दुनिया का 450 साल पुराना नक्शा बदलने की तैयारी? UNGA में 164 देशों का साथ, अमेरिका अकेला

UNGA World Map Resolution: संयुक्त राष्ट्र महासभा (UNGA) ने दुनिया में लंबे समय से इस्तेमाल किए जा रहे वैश्विक मानचित्र को लेकर एक अहम प्रस्ताव को मंजूरी दी है। टोगो की ओर से पेश किए गए इस प्रस्ताव का उद्देश्य मौजूदा नक्शों में मौजूद भौगोलिक असमानताओं को दूर करना और अलग-अलग महाद्वीपों के आकार को उनकी वास्तविक स्थिति के अधिक करीब दिखाना है। प्रस्ताव को वैश्विक मानचित्रों में भौगोलिक सटीकता और संतुलन की दिशा में एक महत्वपूर्ण कदम माना जा रहा है।
एपी और पीटीआई की रिपोर्ट के अनुसार, 193 सदस्यीय संयुक्त राष्ट्र महासभा में प्रस्ताव के पक्ष में 164 देशों ने मतदान किया। भारत ने भी इसके समर्थन में वोट किया, जबकि अमेरिका ने प्रस्ताव के खिलाफ मतदान किया। वहीं, एस्टोनिया, जॉर्जिया, लिथुआनिया, मोलदोवा, सर्बिया और यूक्रेन समेत छह देशों ने वोटिंग में हिस्सा नहीं लिया।

आखिर मर्केटर मैप (Mercator Projection) के साथ क्या समस्या है?
आज स्कूलों की किताबों से लेकर डिजिटल प्लेटफॉर्म और मीडिया तक, दुनिया का नक्शा दिखाने के लिए बड़े पैमाने पर ‘मर्केटर प्रोजेक्शन’ का इस्तेमाल होता है। इसे फ्लेमिश कार्टोग्राफर जेरार्डस मर्केटर ने 1569 में तैयार किया था। उस दौर में इसका मुख्य इस्तेमाल समुद्री यात्राओं के दौरान दिशा और मार्ग तय करने के लिए किया जाता था। पृथ्वी के गोल आकार को सपाट कागज पर उतारने की प्रक्रिया में इस प्रोजेक्शन ने दिशाओं और कोणों को सही रखने को प्राथमिकता दी, लेकिन इसका असर यह हुआ कि भूमध्य रेखा से दूर स्थित क्षेत्रों का आकार नक्शे पर वास्तविकता से बड़ा दिखाई देने लगा।
मर्केटर प्रोजेक्शन को लेकर सबसे बड़ी आपत्ति इसके आकार संबंधी अंतर को लेकर है। इस नक्शे में अफ्रीका, लैटिन अमेरिका और दक्षिण एशिया जैसे क्षेत्रों का वास्तविक आकार अनुपात बिगड़ा हुआ नजर आता है, जबकि यूरोप और उत्तरी अमेरिका अपेक्षाकृत बड़े दिखाई देते हैं। इसका सबसे चर्चित उदाहरण ग्रीनलैंड और अफ्रीका का है। नक्शे पर दोनों लगभग समान आकार के नजर आ सकते हैं, लेकिन वास्तविक क्षेत्रफल के हिसाब से अफ्रीका ग्रीनलैंड से करीब 14 गुना बड़ा है। यही वजह है कि सही भौगोलिक अनुपात दिखाने वाले वैकल्पिक मानचित्रों की जरूरत पर लगातार चर्चा होती रही है।

