पाकिस्तान में एक बार फिर सियासी हलचल तेज हो गई है। गृह मंत्री मोहसिन नकवी के उस बयान ने अटकलों को बढ़ा दिया है, जिसमें उन्होंने देश के इतिहास के सबसे बड़े घोटाले का खुलासा करने का दावा किया है। उन्होंने संकेत दिया कि इसमें कई जज और राजनेता शामिल हो सकते हैं, हालांकि किसी का नाम नहीं लिया। नकवी के इस बयान के बाद सरकार ने मंत्रालयों के कामकाज की समीक्षा और जवाबदेही प्रक्रिया तेज कर दी है, जिससे सत्ता में बड़े बदलाव की चर्चाएं शुरू हो गई हैं।
विश्लेषकों का मानना है कि पर्दे के पीछे पाकिस्तान के सेना प्रमुख जनरल आसिम मुनीर की ताकत और पकड़ लगातार मजबूत हो रही है। इन राजनीतिक तनावों के बीच राजधानी इस्लामाबाद में सुरक्षा कड़ी कर दी गई है और एहतियात के तौर पर कंटेनर लगाए गए हैं।
आसिम मुनीर की शातिर चाल में घिरे शहबाज?
पाकिस्तान में सियासी उठापटक की अटकलें फिर तेज हो गई हैं। आर्मी चीफ फील्ड मार्शल असीम मुनीर के करीबी माने जाने वाले गृह मंत्री मोहसिन नकवी के बयानों ने शहबाज शरीफ सरकार पर सवाल खड़े कर दिए हैं। नकवी के लगातार हमलों को सत्ता के अंदर बढ़ते मतभेद से जोड़कर देखा जा रहा है। वहीं, सेना प्रमुख मुनीर के बढ़ते प्रभाव के बीच इस्लामाबाद में राजनीतिक समीकरण बदलने की चर्चाएं तेज हो गई हैं।
नकवी देख रहे हैं बड़ा सपना?
पाकिस्तान में गृह मंत्री और PCB प्रमुख मोहसिन नकवी की बढ़ती भूमिका को लेकर सियासी चर्चाएं तेज हैं। नकवी को सेना प्रमुख असीम मुनीर का करीबी माना जाता है और दोनों के बीच मजबूत रिश्तों की वजह से उन्हें कई अहम जिम्मेदारियां मिली हैं। अमेरिका-ईरान के बीच कूटनीतिक प्रयासों में भी नकवी की भूमिका चर्चा में रही है। माना जा रहा है कि सेना के बढ़ते प्रभाव के बीच नकवी को आगे लाना पाकिस्तान की सत्ता के अंदर नए समीकरणों का संकेत हो सकता है।
पीएम शहबाज शरीफ ने क्या कहा?
पाकिस्तान में शहबाज शरीफ सरकार ने सरकारी कामकाज को लेकर सख्त रुख अपनाया है। प्रधानमंत्री ने सभी संघीय मंत्रालयों और विभागों के प्रदर्शन की समीक्षा के आदेश दिए हैं। मंत्रालयों से फरवरी 2024 से अब तक की उपलब्धियों की विस्तृत रिपोर्ट और उनके समर्थन में दस्तावेजी सबूत जमा करने को कहा गया है।
शहबाज शरीफ के राजनीतिक सलाहकार राणा सनाउल्लाह ने मोहसिन नकवी के बयान पर सवाल उठाते हुए इसे समझ से परे और बेबुनियाद बताया। उन्होंने उन अटकलों को भी खारिज कर दिया, जिनमें सेना की ओर से किसी नए प्रशासनिक ढांचे या बदलाव के लिए समय-सीमा तय किए जाने की बात कही जा रही थी।
ख्वाजा आसिफ का बड़ा दावा
रक्षा मंत्री ख्वाजा आसिफ के बयान ने पाकिस्तान की सियासत में हलचल और बढ़ा दी है। उन्होंने गृह मंत्री मोहसिन नकवी की कार्यप्रणाली पर सवाल उठाते हुए कहा कि अगर सरकार का अहम हिस्सा ही सिस्टम से नाराजगी जता रहा है, तो यह गंभीर चिंता का विषय है। आसिफ के इस बयान ने सरकार के अंदरूनी मतभेदों की चर्चाओं को और तेज कर दिया है।
आसिम मुनीर का मुशर्रफ मॉडल
बलूचिस्तान और पीओके में बढ़ते असंतोष के बीच पाकिस्तान में सत्ता के समीकरणों को लेकर चर्चाएं तेज हो गई हैं। अटकलें हैं कि सेना प्रमुख असीम मुनीर अपने करीबी मोहसिन नकवी के जरिए प्रशासनिक बदलावों और नए प्रांतों के मुद्दे को आगे बढ़ा रहे हैं। नकवी ने सुशासन और न्याय व्यवस्था के नाम पर नई प्रशासनिक इकाइयों की जरूरत बताई है, जबकि इस मुद्दे पर सत्तारूढ़ पीएमएल-एन और पीपीपी की चुप्पी भी चर्चा का विषय बनी हुई है।
कब कब पाकिस्तान में हुआ तख्तापलट
