अमेरिका-ईरान जंग का नया मोर्चा! रेड सी में हूती-सऊदी टकराव से बढ़ा संकट

US Iran War: यमन में हूती विद्रोहियों के हमले, सऊदी अरब के जवाबी एयरस्ट्राइक, इराक में ईरान समर्थित ठिकानों पर अमेरिका और सऊदी की संयुक्त बमबारी, जॉर्डन पर ईरानी मिसाइल हमले और मिस्र के बंदरगाह पर प्राकृतिक गैस (LNG) से भरे जहाजों में लगी आग—इन घटनाओं ने पूरे मिडिल ईस्ट को एक बार फिर युद्ध के मुहाने पर ला खड़ा किया है। हालात ऐसे हैं कि क्षेत्र का लगभग हर प्रमुख देश किसी न किसी रूप में इस संघर्ष की चपेट में आता दिख रहा है। हालिया विदेशी मीडिया रिपोर्टों के अनुसार, अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप द्वारा ईरान पर नए सैन्य हमलों को मंजूरी दिए जाने के बाद क्षेत्र में तनाव और अधिक बढ़ गया है।
हालांकि, पहली नजर में यह कई अलग-अलग मोर्चों पर छिड़ी लड़ाइयों का सिलसिला लगता है, लेकिन गहराई से देखने पर इन सभी घटनाओं की एक साझा कड़ी सामने आती है। दरअसल, यह पूरा घटनाक्रम अमेरिका और ईरान के बीच जारी संघर्ष का विस्तार है, जिसका सबसे अहम केंद्र होर्मुज जलडमरूमध्य (Strait of Hormuz) बन चुका है। यही वह रणनीतिक समुद्री मार्ग है, जिस पर नियंत्रण को लेकर दोनों पक्ष आमने-सामने हैं और जिसके कारण पूरे मिडिल ईस्ट में नए-नए मोर्चे खुलते जा रहे हैं। आइए समझते हैं कि यह संघर्ष किस तरह पूरे क्षेत्र को अपनी गिरफ्त में लेता जा रहा है।

असली जड़: होर्मुज की जंग और ईंधन आपूर्ति की लड़ाई
मिडिल ईस्ट में जारी इस संघर्ष का सबसे अहम केंद्र होर्मुज जलडमरूमध्य (Strait of Hormuz) है। ईरान और ओमान के बीच स्थित यह संकरा समुद्री मार्ग वैश्विक ऊर्जा आपूर्ति की जीवनरेखा माना जाता है। युद्ध शुरू होने से पहले दुनिया के समुद्री मार्ग से होने वाले तेल और प्राकृतिक गैस व्यापार का लगभग 20 प्रतिशत हिस्सा इसी रास्ते से होकर गुजरता था। संघर्ष तेज होने के बाद ईरान ने इस रणनीतिक जलमार्ग पर अपना प्रभाव बढ़ाने का दावा किया है और अमेरिकी निगरानी वाले वैकल्पिक समुद्री मार्गों का इस्तेमाल करने वाले जहाजों को भी निशाना बनाया है। वहीं, 28 फरवरी को अमेरिका और इजरायल की ओर से ईरान पर किए गए हमलों के बाद वॉशिंगटन लगातार यह दोहरा रहा है कि वैश्विक व्यापार और ऊर्जा आपूर्ति को बनाए रखने के लिए होर्मुज जलडमरूमध्य का खुला रहना बेहद जरूरी है। तनाव बढ़ने के साथ ही दोनों देशों के बीच सीधे सैन्य हमले भी तेज हो गए हैं। अमेरिका की कार्रवाई के जवाब में ईरान कुवैत और जॉर्डन जैसे उन देशों में मौजूद अमेरिकी सैन्य ठिकानों पर मिसाइल और ड्रोन हमले कर रहा है, जहां अमेरिकी सेना तैनात है। लगातार हो रहे इन हमलों ने दोनों पक्षों के बीच बने अंतरिम शांति समझौते को लगभग पूरी तरह खत्म कर दिया है और पूरे क्षेत्र में युद्ध का खतरा और गहरा गया है।

