ईरान-अमेरिका युद्ध के बीच अचानक सऊदी अरब Vs हूती क्यों? समझिए पूरा माजरा

28 फरवरी को अमेरिका और इजरायल की ओर से ईरान पर किए गए संयुक्त हवाई हमलों के बाद मिडिल-ईस्ट में शुरू हुआ तनाव अब भी थमने का नाम नहीं ले रहा है। संघर्ष का असर अब ईरान की सीमाओं से निकलकर क्षेत्र के दूसरे हिस्सों तक पहुंचता दिखाई दे रहा है। ईरान की ओर से पिछले कई महीनों से स्ट्रेट ऑफ होर्मुज को बंद रखने के कारण वैश्विक ऊर्जा आपूर्ति पर भी दबाव बढ़ा है। शांति के समय दुनिया के करीब 20 फीसदी ईंधन की आवाजाही इसी समुद्री मार्ग से होती थी।
अब स्थिति इसलिए और गंभीर मानी जा रही है क्योंकि हूती विद्रोहियों की गतिविधियां बाब अल-मन्दब जलडमरूमध्य तक बढ़ गई हैं। यह अहम समुद्री मार्ग हिंद महासागर को लाल सागर और आगे स्वेज नहर से जोड़ता है। ऐसे में मिडिल-ईस्ट का संघर्ष अब अपने शुरुआती केंद्र ईरान से काफी दूर तक फैलता नजर आ रहा है। यमन और सऊदी अरब के आसपास का क्षेत्र भी इसकी जद में आता दिख रहा है। आखिर यह पूरा घटनाक्रम कैसे शुरू हुआ और ईरान-अमेरिका संघर्ष का असर सऊदी अरब और हूतियों तक कैसे पहुंचा? आइए समझते हैं पूरी कहानी।

हूती विद्रोहियों का ‘आंख के बदले आंख’ का ऐलान
यमन के हूती विद्रोहियों और सऊदी अरब के बीच लंबे समय से तनाव चला आ रहा है, लेकिन 3 जुलाई को हुई एक घटना ने इस टकराव को और भड़का दिया। सना एयरपोर्ट पर ईरान से हूती प्रतिनिधिमंडल को लेकर पहुंचे एक विमान को निशाना बनाया गया। यह कार्रवाई यमन की सऊदी अरब समर्थित सरकार की ओर से की गई थी। सरकार ने दावा किया कि विमान ने यमन की संप्रभुता का उल्लंघन किया था। इसके अलावा, यमनी सरकार पहले भी ईरान पर आरोप लगाती रही है कि ऐसे विमानों के जरिए हूती विद्रोहियों तक हथियार पहुंचाए जाते हैं। सना एयरपोर्ट पर हुए इस हमले के बाद हूतियों ने कड़ा रुख अपनाया और ‘आंख के बदले आंख’ की कार्रवाई की चेतावनी दी। हूती प्रवक्ता याह्या सरी ने कहा कि इस हमले के साथ यमन में चल रहा De-escalation यानी तनाव कम करने का दौर समाप्त हो गया है। इस घटना के बाद यमन में पहले से मौजूद तनाव ने एक बार फिर गंभीर रूप ले लिया और ईरान-सऊदी अरब के बीच क्षेत्रीय शक्ति संघर्ष का असर भी इस पूरे घटनाक्रम में दिखाई देने लगा।

प्लेन निशाना बनने के बाद सऊदी पर भड़के हूती
सना एयरपोर्ट पर हुए हमले के बाद हूती विद्रोहियों ने सऊदी अरब के खिलाफ जवाबी कार्रवाई का संकेत दिया। हूतियों ने कहा कि जिस तरह उनके विमान की आवाजाही को रोका गया और उसे निशाना बनाया गया, उसी तरह अब सऊदी अरब के लिए भी समुद्री और हवाई रास्तों को बाधित किया जाएगा। हूती विद्रोहियों ने चेतावनी दी कि सऊदी अरब से जुड़े जहाजों और विमानों को निशाना बनाया जा सकता है। इस बयान के साथ हूतियों ने साफ कर दिया कि सना एयरपोर्ट की घटना को वे नजरअंदाज नहीं करेंगे और इसके जवाब में सऊदी अरब पर दबाव बढ़ाने की रणनीति अपना सकते हैं। इस ऐलान के बाद यमन और सऊदी अरब के बीच पहले से जारी तनाव के और बढ़ने की आशंका पैदा हो गई।

अहम मोखा पोर्ट सिटी और मयून द्वीप पर कब्जा कर चुके हैं हूती
इसके बाद हूती विद्रोहियों ने सऊदी अरब के जहाजों और उसके अलग-अलग शहरों को निशाना बनाना शुरू कर दिया। इसके साथ ही यमन के अंदर जमीनी संघर्ष भी तेज हो गया। हालात अब ऐसे हैं कि हूती विद्रोहियों ने रणनीतिक रूप से अहम मोखा पोर्ट सिटी पर यमनी सरकार से नियंत्रण हासिल कर लिया है। इसके अलावा, बाब अल-मन्दब जलडमरूमध्य में मौजूद कई द्वीपों पर भी हूतियों का कब्जा बताया जा रहा है। इनमें मयून आईलैंड भी शामिल है।

सऊदी और हूती विद्रोहियों में क्यों है दुश्मनी?
सऊदी अरब में सुन्नी मुस्लिमों का प्रभाव है, जबकि हूती आंदोलन शिया परंपरा से जुड़ा है। दोनों के राजनीतिक और क्षेत्रीय हितों में लंबे समय से मतभेद रहे हैं। हूती विद्रोहियों को ईरान से सैन्य और आर्थिक मदद मिलने के दावे भी किए जाते रहे हैं। वहीं, ईरान और सऊदी अरब के बीच मिडिल-ईस्ट में क्षेत्रीय प्रभाव को लेकर लंबे समय से प्रतिस्पर्धा रही है। इसी वजह से यमन इस व्यापक क्षेत्रीय टकराव का एक अहम मैदान बन गया। हूती विद्रोहियों ने 2014 में यमन की राजधानी सना पर कब्जा कर लिया था और अंतरराष्ट्रीय स्तर पर मान्यता प्राप्त सरकार को सत्ता से बाहर कर दिया था। इसके बाद सऊदी अरब ने हूतियों के बढ़ते प्रभाव का विरोध किया। सऊदी नेतृत्व के लिए अपनी दक्षिणी सीमा के करीब हूती समूह की मजबूत मौजूदगी सुरक्षा से जुड़ी एक बड़ी चिंता रही है।

हूती विद्रोही कौन हैं?
हूती आंदोलन की शुरुआत 1990 के दशक में शिया धर्मगुरु हुसैन बदरुद्दीन अल-हूती ने की थी। उन्हीं के नाम से इस संगठन को ‘हूती’ कहा जाने लगा। शुरुआती दौर में यह आंदोलन यमनी सरकार में कथित भ्रष्टाचार और अमेरिका-इजरायल के साथ उसके संबंधों के विरोध के तौर पर उभरा था। समय के साथ हूतियों का प्रभाव यमन में बढ़ता गया। 2014-15 के दौरान विद्रोहियों ने राजधानी सना समेत देश के बड़े हिस्से पर अपना नियंत्रण स्थापित कर लिया। इसके बाद सत्ता संघर्ष ने गंभीर रूप ले लिया और यमन लंबे समय तक चले गृहयुद्ध में फंस गया।

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