PM मोदी के कथित अपमान पर रुचिका सिंह पर जीरो FIR, जानिए दूसरे देशों में ऐसे मामलों में क्या होती है कार्रवाई

23 जुलाई को दिल्ली के जंतर-मंतर पर आयोजित कॉकरोच जनता पार्टी (CJP) के प्रदर्शन के दौरान एक प्रदर्शनकारी द्वारा कथित तौर पर प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के खिलाफ आपत्तिजनक टिप्पणी किए जाने का मामला सामने आया। घटना का वीडियो सोशल मीडिया पर तेजी से वायरल होने के बाद संबंधित व्यक्ति के खिलाफ FIR दर्ज की गई है। इस घटना ने एक अहम कानूनी बहस को जन्म दिया है कि क्या भारत में प्रधानमंत्री या राष्ट्रपति के खिलाफ अपमानजनक टिप्पणी करना अपराध की श्रेणी में आता है। साथ ही यह भी जानना दिलचस्प है कि अमेरिका, जर्मनी, ब्रिटेन जैसे लोकतांत्रिक देशों में ऐसे मामलों से किस तरह निपटा जाता है और वहां इसके लिए क्या कानूनी प्रावधान हैं।

सोशल मीडिया पर तेजी से वायरल हुआ रुचिका सिंह का वीडियो
23 जुलाई 2026 को दिल्ली के जंतर-मंतर पर NEET पेपर लीक के विरोध में आयोजित छात्र प्रदर्शन के दौरान एक वीडियो सोशल मीडिया पर सामने आया, जिसमें रुचिका सिंह नाम की एक युवती कथित तौर पर प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के खिलाफ आपत्तिजनक भाषा का इस्तेमाल करती दिखाई दी। कुछ मीडिया रिपोर्ट्स में दावा किया गया कि वीडियो में इटली की प्रधानमंत्री जॉर्जिया मेलोनी के लिए भी अपमानजनक टिप्पणी की गई है। वीडियो वायरल होने के बाद सुप्रीम कोर्ट की अधिवक्ता स्मृति सिंह चंदेल की शिकायत पर 29 जुलाई को नोएडा एक्सप्रेसवे थाने में जीरो FIR दर्ज की गई। मामला भारतीय न्याय संहिता (BNS) की धाराओं 352, 353(1) और 356(1) के तहत दर्ज किया गया है, जो मानहानि, सार्वजनिक शांति भंग करने की मंशा और संबंधित अपराधों से जुड़े प्रावधानों से संबंधित हैं।

नोएडा से दिल्ली ट्रांसफर हुआ केस
चूंकि यह मामला दिल्ली के जंतर-मंतर से जुड़ा है, जो दिल्ली पुलिस के अधिकार क्षेत्र में आता है, इसलिए जीरो FIR दर्ज होने के बाद केस को आगे की जांच के लिए दिल्ली पुलिस को स्थानांतरित कर दिया गया। FIR के अनुसार, आरोपी के कथित बयान से “संवैधानिक पद की गरिमा” को ठेस पहुंची है और यह सार्वजनिक शांति भंग करने तथा समाज में वैमनस्य फैलाने की मंशा को दर्शाता है। मामले की जांच के साथ-साथ दिल्ली पुलिस ने सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म X (पूर्व में ट्विटर) के कुछ अकाउंट्स को भी नोटिस जारी किया है, ताकि वीडियो से संबंधित कथित आपत्तिजनक सामग्री को हटाया जा सके।

भारत में सामान्य आपराधिक धाराओं के तहत दर्ज होते हैं केस
भारत में प्रधानमंत्री या राष्ट्रपति के खिलाफ अपमानजनक टिप्पणी करने को लेकर कोई अलग या विशेष दंडात्मक कानून नहीं है। ऐसे मामलों में कार्रवाई आमतौर पर भारतीय न्याय संहिता (BNS) की उन धाराओं के तहत की जाती है, जो मानहानि, सार्वजनिक शांति भंग करने, वैमनस्य फैलाने या अन्य संबंधित अपराधों से जुड़ी होती हैं। यानी कानून की नजर में इन मामलों के लिए कोई अलग प्रावधान नहीं है, बल्कि वही सामान्य कानूनी प्रक्रियाएं लागू होती हैं जो अन्य नागरिकों से जुड़े मामलों में भी लागू होती हैं। हालांकि, जब मामला किसी संवैधानिक पद पर आसीन व्यक्ति से जुड़ा होता है, तो उसकी संवेदनशीलता, जांच की गति और सार्वजनिक व राजनीतिक चर्चा का स्तर अपेक्षाकृत अधिक देखने को मिलता है।