यमन के हूती: ‘रेड सी’ में नया मोर्चा और सऊदी अरब की घेराबंदी
शुरुआती दिनों में ईरान समर्थित हूती विद्रोही इस संघर्ष में अपेक्षाकृत शांत नजर आए थे, लेकिन अब उन्होंने खुलकर मोर्चा संभाल लिया है। हूतियों ने सऊदी अरब के खिलाफ समुद्री नाकेबंदी का ऐलान करते हुए लाल सागर और बाब अल-मंदेब जलडमरूमध्य से होकर स्वेज नहर तक जाने वाले अहम व्यापारिक मार्ग को निशाना बनाना शुरू कर दिया है। इसके चलते अंतरराष्ट्रीय समुद्री व्यापार पर भी दबाव बढ़ गया है। हूतियों का दावा है कि उन्होंने सऊदी अरब के उन तेल प्रतिष्ठानों पर हमला किया है, जो ईस्ट-वेस्ट पाइपलाइन के आसपास स्थित हैं। होर्मुज जलडमरूमध्य में बढ़ते तनाव के बाद यही पाइपलाइन सऊदी अरब के लिए तेल निर्यात का प्रमुख विकल्प बनी हुई थी और इसके जरिए रोजाना लाखों बैरल कच्चे तेल की आपूर्ति की जा रही थी। समुद्री सुरक्षा एजेंसी Ambrey के आंकड़ों के अनुसार, जुलाई के दूसरे पखवाड़े के बाद बाब अल-मंदेब जलडमरूमध्य से गुजरने वाले जहाजों की संख्या में करीब 30 प्रतिशत की गिरावट दर्ज की गई है। लगातार बढ़ते सुरक्षा जोखिमों के कारण कई व्यापारिक जहाजों को बीच समुद्र से ही अपना मार्ग बदलना पड़ा, जिससे वैश्विक सप्लाई चेन और शिपिंग लागत पर भी असर पड़ने लगा है।

इराक में ‘क्रॉसफायर’: सऊदी और अमेरिका का साझा हमला
मिडिल ईस्ट में बढ़ते तनाव के बीच इराक भी अब इस संघर्ष का अहम मोर्चा बनता जा रहा है। सऊदी अरब का आरोप है कि इराक में मौजूद ईरान समर्थित सशस्त्र गुटों ने लगातार दो दिनों तक उसकी तेल रिफाइनरियों को निशाना बनाते हुए ड्रोन हमले किए। इन हमलों के जवाब में अमेरिका और सऊदी अरब ने संयुक्त रूप से इराक में इन गुटों के ठिकानों पर हवाई हमले किए।
रिपोर्टों के मुताबिक, इस कार्रवाई में कम से कम 20 लड़ाके और छह ईरानी सैन्य सलाहकार मारे गए। इस घटनाक्रम ने इराक की स्थिति को और जटिल बना दिया है, क्योंकि बगदाद के संबंध अमेरिका और ईरान—दोनों से हैं। ऐसे में इराक खुद को दो प्रतिद्वंद्वी शक्तियों के बीच फंसा हुआ पा रहा है। इराकी सरकार ने अपनी सीमा के भीतर हुई इस सैन्य कार्रवाई का कड़ा विरोध जताते हुए इसे अपनी संप्रभुता का उल्लंघन बताया है।
वहीं, इराक का पॉपुलर मोबिलाइजेशन फोर्सेज (PMF) औपचारिक रूप से देश की सुरक्षा व्यवस्था का हिस्सा है, लेकिन इसके कई धड़े स्वतंत्र रूप से काम करते हैं और समय-समय पर अमेरिकी सैन्य ठिकानों को निशाना बनाते रहे हैं। पहले सितंबर के अंत तक इराक से अमेरिकी सैनिकों की पूर्ण वापसी की योजना बनाई गई थी, लेकिन क्षेत्र में तेजी से बदलते सुरक्षा हालात के बीच इस योजना पर अब अनिश्चितता के बादल मंडराने लगे हैं।

