बलूचिस्तान में हालिया आतंकी हमलों में 27 पुलिसकर्मियों और 5 नागरिकों की मौत के बाद लोगों का गुस्सा खुलकर सामने आया। मृतकों के परिवारों ने न्यायिक आयोग की मांग को लेकर 10 दिनों तक धरना दिया और शवों को दफनाने से इनकार कर दिया। इस घटना ने एक बार फिर बलूचिस्तान में दशकों से जारी हिंसा, अलगाववाद और पाकिस्तानी सेना के खिलाफ असंतोष को चर्चा में ला दिया है। क्षेत्रफल के लिहाज से पाकिस्तान का सबसे बड़ा और रणनीतिक रूप से बेहद अहम प्रांत होने के बावजूद बलूचिस्तान लंबे समय से अशांति का सामना कर रहा है। आखिर बलूचिस्तान पाकिस्तान का हिस्सा कैसे बना, इस विलय को लेकर विवाद क्यों है और यहां संघर्ष की शुरुआत कैसे हुई, आइए जानते हैं।
11 अगस्त 1947 का समझौता और आजादी का दावा
बलूचिस्तान का पाकिस्तान के साथ विवाद भारत-पाकिस्तान विभाजन के समय से ही शुरू हो गया था। 11 अगस्त 1947 को कलात के शासक मीर अहमद यार खान ने जिन्ना और ब्रिटिश प्रतिनिधियों की मौजूदगी में एक समझौते पर हस्ताक्षर किए, जिसके तहत कलात की स्वतंत्र स्थिति को मान्यता मिली थी। इसके बाद खान ऑफ कलात ने अपना संविधान लागू किया और दो सदनों वाली संसद बनाई। संसद ने भी पाकिस्तान में विलय के प्रस्ताव को खारिज करते हुए कलात को एक स्वतंत्र राष्ट्र बनाए रखने के पक्ष में फैसला किया।
रियासत को अलग-थलग करने की रणनीति
जब पाकिस्तान को यह साफ हो गया कि कलात की संसद विलय के पक्ष में नहीं है, तो उसने कलात के अधीन तीन रियासतों—मकरान, लसबेला और खारान—के शासकों पर दबाव बढ़ाया। 17 मार्च 1948 को इन तीनों रियासतों के पाकिस्तान में विलय को अलग से स्वीकार कर लिया गया। इससे कलात का समुद्री रास्ता और पड़ोसी इलाकों से संपर्क कमजोर पड़ गया और वह आर्थिक व भौगोलिक रूप से अलग-थलग हो गया। इसके कुछ ही समय बाद पाकिस्तानी सेना ने कलात के खिलाफ सैन्य कार्रवाई शुरू कर दी।
पाकिस्तानी सेना ने बलूचिस्तान के तटीय इलाकों, खासकर पासनी और जीवानी में अपनी तैनाती बढ़ाते हुए कलात की घेराबंदी शुरू कर दी। 26 मार्च 1948 को सेना राजधानी की ओर बढ़ी और खान ऑफ कलात को अंतिम अल्टीमेटम दिया। सैन्य दबाव और चारों ओर से घिरे होने के बीच मीर अहमद यार खान के पास ज्यादा विकल्प नहीं बचे। आखिरकार 27 मार्च 1948 को उन्होंने पाकिस्तान में विलय के दस्तावेज पर हस्ताक्षर कर दिए।
विलय का विरोध और पहले सशस्त्र विद्रोह की शुरुआत
पाकिस्तानी सेना के दबाव में किए गए इस विलय को कलात की संसद या बलूच जनता ने स्वीकार नहीं किया। राजकुमार अब्दुल करीम ने विद्रोह कर दिया। खान ऑफ कलात के छोटे भाई प्रिंस अब्दुल करीम ने इस विलय को अवैध और असंवैधानिक घोषित कर दिया। जुलाई 1948 में वे अपने समर्थकों के साथ अफगानिस्तान के सीमावर्ती इलाकों में चले गए और पाकिस्तानी सेना के खिलाफ बलूचिस्तान के पहले सशस्त्र विद्रोह की शुरुआत की।
बलूचिस्तान में विद्रोह की 5 वजहें
1.बंटवारे और रियासत (कलात) के विलय का विवाद