1947 में आजादी के बाद से पाकिस्तान का राजनीतिक इतिहास कई बार सैन्य हस्तक्षेप का गवाह रहा है। 1958 से 1971, 1977 से 1988 और 1999 से 2008 तक देश में सेना का सीधा शासन रहा। इससे पहले 1953-54 में भी संवैधानिक संकट पैदा हुआ था, जब गवर्नर-जनरल गुलाम मुहम्मद ने प्रधानमंत्री ख्वाजा नजीमुद्दीन की सरकार को हटाकर बाद में संविधान सभा को भंग कर दिया था।
1958 का तख्तापलट
•पाकिस्तान के इतिहास में सत्ता संघर्ष का एक बड़ा उदाहरण 1958 में देखने को मिला। तत्कालीन राष्ट्रपति इस्कंदर अली मिर्जा ने संविधान सभा और प्रधानमंत्री फिरोज खान नून की सरकार को भंग कर मार्शल लॉ लागू किया। इसके बाद जनरल अयूब खान को मार्शल लॉ प्रशासक बनाया गया, लेकिन कुछ ही दिनों बाद अयूब खान ने मिर्जा को हटाकर खुद राष्ट्रपति पद संभाल लिया।
•साल 1971 में, कई सैन्य अधिकारियों ने सरकार के खिलाफ विद्रोह किया, जिससे सरकार को इस्तीफा देना पड़ा और सत्ता जुल्फीकार अली भुट्टो को सौंपनी पड़ी।
•अक्टूबर 1999 में पाकिस्तान में एक और सैन्य तख्तापलट हुआ। सेना प्रमुख जनरल परवेज मुशर्रफ के समर्थक अधिकारियों ने प्रधानमंत्री नवाज शरीफ और उनकी सरकार के प्रमुख नेताओं को हिरासत में ले लिया। यह कदम शरीफ सरकार द्वारा मुशर्रफ को पद से हटाने और उनके विमान की लैंडिंग रोकने की कोशिश के बाद उठाया गया था।
•अगस्त 1988 में जिया-उल-हक की मौत के बाद गुलाम इशाक खान पाकिस्तान के राष्ट्रपति बने। सेना के करीबी माने जाने वाले खान के पास राष्ट्रपति पद पर काफी शक्तियां थीं। उन्होंने अपने कार्यकाल में 1990 में बेनजीर भुट्टो और 1993 में नवाज शरीफ की सरकारों को बर्खास्त किया, हालांकि बाद में राजनीतिक दबाव के चलते उन्हें खुद भी पद छोड़ना पड़ा।
तख्तापलट की नाकाम कोशिशें
•1951 में पाकिस्तान में रावलपिंडी साजिश का मामला सामने आया था। इसकी अगुवाई मेजर जनरल अकबर खान ने की थी, जिसमें कुछ सैन्य अधिकारियों और वामपंथी समर्थकों पर तत्कालीन प्रधानमंत्री लियाकत अली खान की सरकार के खिलाफ साजिश रचने का आरोप लगा था।
•1973 में, ब्रिगेडियर अली, मेजर फारूक एडम खान, स्क्वाड्रन लीडर घौस, कर्नल अलीम अफरीदी और लेफ्टिनेंट कर्नल तारिक रफी ने जुल्फिकार अली भुट्टो की सरकार के खिलाफ तख्तापलट की साजिश रची ताकि एक क्रांतिकारी सैन्य शासन (जंटा) स्थापित किया जा सके। तख्तापलट की साजिश रचने वालों का कोर्ट-मार्शल किया गया और उन्हें गिरफ्तार कर लिया गया।
•1980 में, मेजर जनरल तजम्मुल हुसैन मलिक की ओर से 23 मार्च 1980 (पाकिस्तान दिवस) को जिया-उल-हक की हत्या करने की साजिश का पर्दाफाश हुआ और उसे नाकाम कर दिया गया
•1984 में, जनरल जिया-उल-हक की सरकार को तख्तापलट की एक और कोशिश का सामना करना पड़ा, जो 1980 की नाकाम साजिश के ठीक चार साल बाद हुई थी। इंटर-सर्विसेज इंटेलिजेंस (ISI) ने इस कोशिश को नाकाम कर दिया और साजिश रचने वाले सभी लोगों को गिरफ्तार कर लिया गया।
•1980 में, मेजर जनरल तजम्मुल हुसैन मलिक की ओर से 23 मार्च 1980 (पाकिस्तान दिवस) को जिया-उल-हक की हत्या करने की साजिश का पर्दाफाश हुआ और उसे नाकाम कर दिया गया
•1984 में, जनरल जिया-उल-हक की सरकार को तख्तापलट की एक और कोशिश का सामना करना पड़ा, जो 1980 की नाकाम साजिश के ठीक चार साल बाद हुई थी। इंटर-सर्विसेज इंटेलिजेंस (ISI) ने इस कोशिश को नाकाम कर दिया और साजिश रचने वाले सभी लोगों को गिरफ्तार कर लिया गया।
•1995 में, इस्लामी चरमपंथियों के समर्थन से मेजर जनरल ज़हीरुल इस्लाम अब्बासी की अगुवाई में बेनजीर भुट्टो की सरकार के खिलाफ तख्तापलट की कोशिश नाकाम हो गई।