‘इक्वल अर्थ’ नक्शा और UNGA का नया फैसला
संयुक्त राष्ट्र महासभा के ‘करेक्ट द मैप’ प्रस्ताव में लंबे समय से इस्तेमाल हो रहे मानचित्रों के प्रभाव को लेकर चिंता जताई गई है। प्रस्ताव के अनुसार, नक्शों में देशों और महाद्वीपों के आकार को गलत अनुपात में दिखाए जाने का असर केवल भूगोल तक सीमित नहीं रहा, बल्कि इसका प्रभाव शिक्षा, संस्कृति, इतिहास और वैश्विक राजनीतिक सोच पर भी पड़ा है। इससे दुनिया को देखने और समझने का नजरिया एक हद तक असंतुलित हो सकता है।
प्रस्ताव में 2018 में विकसित किए गए ‘इक्वल अर्थ’ (Equal Earth) प्रोजेक्शन को बेहतर विकल्प के तौर पर समर्थन दिया गया है। यह प्रोजेक्शन पृथ्वी के महाद्वीपों को उनके वास्तविक क्षेत्रफल के अधिक समान अनुपात में दिखाने के लिए तैयार किया गया है। टोगो के विदेश मंत्री रॉबर्ट डसी ने कहा कि नक्शे सिर्फ भौगोलिक जानकारी देने का माध्यम नहीं हैं, बल्कि वे शिक्षा और दुनिया को देखने की हमारी समझ को भी प्रभावित करते हैं। हालांकि, संयुक्त राष्ट्र ने स्पष्ट किया है कि प्रस्ताव के जरिए किसी देश या संस्था पर नया नक्शा अपनाने की बाध्यता नहीं है। इसका उद्देश्य स्कूलों, मीडिया और सरकारों को अधिक संतुलित मानचित्रों के इस्तेमाल के लिए प्रोत्साहित करना है।

भारत ने समर्थन में वोट क्यों दिया और क्या रखी शर्त?
संयुक्त राष्ट्र महासभा में भारत ने ‘करेक्ट द मैप’ प्रस्ताव के उद्देश्य का समर्थन किया। भारत की ओर से संयुक्त राष्ट्र में प्रथम सचिव राघू पुरी ने कहा कि नक्शे लोगों को दुनिया के आकार और भौगोलिक वास्तविकताओं को समझने में अहम भूमिका निभाते हैं। ऐसे में मानचित्रों में क्षेत्रों और महाद्वीपों के आकार को सही अनुपात में दिखाना जरूरी है, ताकि दुनिया की भौगोलिक तस्वीर को बेहतर तरीके से समझा जा सके।
हालांकि, भारत ने प्रस्ताव को लेकर एक अहम तकनीकी बात भी स्पष्ट की। भारत का कहना है कि इसका समर्थन किसी एक खास प्रोजेक्शन, जैसे ‘इक्वल अर्थ’, को बढ़ावा देने के तौर पर नहीं देखा जाना चाहिए, बल्कि ‘इक्वल एरिया’ प्रोजेक्शन के व्यापक इस्तेमाल को प्रोत्साहित करने के रूप में समझा जाना चाहिए। राघू पुरी ने जोर दिया कि अलग-अलग उद्देश्यों के लिए अलग तरह के नक्शों की आवश्यकता होती है और कोई एक प्रोजेक्शन हर स्थिति में उपयुक्त नहीं हो सकता। इसलिए मानचित्र चयन की प्रक्रिया तकनीकी रूप से निष्पक्ष रखी जानी चाहिए, ताकि देश अपनी जरूरत और उपयोग के अनुसार उपयुक्त प्रोजेक्शन चुन सकें।

अमेरिका ने विरोध क्यों किया और पाकिस्तान का रुख क्या रहा?
दूसरी ओर, अमेरिका ने संयुक्त राष्ट्र महासभा में पेश किए गए इस प्रस्ताव का विरोध किया। अमेरिकी प्रतिनिधि यारीना फेरेंसेविच ने इसे संयुक्त राष्ट्र के लिए प्राथमिकता से भटकने वाला मुद्दा बताया। उनके मुताबिक, संगठन को अंतरराष्ट्रीय शांति, आर्थिक समृद्धि और दुनिया के सामने मौजूद गंभीर चुनौतियों पर ध्यान केंद्रित करना चाहिए, न कि सदियों पुराने मानचित्रों और कथित वैचारिक मुद्दों पर चर्चा करनी चाहिए। अमेरिका ने यह भी तर्क दिया कि इस तरह के प्रस्ताव संयुक्त राष्ट्र की प्रासंगिकता और विश्वसनीयता पर सवाल खड़े कर सकते हैं।
पाकिस्तान ने प्रस्ताव के पक्ष में अपना वोट दिया, लेकिन इसके दायरे को लेकर अपनी स्थिति भी साफ की। पाकिस्तान के अनुसार, प्रस्ताव का उद्देश्य मुख्य रूप से शिक्षा और महाद्वीपों के वास्तविक आकार को बेहतर तरीके से प्रदर्शित करना है। इसका किसी देश की अंतरराष्ट्रीय सीमाओं या उन क्षेत्रों की कानूनी स्थिति पर कोई प्रभाव नहीं पड़ेगा, जिन्हें संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद के स्तर पर विवादित माना जाता है।

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