कभी दुनिया के सबसे बड़े रक्षा आयातकों में गिने जाने वाला भारत आज वैश्विक रक्षा बाजार में एक मजबूत निर्यातक के रूप में अपनी पहचान बना रहा है। एक समय था जब देश की रक्षा खरीद मुख्य रूप से रूस और फ्रांस पर निर्भर थी। बाद के वर्षों में अमेरिका और इजराइल भी भारत के प्रमुख रक्षा आपूर्तिकर्ताओं में शामिल हुए। हालांकि, अब भारत की रणनीति केवल हथियार खरीदने तक सीमित नहीं है, बल्कि स्वदेशी रक्षा प्रणालियों के निर्यात पर भी तेजी से फोकस किया जा रहा है।
आज भारत कई मित्र देशों को ब्रह्मोस सुपरसोनिक क्रूज मिसाइल, अस्त्र एयर-टू-एयर मिसाइल, पिनाका मल्टी-बैरल रॉकेट लॉन्चर और आकाश वायु रक्षा प्रणाली जैसी स्वदेशी रक्षा प्रणालियां उपलब्ध करा रहा है। यह बदलाव देश की बढ़ती रक्षा उत्पादन क्षमता और आत्मनिर्भरता का स्पष्ट संकेत है।
रक्षा निर्यात के आंकड़े भी इस बदलाव की कहानी बयां करते हैं। वित्त वर्ष 2025-26 में भारत का रक्षा निर्यात बढ़कर रिकॉर्ड 38,424 करोड़ रुपये पर पहुंच गया, जो अब तक का सर्वाधिक स्तर है। इससे पहले वित्त वर्ष 2024-25 में यह आंकड़ा 23,622 करोड़ रुपये था। वहीं, वर्ष 2013-14 में भारत का रक्षा निर्यात केवल 686 करोड़ रुपये था।
करीब डेढ़ दशक में रक्षा उत्पादन के क्षेत्र में हुए व्यापक निवेश, स्वदेशी तकनीक के विकास और ‘मेक इन इंडिया’ व ‘आत्मनिर्भर भारत’ जैसी पहलों के चलते भारत ने उल्लेखनीय प्रगति की है। यही वजह है कि आज देश न केवल अपनी रक्षा जरूरतों को पूरा करने की दिशा में आगे बढ़ रहा है, बल्कि वैश्विक रक्षा बाजार में भी एक विश्वसनीय आपूर्तिकर्ता के रूप में उभर रहा है।
रक्षा क्षेत्र उत्पादन में निजी कंपनियों की भूमिका अहम
‘आत्मनिर्भर भारत’ अभियान के तहत भारत ने रक्षा उत्पादन के क्षेत्र में तेजी से अपनी क्षमता बढ़ाई है। सरकार की नीतियों और स्वदेशी निर्माण पर जोर ने ऐसा इकोसिस्टम तैयार किया है, जिसमें डीआरडीओ और एचएएल जैसी सरकारी संस्थाओं के साथ टाटा, अडानी, कल्याणी ग्रुप और भारत फोर्ज जैसी निजी कंपनियां भी अहम भूमिका निभा रही हैं। अब फाइटर जेट इंजन जैसे अत्याधुनिक रक्षा उपकरणों के निर्माण में भी निजी क्षेत्र की भागीदारी बढ़ाई जा रही है।
रक्षा क्षेत्र में आत्मनिर्भरता को नई गति देने के लिए सरकार वैश्विक रणनीतिक साझेदारियों पर भी समान रूप से ध्यान दे रही है। इसी उद्देश्य से अगले 10 वर्षों के लिए ‘रक्षा फ्रेमवर्क’ तैयार किया गया है, जो भारत की नई डिफेंस डिप्लोमेसी का आधार बनेगा।
रक्षा मंत्री राजनाथ सिंह ने 3 सितंबर को नई दिल्ली में इस दस्तावेज का विमोचन किया। यह फ्रेमवर्क अगले दशक में विभिन्न देशों के साथ रक्षा सहयोग, रणनीतिक साझेदारी और वैश्विक सुरक्षा संबंधों को मजबूत करने के लिए भारत के रोडमैप और दीर्घकालिक दृष्टिकोण को सामने रखता है।अगर यह न्यूज़ वेबसाइट के लिए है, तो यह कॉपी अधिक पढ़ने योग्य, SEO-फ्रेंडली और छोटे पैराग्राफ में है।
दस्तावेज का रणनीतिक खाका
यह दस्तावेज देश की रणनीतिक प्रतिबद्धता में एक बदलाव को दर्शाता है, जिसमें राष्ट्रीय सुरक्षा उद्देश्यों को सक्रिय वैश्विक सहयोग के साथ जोड़ा गया है। इससे दीर्घकालिक स्थिरता और पारस्परिक विकास को बढ़ावा मिलता है। दस्तावेज के रणनीतिक खाके में जिन प्रमुख स्तंभों पर प्रकाश डाला गया है, वे इस प्रकार हैं-
रणनीतिक साझेदारी : द्विपक्षीय और बहुपक्षीय सुरक्षा सहयोग को मजबूत करना।
क्षमता विकास : संयुक्त सैन्य अभ्यासों और प्रशिक्षण कार्यक्रमों को बढ़ावा देना तथा मित्र देशों के साथ रक्षा के सर्वोत्तम तौर-तरीकों को साझा करना।
स्वदेशी निर्यात : भारत में निर्मित रक्षा प्लेटफार्मों को बढ़ावा देकर देश को एक विश्वसनीय वैश्विक रक्षा विनिर्माण केंद्र के रूप में स्थापित करना।
