नारी शक्ति वंदन विधेयक की राह आसान या सियासी गणित में फंसेगा मामला? संसद में पक्ष-विपक्ष का संख्याबल क्या?

नारी शक्ति वंदन विधेयक को लेकर सबसे बड़ा सवाल यह उठ रहा है कि क्या मौजूदा राजनीतिक परिस्थितियों और संख्या बल के आधार पर यह विधेयक संसद से पारित हो सकता है?

संसद का विशेष सत्र शुरू होते ही नारी शक्ति वंदन विधेयक और परिसीमन से जुड़े प्रस्ताव देश की राजनीति के केंद्र में आ गए हैं। तीन दिनों के इस सत्र में केंद्र सरकार जिन विधेयकों को आगे बढ़ा रही है, वे केवल कानूनी बदलाव नहीं बल्कि भारत की राजनीतिक संरचना को प्रभावित करने वाले बड़े फैसले माने जा रहे हैं। यही वजह है कि सत्तापक्ष और विपक्ष के बीच इस मुद्दे पर तीखी खींचतान देखने को मिल रही है। एक तरफ सरकार इसे महिला सशक्तिकरण की दिशा में ऐतिहासिक कदम बता रही है, तो दूसरी तरफ विपक्ष इसके प्रावधानों, टाइमिंग और राजनीतिक मंशा पर सवाल उठा रहा है।

लोकसभा में पेश किया गया विधेयक

महिला आरक्षण कानून में संशोधन करने वाला संविधान (131वां संशोधन) विधेयक बृहस्पतिवार को मत विभाजन के बाद लोकसभा में पेश किया गया। इसके साथ ही दो सामान्य विधेयक- परिसीमन विधेयक और केंद्र शासित प्रदेश कानून (संशोधन) विधेयक भी पेश किए गए। करीब 40 मिनट की तीखी बहस के बाद इन विधेयकों को लोकसभा में पेश किया गया। विपक्ष ने संवैधानिक (131वां संशोधन) विधेयक पेश करने के लिए मत विभाजन की मांग की। 251 सदस्यों के समर्थन और 185 सदस्यों के विरोध के साथ विधेयक पेश किया गया।

खड़ा हो रहा यह सवाल महिला आरक्षण लागू करने और लोकसभा सीटों में संभावित बढ़ोतरी के लिए संविधान के कुछ प्रावधानों में संशोधन करना जरूरी होगा। इसी कारण इसे सामान्य विधेयक नहीं, बल्कि संविधान संशोधन विधेयक के रूप में पेश किया गया है। यह अंतर बेहद महत्वपूर्ण है, क्योंकि संविधान में बदलाव की प्रक्रिया ज्यादा जटिल और सख्त नियमों के तहत होती है। ऐसे में सबसे बड़ा सवाल यह बनता है कि क्या मौजूदा राजनीतिक परिस्थितियों और संख्या बल के आधार पर यह विधेयक संसद से पारित हो सकता है?

संविधान संशोधन विधेयक के लिए संविधान के अनुच्छेद 368 में है यह व्यवस्था

गौरतलब है कि भारतीय संविधान के अनुच्छेद 368 में यह साफ किया गया है कि ऐसे किसी भी संशोधन को संसद के दोनों सदनों लोकसभा और राज्यसभा में विशेष बहुमत से पारित होना अनिवार्य है। बता दें कि विशेष बहुमत” का मतलब केवल आधे से ज्यादा वोट नहीं होता, बल्कि उपस्थित और मतदान करने वाले सदस्यों के दो-तिहाई समर्थन से होता है। यही वह शर्त है जो इस पूरी प्रक्रिया को कठिन बना देती है।

साधारण विधेयकों के मामले में सरकार के पास यदि 50 प्रतिशत से अधिक समर्थन हो, तो वह आसानी से कानून बना सकती है। लेकिन संविधान संशोधन के मामले में यह पर्याप्त नहीं होता। यहां संख्या बल का अंतर ही तय करता है कि कोई विधेयक पास होगा या अटक जाएगा। कुछ मामलों में, खासकर जब संशोधन संघीय ढांचे या राज्यों के अधिकारों को प्रभावित करता है, तब संसद के अलावा देश के कम से कम आधे राज्यों की विधानसभाओं की मंजूरी भी आवश्यक होती है। हालांकि हर संशोधन में यह शर्त लागू नहीं होती, लेकिन इसकी संभावना भी राजनीतिक समीकरण को और जटिल बना देती है।