बिहार में पीएम मोदी की मां के बारे में कहा गया ‘अपशब्द’
इस तरह के मामले पहले भी सामने आ चुके हैं। पिछले वर्ष बिहार में राहुल गांधी की ‘वोटर अधिकार यात्रा’ के दौरान एक व्यक्ति को मंच से प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और उनकी दिवंगत मां के खिलाफ कथित आपत्तिजनक टिप्पणी करने के आरोप में गिरफ्तार किया गया था। इसी तरह समाजवादी पार्टी के विधायक मनोज पांडे के खिलाफ भी प्रधानमंत्री पर कथित अपमानजनक टिप्पणी को लेकर मामला दर्ज किया जा चुका है। इन घटनाओं से यह स्पष्ट होता है कि इस तरह के विवाद समय-समय पर सामने आते रहे हैं और आरोप किसी भी राजनीतिक विचारधारा या दल से जुड़े व्यक्ति पर लग सकते हैं।

बाकी देशों में क्या होता है
दुनिया के अलग-अलग देशों में राष्ट्राध्यक्षों के अपमान से जुड़े मामलों को लेकर अलग-अलग कानूनी व्यवस्थाएं लागू हैं। मोटे तौर पर इन्हें तीन प्रमुख मॉडलों में बांटा जा सकता है। पहला है सख्त कानूनी व्यवस्था, जिसका सबसे प्रमुख उदाहरण थाईलैंड है। वहां राजा या शाही परिवार के खिलाफ अपमानजनक टिप्पणी करना गंभीर आपराधिक अपराध माना जाता है और दोषी पाए जाने पर कई वर्षों की जेल तक की सजा हो सकती है। जॉर्डन में भी राजा के अपमान पर एक से तीन साल तक के कारावास का प्रावधान है और अतीत में प्रदर्शनों या सार्वजनिक अभिव्यक्तियों के दौरान की गई टिप्पणियों पर भी कार्रवाई के मामले सामने आए हैं। दूसरी ओर यूरोप के कई देशों का दृष्टिकोण अलग है। उदाहरण के लिए जर्मनी में 2016 में कॉमेडियन जान बोहमरमन द्वारा तुर्की के राष्ट्रपति रेचेप तैय्यप एर्दोआन पर व्यंग्यात्मक कविता पढ़े जाने के बाद बड़ा विवाद खड़ा हुआ था। उस समय तुर्की ने जर्मनी के तत्कालीन सेक्शन 103 के तहत कार्रवाई की मांग की, जो विदेशी राष्ट्राध्यक्षों के अपमान को अपराध मानता था। हालांकि व्यापक बहस के बाद जर्मनी ने 2017 में इस प्रावधान को समाप्त कर दिया और इसे समय के अनुरूप नहीं माना।

स्विटजरलैंड में विदेशी नेता के अपमान पर 3 साल की सजा
जर्मनी में 2017 में केवल विदेशी राष्ट्राध्यक्षों के अपमान को अपराध मानने वाले प्रावधान को समाप्त किया गया था। हालांकि, देश के अपने राष्ट्रपति के खिलाफ अपमानजनक टिप्पणी को लेकर आज भी कानूनी प्रावधान मौजूद हैं, जिनके तहत दोषी पाए जाने पर तीन महीने से लेकर पांच वर्ष तक की सजा हो सकती है। वहीं, स्विट्जरलैंड में भी विदेशी राष्ट्राध्यक्ष के सार्वजनिक अपमान को दंडनीय अपराध माना जाता है और इसके लिए अधिकतम तीन साल तक के कारावास का प्रावधान है। दूसरी ओर, अमेरिका जैसे देशों का दृष्टिकोण इससे काफी अलग है। वहां अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता को व्यापक संवैधानिक संरक्षण प्राप्त है। अमेरिकी संविधान के प्रथम संशोधन (First Amendment) के तहत राष्ट्रपति की आलोचना करना, उनका मजाक उड़ाना या उनके खिलाफ तीखी टिप्पणी करना सामान्यतः ‘फ्री स्पीच’ का हिस्सा माना जाता है, बशर्ते ऐसी अभिव्यक्ति हिंसा भड़काने, प्रत्यक्ष धमकी देने या किसी अन्य अवैध कृत्य की सीमा को पार न करे।