समुद्री सुरक्षा : हिंद महासागर क्षेत्र में शुद्ध सुरक्षा प्रदाता और प्रथम प्रतिक्रियाकर्ता के रूप में भारत की भूमिका को मजबूत करना।
भारत की विदेश नीति में रक्षा कूटनीति की भूमिका लगातार मजबूत होती जा रही है। इसी सोच के तहत तैयार किया गया ‘रक्षा फ्रेमवर्क’ अगले 10 वर्षों के लिए देश की रक्षा साझेदारियों और रणनीतिक प्राथमिकताओं की स्पष्ट दिशा तय करता है। इसका उद्देश्य बदलते वैश्विक हालात के बीच भारत को शांति, स्थिरता और नियम-आधारित अंतरराष्ट्रीय व्यवस्था के एक भरोसेमंद साझेदार के रूप में और मजबूत बनाना है।
बीते एक दशक में भारत का इन देशों के साथ रक्षा करार
भारत ने 2014 के बाद करीब 20 देशों के साथ रक्षा/सैन्य करार किए हैं। इसमें बांग्लादेश, बोत्स्वाना, फ्रांस, फिजी, जापान, कजाकिस्तान, केन्या, किर्गिस्तान, ओमान, पुर्तगाल, रिपब्लिक ऑफ कोरिया, रूस, सेशेल्स, सिंगापुर, सूडान, तंजानिया, तुर्केमिनिस्तान, संयुक्त अरब अमीरात, अमेरिका और वियतनाम शामिल हैं। अमेरिका, रूस, फ्रांस, जापान, ऑस्ट्रेलिया, जर्मनी और इजराइल के साथ रक्षा क्षेत्र में रणनीतिक साझेदारी विशेष दर्जे तक पहुंचे हैं।
अमेरिका से खरीदे गए उन्नत हथियार
भारत अपनी रणनीतिक स्वायत्तता बनाए रखते हुए अमेरिका, रूस, फ्रांस और इजरायल जैसे प्रमुख देशों के साथ रक्षा सहयोग को लगातार मजबूत कर रहा है। इनमें अमेरिका भारत का अहम रक्षा साझेदार बनकर उभरा है और उसे ‘मेजर डिफेंस पार्टनर’ का दर्जा भी दे चुका है।
दोनों देशों के बीच LEMOA सहित कई महत्वपूर्ण रक्षा समझौते हुए हैं, जिन्होंने सैन्य सहयोग को नई मजबूती दी है। भारत ने अमेरिका से MQ-9B ड्रोन, P-8I समुद्री गश्ती विमान, चिनूक और अपाचे हेलिकॉप्टर जैसी अत्याधुनिक रक्षा प्रणालियां खरीदी हैं। हाल ही में एंटी-टैंक मिसाइल जैवलिन के लिए भी दोनों देशों के बीच रक्षा सौदा हुआ है।
सैन्य उपकरणों की खरीद के अलावा भारत और अमेरिका नियमित संयुक्त सैन्य अभ्यास, तकनीकी सहयोग और रक्षा नवाचार पर भी साथ काम कर रहे हैं। इसका उद्देश्य हिंद-प्रशांत क्षेत्र में समुद्री सुरक्षा को मजबूत करना और क्षेत्रीय चुनौतियों का प्रभावी ढंग से सामना करना है।
भारतीय सेना में 60 से 65 प्रतिशत हथियार रूसी
रूस लंबे समय से भारत का प्रमुख रक्षा साझेदार रहा है। आज भी भारतीय सशस्त्र बलों के 60–65 प्रतिशत प्रमुख हथियार और सैन्य प्लेटफॉर्म रूसी या सोवियत मूल के हैं, हालांकि भारत अब रक्षा आयात के स्रोतों में विविधता ला रहा है।
दोनों देशों के बीच रक्षा सहयोग केवल हथियारों की खरीद तक सीमित नहीं है। लाइसेंस प्राप्त उत्पादन, स्पेयर पार्ट्स की आपूर्ति, रखरखाव, तकनीकी सहयोग और संयुक्त रक्षा परियोजनाओं के जरिए भारत-रूस की रणनीतिक साझेदारी लगातार मजबूत बनी हुई है।
फ्रांस प्रमुख रक्षा साझेदार
फ्रांस भारत का एक अहम रक्षा साझेदार है, जो तकनीकी हस्तांतरण और रक्षा उत्पादन में सहयोग पर विशेष जोर देता है। राफेल लड़ाकू विमान दोनों देशों की मजबूत रक्षा साझेदारी का सबसे बड़ा उदाहरण हैं। भारतीय वायु सेना में 36 राफेल शामिल हो चुके हैं, जबकि नौसेना के लिए राफेल-M की खरीद का भी समझौता हुआ है।
इजराइल से मिली नई तकनीक
भारत और इजराइल के बीच रक्षा सहयोग पिछले कुछ वर्षों में लगातार मजबूत हुआ है। इजराइल भारत को अत्याधुनिक निगरानी प्रणाली, मिसाइल गाइडेंस तकनीक और MRSAM/बराक-8 जैसी वायु रक्षा प्रणालियां उपलब्ध करा रहा है। इसके साथ ही दोनों देश संयुक्त अनुसंधान, रक्षा तकनीक के विकास, सैन्य प्रणालियों के आधुनिकीकरण और भारत में रक्षा उपकरणों के स्थानीय उत्पादन पर भी मिलकर काम कर रहे हैं।

