साल 2000 में BRICS देशों की वैश्विक GDP में हिस्सेदारी करीब 23% थी, जबकि G7 देशों का हिस्सा 52% के आसपास था। लेकिन 2024 तक तस्वीर पूरी तरह बदल गई। 11 सदस्य देशों वाले विस्तारित BRICS की हिस्सेदारी बढ़कर लगभग 36.8% हो गई है, जबकि G7 की हिस्सेदारी 29% से नीचे आ गई है। यह बदलाव वैश्विक आर्थिक ताकत के नए संतुलन की ओर इशारा करता है।

BRICS आज वैश्विक अर्थव्यवस्था का एक मजबूत केंद्र बनकर उभरा है। 2024 में सदस्य देशों के बीच आपसी व्यापार बढ़कर 1.17 ट्रिलियन डॉलर तक पहुंच गया, जो दो दशक पहले की तुलना में करीब 13 गुना अधिक है। इस समूह के पास लगभग 5.2 ट्रिलियन डॉलर का विदेशी मुद्रा भंडार है और दुनिया के खनिज कोयला उत्पादन में इसकी हिस्सेदारी 78% से ज्यादा है। वहीं, 2025 और 2026 में BRICS देशों की औसत आर्थिक विकास दर G7 देशों की तुलना में काफी अधिक रहने का अनुमान है। यही वजह है कि वैश्विक आर्थिक और रणनीतिक मामलों में BRICS का प्रभाव लगातार बढ़ रहा है और पश्चिमी देशों की नजर भी इस समूह की गतिविधियों पर टिकी हुई है।

अमेरिकी को कैसे मिल रही चुनौती?
अमेरिकी टैरिफ के दबाव के बीच BRICS कई देशों के लिए वैकल्पिक आर्थिक मंच के तौर पर मजबूत हो रहा है। वैश्विक GDP में करीब 39% और अंतरराष्ट्रीय व्यापार में लगभग 23% हिस्सेदारी रखने वाला यह समूह आपसी व्यापार बढ़ाकर पश्चिमी बाजारों पर निर्भरता घटाने की दिशा में आगे बढ़ रहा है। भारत के लिए यह मैन्युफैक्चरिंग और सर्विसेज को BRICS देशों के नए बाजारों तक पहुंचाने का बड़ा अवसर साबित हो सकता है।

भारत के पास क्या हैं बड़े मौके?
ऊर्जा सुरक्षा: रूस और ईरान जैसे तेल उत्पादक देशों के साथ सीधे संवाद के जरिए भारत अपनी ऊर्जा जरूरतों और कच्चे तेल की कीमतों को स्थिर रखने का रास्ता निकाल सकता है।

चीन के साथ सीमा तनाव का समाधान: सम्मेलन के दौरान चीनी राष्ट्रपति शी जिनपिंग और भारतीय नेतृत्व के बीच होने वाली द्विपक्षीय बातचीत से दोनों देशों के बीच व्यापार और कूटनीतिक बर्फ पिघलने की उम्मीद जताई जा रही है।

ग्लोबल सप्लाई चेन का नया केंद्र: पश्चिम और चीन के बीच जारी ट्रेड-वॉर के बीच भारत BRICS देशों के लिए सप्लाई चेन का सबसे भरोसेमंद विकल्प ( बनकर उभर सकता है।

भारत की सभी से तालमेल बिठाने की कोशिश
BRICS में भारत की सक्रिय भूमिका उसकी ‘मल्टी-अलाइनमेंट’ नीति का अहम हिस्सा है। भारत किसी एक शक्ति गुट तक सीमित रहने के बजाय BRICS, G20, Quad और SCO जैसे अलग-अलग मंचों पर एक साथ सक्रिय है। इस रणनीति का उद्देश्य किसी एक पक्ष को चुनने के बजाय सभी प्रमुख ताकतों के साथ संतुलित रिश्ते बनाए रखते हुए भारत के आर्थिक और रणनीतिक हितों के लिए पर्याप्त गुंजाइश तैयार करना है।

BRICS को लेकर चीन-रूस क्यों आक्रामक?
BRICS को लेकर सदस्य देशों की प्राथमिकताएं एक जैसी नहीं हैं। चीन और रूस इसे पश्चिमी वर्चस्व, अमेरिकी नेतृत्व वाली संस्थाओं और डॉलर की ताकत को चुनौती देने वाले मंच के रूप में देखते हैं। चीन BRICS के विस्तार के जरिए ग्लोबल साउथ में अपनी भूमिका बढ़ाना चाहता है, जबकि रूस के लिए यह पश्चिमी प्रतिबंधों के बीच आर्थिक सहयोग का अहम जरिया है। दूसरी ओर, भारत और ब्राजील BRICS को ज्यादा आर्थिक सहयोग और वैश्विक संस्थाओं में सुधार के मंच के रूप में देखते हैं। भारत का रुख पश्चिम-विरोध के बजाय अपने रणनीतिक और आर्थिक हितों पर केंद्रित है।

क्या पश्चिमी देश ब्रिक्स को खतरा मान रहे?
BRICS फिलहाल पश्चिमी वित्तीय व्यवस्था का सीधा विकल्प बनने के बजाय धीरे-धीरे वैश्विक आर्थिक संतुलन बदलने की दिशा में बढ़ रहा है। अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप की साझा BRICS मुद्रा को लेकर 100% टैरिफ की धमकी के बाद इस विचार पर जोर कम हुआ है। अब सदस्य देश डॉलर की जगह अपनी-अपनी राष्ट्रीय मुद्राओं में आपसी व्यापार को बढ़ावा दे रहे हैं। रूस-चीन के बीच 90% से ज्यादा व्यापार रूबल और युआन में हो रहा है, जबकि रूस-भारत के बीच भी करीब 90% प्रत्यक्ष भुगतान राष्ट्रीय मुद्राओं में होने लगा है।

क्या डॉलर का दबदबा होगा खत्म?
दिल्ली में होने वाले BRICS समिट में BRICS Pay सिस्टम को लेकर बड़ा ऐलान संभव है। इसका उद्देश्य रूस के SPFS, चीन के CIPS, भारत के UPI और ब्राजील के Pix जैसे पेमेंट नेटवर्क को जोड़कर सदस्य देशों के बीच सीधे लेन-देन आसान बनाना है। इससे डॉलर आधारित कॉरेस्पोंडेंट बैंकिंग पर निर्भरता कम हो सकती है। भारत साझा BRICS मुद्रा के बजाय आपस में जुड़े डिजिटल पेमेंट सिस्टम और CBDC को ज्यादा व्यावहारिक विकल्प मानता है। हालांकि, डॉलर की वैश्विक रिजर्व करेंसी के तौर पर पकड़ अभी भी मजबूत बनी हुई है।

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