नीट पेपर लीक को लेकर पूरे देश में आक्रोश है। दिल्ली से लेकर पटना तक छात्र सड़कों पर हैं। संसद से लेकर सड़क तक केंद्रीय शिक्षा मंत्री के इस्तीफे की मांग हो रही है। लोकतंत्र में यह स्वाभाविक है कि जब किसी बड़ी परीक्षा की विश्वसनीयता पर सवाल उठे, तो राजनीतिक जवाबदेही भी तय करने की मांग उठे।
लेकिन सवाल यह है कि क्या सिर्फ एक मंत्री के इस्तीफे से वह व्यवस्था बदल जाएगी, जिसने वर्षों से लाखों युवाओं के सपनों को बार-बार झटका दिया है?
बिहार इसका सबसे बड़ा उदाहरण है। पिछले कुछ वर्षों में शायद ही कोई ऐसी बड़ी भर्ती परीक्षा हुई हो, जिस पर विवाद न हुआ हो। BPSC, शिक्षक भर्ती, बिहार पुलिस कांस्टेबल भर्ती, NEET—हर मामले में लगभग एक जैसी कहानी सामने आई। परीक्षा रद्द हुई, जांच एजेंसियां सक्रिय हुईं, गिरफ्तारियां हुईं, प्रेस कॉन्फ्रेंस हुईं और सरकार ने भरोसा दिलाया कि दोषियों को बख्शा नहीं जाएगा।
लेकिन कुछ महीने या कुछ साल बाद फिर वही सवाल सामने आ जाता है—आखिर हुआ क्या?
2023 की बिहार पुलिस कांस्टेबल भर्ती परीक्षा इसका बड़ा उदाहरण है। लगभग 18 लाख अभ्यर्थियों की परीक्षा रद्द हुई। आर्थिक अपराध इकाई (EOU) ने जांच की। कई गिरफ्तारियां हुईं। जांच की आंच तत्कालीन केंद्रीय चयन पर्षद (CSBC) के अध्यक्ष एवं पूर्व डीजीपी एस. के. सिंघल तक पहुंची। EOU ने उनके खिलाफ विभागीय कार्रवाई की सिफारिश भी की। लेकिन आज तक सार्वजनिक रूप से यह स्पष्ट नहीं हो पाया कि उस सिफारिश का अंतिम परिणाम क्या हुआ।
इसी तरह, संजीव मुखिया का नाम वर्षों से कई चर्चित पेपर लीक मामलों में सामने आता रहा है। जांच एजेंसियों ने उन्हें कई मामलों में कथित मास्टरमाइंड या किंगपिन बताया है। उनके खिलाफ पुराने मामलों से लेकर शिक्षक भर्ती (TRE-3) और NEET-UG तक जांच चलती रही। एक मामले में उन्हें वैधानिक (डिफॉल्ट) जमानत मिली, जबकि अन्य मामलों में वे न्यायिक प्रक्रिया का सामना कर रहे हैं। लेकिन यहां भी बड़ा सवाल वही है—यदि एक ही कथित नेटवर्क का नाम वर्षों तक सामने आता रहा, तो उसे पूरी तरह ध्वस्त करने में व्यवस्था इतनी असफल क्यों रही?
यह स्पष्ट करना भी जरूरी है कि जांच एजेंसी के आरोप या सिफारिश किसी व्यक्ति को दोषी सिद्ध नहीं करते। अंतिम निर्णय अदालत और विधिसम्मत प्रक्रिया ही करती है। लेकिन यदि वर्षों बाद भी मुकदमे लंबित रहें, विभागीय कार्रवाई का परिणाम सामने न आए और जांच का अंतिम निष्कर्ष लोगों तक न पहुंचे, तो सवाल केवल व्यक्तियों पर नहीं, बल्कि पूरी जवाबदेही व्यवस्था पर उठता है।
सबसे बड़ी विडंबना यह है कि इस पूरी प्रक्रिया का सबसे बड़ा नुकसान न सरकार को होता है, न नेताओं को और न ही अधिकारियों को।
सबसे बड़ी कीमत चुकाता है वह छात्र, जिसने वर्षों तक तैयारी की, परीक्षा रद्द होने पर फिर से पढ़ाई शुरू की, उम्र का एक और वर्ष खो दिया और फिर भी यह नहीं जान पाया कि उसकी मेहनत के साथ खिलवाड़ करने वालों का अंतिम अंजाम क्या हुआ।
इस पूरे विवाद का एक और चिंताजनक पहलू है। जब पत्रकार पेपर लीक नेटवर्क, सत्ता, प्रशासन और जांच एजेंसियों से असहज सवाल पूछते हैं, तब कई बार उन्हें धमकियों, मुकदमों या हमलों का सामना करना पड़ता है। लोकतंत्र में यह बेहद गंभीर विषय है। यदि सच सामने लाने वाले पत्रकार ही भयमुक्त नहीं होंगे, तो व्यवस्था की कमियां उजागर कौन करेगा?
युवाओं को अब केवल गिरफ्तारियों की संख्या नहीं चाहिए। वे जानना चाहते हैं—
- कितने मामलों में अंतिम सजा हुई?
- कितने सरकारी अधिकारियों की जवाबदेही तय हुई?
- कितने लोगों की नौकरी गई?
- कथित पेपर लीक नेटवर्क पर स्थायी कार्रवाई क्या हुई?
- और सरकार ने ऐसी घटनाओं की पुनरावृत्ति रोकने के लिए कौन-से संस्थागत सुधार किए?
यदि केंद्रीय शिक्षा मंत्री इस्तीफा भी दे दें, तो क्या यह गारंटी है कि अगली परीक्षा में पेपर लीक नहीं होगा? यदि उत्तर ‘नहीं’ है, तो बहस केवल इस्तीफे तक सीमित नहीं रहनी चाहिए। बहस उस व्यवस्था को बदलने की होनी चाहिए, जो बार-बार विफल हो रही है।
देश के युवाओं को केवल चेहरे बदलने की राजनीति नहीं चाहिए। उन्हें ऐसी व्यवस्था चाहिए जिसमें परीक्षा ईमानदारी से हो, जांच समयबद्ध हो, मुकदमों का शीघ्र निपटारा हो, दोषियों को सजा मिले और जवाबदेही शीर्ष से लेकर निचले स्तर तक तय हो।
क्योंकि लोकतंत्र की असली जीत किसी मंत्री के इस्तीफे में नहीं, बल्कि उस व्यवस्था के निर्माण में है जहां किसी छात्र को अपनी मेहनत पर संदेह न करना पड़े, किसी पत्रकार को सच लिखने से डरना न पड़े और किसी पेपर लीक गिरोह को यह भरोसा न हो कि समय के साथ मामला ठंडा पड़ जाएगा।