मिस्र तक पहुंची युद्ध की लपटें
मिडिल ईस्ट में बढ़ते तनाव के बीच अब मिस्र भी इस संघर्ष की आंच महसूस करने लगा है। बुधवार को भूमध्यसागर तट पर स्थित दामिएटा बंदरगाह पर हुए ड्रोन हमले ने अंतरराष्ट्रीय स्तर पर चिंता बढ़ा दी। हमले के बाद दो तरल प्राकृतिक गैस (LNG) से जुड़े जहाजों में भीषण आग लग गई, जिनमें एक अमेरिकी स्वामित्व वाला फ्लोटिंग स्टोरेज यूनिट भी शामिल था।
मिस्र लंबे समय से अमेरिका का प्रमुख रणनीतिक सहयोगी और क्षेत्रीय विवादों में मध्यस्थ की भूमिका निभाता रहा है। यही वजह है कि अब तक वह सीधे सैन्य टकराव से दूर रहने में सफल रहा था। हालांकि इस ताजा हमले की जिम्मेदारी अभी तक किसी संगठन ने नहीं ली है और ईरान समर्थित हूती विद्रोहियों ने भी इससे अपना संबंध होने से इनकार किया है। इसके बावजूद इस घटना ने यह संकेत जरूर दे दिया है कि मिडिल ईस्ट का यह संघर्ष अब उन इलाकों तक भी पहुंचने लगा है, जो अब तक अपेक्षाकृत सुरक्षित माने जाते थे।

इजराइल और लेबनान: क्या फिर सुलग उठेगा उत्तरी मोर्चा?
युद्ध के शुरुआती चरण में ईरान पर बड़े पैमाने पर हवाई हमले करने वाला इजराइल फिलहाल अंतरिम युद्धविराम के बाद अपेक्षाकृत शांत नजर आ रहा है। दूसरी ओर, लेबनान में ईरान समर्थित हिजबुल्लाह के साथ जून में हुआ युद्धविराम अभी तक काफी हद तक प्रभावी बना हुआ है। हालांकि, समझौते की एक अहम शर्त के तहत हिजबुल्लाह को अपने हथियार छोड़ने थे, लेकिन संगठन ने इससे साफ इनकार कर दिया है। ऐसे में क्षेत्र में तनाव पूरी तरह खत्म नहीं हुआ है। विशेषज्ञों का मानना है कि यदि ईरान या इजराइल की ओर से कोई भी छोटी सैन्य चूक होती है, तो लेबनान-इजराइल सीमा पर संघर्ष एक बार फिर तेज हो सकता है और क्षेत्र में हिंसा का नया दौर शुरू हो सकता है।

वैश्विक अर्थव्यवस्था के लिए खतरे की घंटी
मिडिल ईस्ट में तेजी से खुलते नए-नए सैन्य मोर्चे इस बात का संकेत हैं कि यह संघर्ष अब केवल अमेरिका और ईरान तक सीमित नहीं रह गया है। होर्मुज जलडमरूमध्य और लाल सागर जैसे अहम समुद्री व्यापार मार्गों पर बढ़ते खतरे ने वैश्विक ऊर्जा आपूर्ति को प्रभावित करना शुरू कर दिया है, जिसके चलते कच्चे तेल और प्राकृतिक गैस की कीमतों में लगातार उछाल देखा जा रहा है। विशेषज्ञों का मानना है कि यदि अमेरिका और ईरान के बीच जारी यह प्रॉक्सी संघर्ष जल्द नहीं थमा, तो इसका असर सिर्फ मिडिल ईस्ट तक सीमित नहीं रहेगा, बल्कि दुनिया भर की अर्थव्यवस्था, व्यापार और ऊर्जा सुरक्षा पर भी गंभीर प्रभाव पड़ सकता है।

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