ब्रिटिश शासन खत्म होने के बाद बलूचिस्तान की रियासतों के सामने भारत या पाकिस्तान में शामिल होने का विकल्प था। हालांकि, कलात के खान मीर अहमद यार खान स्वतंत्र बलूचिस्तान के पक्ष में थे। लेकिन पाकिस्तान के बढ़ते सैन्य दबाव और आसपास की रियासतों के विलय के बाद 27 मार्च 1948 को उन्हें पाकिस्तान के साथ विलय के दस्तावेज पर हस्ताक्षर करने पड़े। बलूच राष्ट्रवादियों ने इस विलय को कभी स्वीकार नहीं किया और यही आगे चलकर अलगाववादी आंदोलन की बड़ी वजह बना।
2.प्राकृतिक संसाधनों का दोहन बनाम गरीबी
प्राकृतिक संसाधनों से समृद्ध होने के बावजूद बलूचिस्तान पाकिस्तान के सबसे पिछड़े इलाकों में गिना जाता है। यहां तांबा, सोना और प्राकृतिक गैस के बड़े भंडार हैं, लेकिन स्थानीय लोगों का आरोप है कि इन संसाधनों का फायदा उन्हें नहीं मिलता। उनका कहना है कि बड़े प्रोजेक्ट्स में रोजगार के बेहतर अवसर भी स्थानीय बलूचों के बजाय पंजाब और सिंध के लोगों को दिए जाते हैं। इसी आर्थिक असमानता और संसाधनों पर अधिकार के मुद्दे ने बलूच असंतोष को और गहरा किया है।
3.चीनी निवेश और CPEC प्रोजेक्ट्स का विरोध
ग्वादर पोर्ट अरब सागर के पास रणनीतिक रूप से बेहद अहम जगह पर स्थित है और यह चीन-पाकिस्तान आर्थिक गलियारे (CPEC) का प्रमुख केंद्र है। बलूच विद्रोही चीन के बढ़ते निवेश को अपने संसाधनों पर बाहरी कब्जे के तौर पर देखते हैं। यही वजह है कि बलूच उग्रवादी संगठन कई बार चीनी नागरिकों, इंजीनियरों और CPEC से जुड़ी परियोजनाओं को निशाना बना चुके हैं। ग्वादर को लेकर स्थानीय असंतोष भी इस संघर्ष को और बढ़ाता है।
4.लापता लोग’ और मानवाधिकार हनन
बलूचिस्तान में जबरन गायब किए जाने का मुद्दा लंबे समय से विवाद का केंद्र बना हुआ है। मानवाधिकार संगठनों और बलूच समूहों का आरोप है कि सुरक्षा एजेंसियों ने हजारों युवाओं, छात्रों और कार्यकर्ताओं को हिरासत में लेकर लापता कर दिया। कई मामलों में लंबे समय बाद उनके शव मिलने का दावा भी किया जाता है। बलूच संगठनों का कहना है कि कथित सैन्य कार्रवाई और मानवाधिकार उल्लंघनों ने युवाओं में असंतोष बढ़ाया है, जिससे अलगाववादी आंदोलन को और बल मिला।
5.पाकिस्तानी सेना की कठोर सैन्य कार्रवाई
बलूचिस्तान में असंतोष बढ़ने पर पाकिस्तान सरकार पर संवाद के बजाय सैन्य कार्रवाई को प्राथमिकता देने के आरोप लगते रहे हैं। 2005 में सुई गैस प्लांट से जुड़े एक कथित यौन उत्पीड़न मामले और 2006 में बलूच नेता नवाब अकबर बुगटी की सैन्य कार्रवाई में मौत के बाद विद्रोह और तेज हुआ। इसके बाद से बलूचिस्तान में सशस्त्र संघर्ष और अलगाववादी गतिविधियां लगातार जारी हैं।
पाकिस्तान ने किया दमन, लोगों को किया गायब
पाकिस्तान सरकार बलूचिस्तान की अशांति के लिए अक्सर भारत और बाहरी ताकतों को जिम्मेदार ठहराती रही है। हालांकि, विशेषज्ञों का मानना है कि जब तक बलूच लोगों की शिकायतों, कथित जबरन गुमशुदगी और संसाधनों पर स्थानीय अधिकार जैसे मुद्दों का समाधान नहीं होता, तब तक केवल सैन्य कार्रवाई से समस्या खत्म नहीं होगी। बलूच संगठनों की ओर से भारत से मदद की अपील भी सामने आती रही है। ऐसे में पाकिस्तान को आशंका है कि यदि हालात और बिगड़े तो बलूचिस्तान का संकट उसके लिए गंभीर राजनीतिक और सुरक्षा चुनौती बन सकता है।

