वैश्विक स्तर पर जारी अनिश्चितताओं के बावजूद भारतीय अर्थव्यवस्था ने वित्त वर्ष 2026-27 की पहली तिमाही में 7.8% की शानदार ग्रोथ दर्ज की है। इससे भारत दुनिया की सबसे तेजी से बढ़ने वाली प्रमुख अर्थव्यवस्थाओं में अपनी स्थिति बनाए हुए है। हालांकि, GDP के इन मजबूत आंकड़ों का असर शेयर बाजार पर नजर नहीं आया। आर्थिक मजबूती के बावजूद बाजार में लगातार बिकवाली का दबाव देखने को मिल रहा है।
पिछले पांच कारोबारी सत्रों में सेंसेक्स करीब 2,000 अंक लुढ़क चुका है, जबकि निफ्टी भी अहम सपोर्ट लेवल तोड़कर 23,400 के नीचे पहुंच गया है। हफ्ते के आखिरी कारोबारी दिन भी बाजार में भारी गिरावट जारी है। ऐसे में सवाल उठना लाजिमी है कि जब देश की GDP इतनी तेज रफ्तार से बढ़ रही है, तो शेयर बाजार आखिर क्यों कमजोर पड़ रहा है? मजबूत आर्थिक आंकड़े भी बाजार की गिरावट पर ब्रेक लगाने में क्यों नाकाम रहे? आगे बाजार की चाल कैसी रह सकती है, आइए आसान भाषा में समझते हैं।
शेयर बाजार को नीचे खींच रहे ये 7 बड़े विलेन
1.SEBI-रजिस्टर्ड मार्केट एक्सपर्ट अनुज गुप्ता के मुताबिक, मजबूत GDP ग्रोथ के बावजूद भारतीय शेयर बाजार में गिरावट की सबसे बड़ी वजह कच्चे तेल की बढ़ती कीमतें हैं। ईरान और अमेरिका के बीच जारी युद्ध के चलते ब्रेंट क्रूड की कीमत एक बार फिर 106 डॉलर प्रति बैरल के पार पहुंच गई है। भारत अपनी जरूरत का करीब 85% कच्चा तेल आयात करता है, ऐसे में कीमतों में तेजी से देश का आयात बिल बढ़ सकता है। महंगे तेल से ईंधन की कीमतों पर दबाव बढ़ने के साथ महंगाई के और ऊपर जाने की आशंका है, जिसका सीधा असर बाजार के सेंटीमेंट पर पड़ रहा है। अनुज गुप्ता का अनुमान है कि आने वाले दिनों में Nifty50 में और कमजोरी देखने को मिल सकती है और इंडेक्स 22,800 के स्तर तक फिसल सकता है।
बॉन्ड यील्ड में तेजी: दुनियाभर के निवेशक ऐसे विकल्पों की तलाश में रहते हैं, जहां जोखिम कम हो और रिटर्न बेहतर मिले। अमेरिकी ट्रेजरी यील्ड में बढ़ोतरी के बीच विदेशी निवेशक भारतीय शेयर बाजार से पैसा निकालकर अमेरिकी सरकारी बॉन्ड जैसे सुरक्षित एसेट्स का रुख कर रहे हैं। वहीं, जापान में लंबी अवधि के बॉन्ड की यील्ड में तेज उछाल ने भी ग्लोबल निवेशकों की रणनीति पर असर डाला है। इन वजहों से भारतीय इक्विटी बाजार पर बिकवाली का दबाव बढ़ रहा है।
AI बूम का असर: दुनियाभर में AI पर तेजी से निवेश बढ़ रहा है। सरकारें और कंपनियां AI से जुड़े प्रोजेक्ट्स के लिए बड़ी मात्रा में पैसा जुटा रही हैं। इसके कारण कर्ज लेने की लागत बढ़ रही है। इसका असर भारत समेत दुनियाभर के शेयर बाजारों पर पड़ रहा है और निवेशकों की चिंता बढ़ने से भारतीय बाजार में भी गिरावट देखने को मिल रही है।
