रांची की सड़कों पर बैठा भविष्य

रांची की सड़कों पर बैठे छात्र केवल नौकरी नहीं मांग रहे हैं। वे उस व्यवस्था से जवाब मांग रहे हैं जिस पर उन्होंने वर्षों तक भरोसा किया। प्रतियोगी परीक्षाओं की तैयारी में युवाओं का सबसे मूल्यवान समय, परिवार की कमाई और अनगिनत सपने दांव पर लगे होते हैं। यदि परीक्षा प्रक्रिया की निष्पक्षता पर ही प्रश्नचिह्न लग जाए, तो यह केवल एक भर्ती का विवाद नहीं रह जाता, बल्कि शासन व्यवस्था की विश्वसनीयता का संकट बन जाता है।

झारखंड में JPSC और JSSC को लेकर उठे सवाल नए नहीं हैं। भर्ती में देरी, पेपर लीक, कथित अनियमितताएं और जांच की मांग वर्षों से समय-समय पर उठती रही हैं। फर्क इतना है कि इस बार छात्रों का धैर्य टूटता दिखाई दे रहा है। लंबा धरना, भूख हड़ताल और लगातार बढ़ता जनसमर्थन इस बात का संकेत है कि यह केवल एक संगठन का आंदोलन नहीं, बल्कि व्यापक असंतोष का प्रतीक बन चुका है।

सरकार का यह कहना सही है कि जांच होगी और दोषियों पर कार्रवाई होगी। यदि वास्तव में अनियमितताएं हुई हैं तो दोषियों को दंड मिलना चाहिए। लेकिन केवल जांच का आश्वासन अब पर्याप्त नहीं है। लोकतंत्र में जनता केवल आश्वासन नहीं, समयबद्ध और पारदर्शी निर्णय भी चाहती है। सरकार जितनी देर करेगी, अविश्वास उतना गहरा होगा।

इस आंदोलन ने राजनीति के सामने भी एक आईना रखा है। जब किसी दूसरे राज्य या केंद्र में परीक्षा विवाद होता है, तब लगभग सभी राजनीतिक दल छात्रों के साथ खड़े होने का दावा करते हैं। लेकिन जब वही सवाल अपने शासन वाले राज्य में उठता है, तो स्वर बदल जाते हैं। इससे यह धारणा मजबूत होती है कि कई बार छात्रों का दर्द भी राजनीतिक सुविधा के तराजू पर तौला जाता है।

विपक्ष की भी जिम्मेदारी केवल सरकार की आलोचना तक सीमित नहीं होनी चाहिए। यदि वह वास्तव में युवाओं के साथ खड़ा है, तो उसे भर्ती सुधार, परीक्षा प्रणाली में पारदर्शिता और संस्थागत सुधार पर भी ठोस सुझाव देने चाहिए। लोकतंत्र में समाधान केवल आरोप-प्रत्यारोप से नहीं निकलते।

आज आवश्यकता किसी एक परीक्षा को बचाने या किसी सरकार की छवि बचाने की नहीं है। आवश्यकता युवाओं का भरोसा बचाने की है। यदि एक अभ्यर्थी यह मानने लगे कि उसकी मेहनत से अधिक महत्व सिफारिश, भ्रष्टाचार या अनियमितताओं का है, तो यह किसी भी लोकतंत्र के लिए गंभीर चेतावनी है।

झारखंड सरकार के सामने अभी भी अवसर है। वह केवल गिरफ्तारियों तक सीमित न रहे, बल्कि पूरी भर्ती व्यवस्था की पारदर्शी समीक्षा, समयबद्ध परीक्षा कैलेंडर, तकनीकी सुरक्षा, स्वतंत्र निगरानी और दोषियों पर कठोर कार्रवाई का स्पष्ट रोडमैप सामने रखे। इससे छात्रों का विश्वास लौट सकता है।

रांची की सड़कों पर बैठा छात्र केवल अपना भविष्य नहीं बचाना चाहता; वह उस व्यवस्था को बेहतर बनाना चाहता है जिस पर आने वाली पीढ़ियां भरोसा कर सकें। यह आवाज़ किसी दल के पक्ष या विपक्ष की नहीं, बल्कि न्याय, पारदर्शिता और अवसर की समानता की मांग है।

इतिहास गवाह है कि जब युवाओं का विश्वास डगमगाता है, तो उसका असर केवल चुनावों पर नहीं, समाज के भविष्य पर भी पड़ता है। इसलिए इस आंदोलन को कानून-व्यवस्था की समस्या मानने के बजाय शासन की विश्वसनीयता की परीक्षा के रूप में देखा जाना चाहिए।

सरकार के सामने अब सबसे बड़ा प्रश्न यही है—क्या वह केवल जांच का इंतज़ार करेगी, या ऐसा निर्णायक कदम उठाएगी जिससे यह संदेश जाए कि मेहनत करने वाले युवाओं का विश्वास किसी भी सरकार के लिए सर्वोच्च प्राथमिकता है।

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