कानूनी कार्रवाई को लेकर दुनिया बंटी हुई है
संवैधानिक पदों पर आसीन व्यक्तियों के खिलाफ अपमानजनक भाषा के इस्तेमाल को लेकर दुनिया के देशों का कानूनी नजरिया एक जैसा नहीं है। कुछ देशों में ऐसे मामलों में बेहद कड़े कानून लागू हैं, जबकि कुछ लोकतांत्रिक देशों में अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता को प्राथमिकता दी जाती है। उदाहरण के तौर पर थाईलैंड और जॉर्डन में राजा या राष्ट्राध्यक्ष के खिलाफ अपमानजनक टिप्पणी करने पर जेल तक की सजा हो सकती है। इसके विपरीत, अमेरिका में राष्ट्रपति की आलोचना या तीखी टिप्पणी को सामान्यतः अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता के दायरे में माना जाता है। भारत की बात करें तो यहां इस तरह के मामलों के लिए कोई अलग विशेष कानून नहीं है, लेकिन व्यवहार में ऐसे मामलों में एक स्पष्ट कानूनी और प्रशासनिक पैटर्न देखने को मिलता है।

…तो तुरंत दर्ज हो जाती है एफआईआर
भारत में विभिन्न सरकारों के कार्यकाल के दौरान यह देखा गया है कि प्रधानमंत्री या मुख्यमंत्री जैसे संवैधानिक पदों पर आसीन व्यक्तियों के खिलाफ कथित अपमानजनक टिप्पणियों के मामलों में अक्सर कानूनी कार्रवाई की जाती रही है। ऐसे मामले केवल किसी एक दल या मौजूदा सरकार तक सीमित नहीं रहे, बल्कि अलग-अलग समय पर विभिन्न राजनीतिक दलों से जुड़े नेताओं और कार्यकर्ताओं के खिलाफ भी मानहानि या अन्य प्रासंगिक धाराओं में मुकदमे दर्ज हुए हैं। ऐसे मामलों के बीच सबसे बड़ा सवाल यही है कि संवैधानिक पदों की गरिमा की रक्षा और नागरिकों की अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता के बीच संतुलन कैसे बनाया जाए। कानूनी विशेषज्ञों का मानना है कि हिंसा, नफरत फैलाने या कानून-व्यवस्था को प्रभावित करने वाली गतिविधियों पर कार्रवाई आवश्यक है, लेकिन केवल तीखी या आपत्तिजनक भाषा के आधार पर आपराधिक मुकदमा दर्ज करने का मुद्दा आज भी संवैधानिक और कानूनी बहस का विषय बना हुआ है। भारत में इस संतुलन की स्पष्ट और सर्वमान्य सीमा को लेकर अभी भी अलग-अलग कानूनी व्याख्याएं सामने आती हैं।

Leave a Comment

Your email address will not be published. Required fields are marked *

बिहार के इन 2 हजार लोगों का धर्म क्या है? विश्व का सबसे अमीर क्रिकेट बोर्ड कौन सा है? दंतेवाड़ा एक बार फिर नक्सली हमले से दहल उठा SATISH KAUSHIK PASSES AWAY: हंसाते हंसाते रुला गए सतीश, हृदयगति रुकने से हुआ निधन India beat new Zealand 3-0. भारत ने किया कीवियों का सूपड़ा साफ, बने नम्बर 1