लोकसभा में क्या है नंबर का गणित

लोकसभा के गणित पर नजर डालें, तो तस्वीर काफी दिलचस्प नजर आती है। सदन की प्रभावी संख्या लगभग 540 मानी जा रही है, जिसके आधार पर दो-तिहाई बहुमत का आंकड़ा करीब 360 बैठता है। लोकसभा में राजग को 293 सदस्यों का समर्थन है जो सदन का 54 प्रतिशत है, जबकि विपक्ष के पास 233 सांसद हैं। सात सांसद निर्दलीय हैं, जबकि सात सांसद वाईएसआरसीपी, एआईएमआईएम और शिरोमणि अकाली दल जैसे दलों से हैं, जिन्होंने अभी तक खुले रूप में विधेयकों का समर्थन नहीं किया है।

विधेयकों को लोकसभा से मंजूरी मिलने के लिए, समाजवादी पार्टी (37 सांसद), तृणमूल कांग्रेस (28 सांसद) या द्रमुक (22 सांसद) में से कम से कम दो मुख्य विपक्षी दलों को मतदान से अनुपस्थित रहना होगा। वहीं, सदन में कांग्रेस के 98 सांसद हैं। लोकसभा में भाजपा के 240 सांसद, तेदेपा के 16 और जद (यू) के 12 सांसद हैं। कांग्रेस, समाजवादी पार्टी, तृणमूल कांग्रेस और डीएमके जैसे बड़े दल इस पूरे समीकरण में अहम भूमिका निभाते हैं। इन दलों का रुख ही तय करेगा कि विधेयक की राह आसान होगी या मुश्किल। यदि विधेयकों को लोकसभा की मंजूरी नहीं मिलती है, तो उन्हें राज्यसभा में नहीं लाया जाएगा। नियमों के अनुसार, संविधान संशोधन विधेयक सहित विधेयकों के समर्थन के लिए 360 सांसदों की जरूरत है, जो उपस्थित और मतदान करने वाले सांसदों की संख्या के दो-तिहाई के बराबर है।

राज्यसभा का है ऐसा हाल

राज्यसभा में राजग के पक्ष में 141 सांसद हैं, जो सदन का 58 प्रतिशत है। वहीं विपक्ष के 83 सांसद हैं। बीआरएस, वाईएसआरसीपी, बीजद और बसपा जैसे दलों और निर्दलीय सांसदों के सदन में 20 सांसद हैं और उनके समर्थन से फैसले पर असर पड़ सकता है। राज्यसभा में भाजपा के 107 सदस्य हैं, जबकि कांग्रेस के 28, तृणमूल कांग्रेस के 13, आम आदमी पार्टी के 10 और द्रमुक के आठ सांसद हैं।

राज्यसभा में एनडीए के पास वहां बहुमत के करीब संख्या है, लेकिन दो-तिहाई बहुमत के लिए उसे अन्य दलों का समर्थन चाहिए। क्षेत्रीय दलों का रुख यहां निर्णायक बन सकता है, क्योंकि वे अक्सर मुद्दों के आधार पर अपना पक्ष तय करते हैं। यदि ये दल सरकार के साथ आते हैं, तो विधेयक का रास्ता आसान हो सकता है, लेकिन अगर वे तटस्थ रहते हैं या विरोध करते हैं, तो मुश्किल बढ़ सकती है।

पीएम मोदी ने की है यह अपील

प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने लोकसभा में सभी राजनीतिक दलों से महिला आरक्षण अधिनियम संबंधी संविधान संशोधन विधेयक को सर्वसम्मति से पारित करने की अपील की और कहा कि जो भी इसका विरोध करेंगे, उन्हें लंबे समय तक इसकी कीमत चुकानी पड़ेगी।

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