विदेशी निवेशकों की बिकवाली: ईरान युद्ध शुरू होने के बाद विदेशी निवेशकों ने एक बार फिर भारतीय शेयर बाजार से पैसा निकालना शुरू कर दिया है। लगातार दो महीनों तक भारतीय बाजार में निवेश करने के बाद सितंबर के पहले हफ्ते में विदेशी निवेशक नेट सेलर बन गए और उन्होंने करीब ₹7,443 करोड़ की निकासी की। कच्चे तेल की बढ़ती कीमत, अमेरिकी बॉन्ड यील्ड में तेजी और डॉलर के मजबूत होने से निवेशकों का भरोसा कमजोर हुआ है।
NSDL के आंकड़ों के मुताबिक, इससे पहले विदेशी पोर्टफोलियो निवेशकों (FPIs) ने अगस्त में ₹29,600 करोड़ से ज्यादा और जुलाई में करीब ₹20,200 करोड़ भारतीय बाजार में लगाए थे। अब अचानक हुई बिकवाली ने बाजार पर दबाव बढ़ा दिया है।
रुपये में गिरावट: RBI की कोशिशों के बाद कुछ समय के लिए रुपये की गिरावट थम गई थी, लेकिन अब एक बार फिर डॉलर के मुकाबले रुपया कमजोर हो रहा है। कच्चे तेल की बढ़ती कीमतों और विदेशी निवेशकों की लगातार निकासी के बीच शुक्रवार को रुपया 27 पैसे गिरकर 95.79 रुपये प्रति डॉलर पर पहुंच गया। रुपये की कमजोरी का असर विदेशी निवेशकों के भरोसे पर भी पड़ रहा है, जिससे भारतीय शेयर बाजार पर दबाव और बढ़ रहा है।
IPO मार्केट में बढ़ी हलचल: शेयर बाजार में गिरावट की एक वजह IPO बाजार में बढ़ती दिलचस्पी भी है। इन दिनों लगातार नए IPO आने से निवेशकों का पैसा इस ओर जा रहा है। कई IPO के ओवरसब्सक्राइब होने और लिस्टिंग पर अच्छा मुनाफा मिलने की उम्मीद ने बड़ी संख्या में निवेशकों को आकर्षित किया है। ऐसे में कुछ पैसा शेयर बाजार से निकलकर IPO में जा रहा है, जिससे सेकेंडरी मार्केट पर बिकवाली का दबाव बढ़ रहा है।
फेड की ब्याज दरों को लेकर चिंता: बाजार पर अमेरिकी फेडरल रिजर्व के फैसले का भी असर पड़ सकता है। ज्यादातर जानकारों को उम्मीद है कि फेड 16 सितंबर को ब्याज दरों में बढ़ोतरी कर सकता है। इस उम्मीद की एक वजह अगस्त में प्रोड्यूसर प्राइस इंडेक्स (PPI) का 0.4% बढ़ना है। वहीं, जुलाई के आंकड़ों को संशोधित करने के बाद उसमें भी 0.1% की बढ़त दर्ज हुई। ब्याज दरों में बढ़ोतरी की आशंका से निवेशकों की चिंता बढ़ी है, जिसका दबाव भारतीय शेयर बाजार पर भी देखने को मिल रहा है।
शेयर बाजार के लिए GDP ग्रोथ का क्या मतलब है?
आर्थिक ग्रोथ से बाजार को उम्मीद: जानकारों के मुताबिक शेयर बाजार का प्रदर्शन काफी हद तक देश की अर्थव्यवस्था से जुड़ा होता है। अप्रैल-जून 2026 की पहली तिमाही में भारत की GDP ने 7.8% की मजबूत ग्रोथ दर्ज की है। अब बाजार को उम्मीद है कि दूसरी तिमाही में भी आर्थिक विकास की रफ्तार अच्छी बनी रहेगी। ऐसे में अगर Q2 के आंकड़े उम्मीद के मुताबिक मजबूत रहे, तो शेयर बाजार में फिर से तेजी लौट सकती है।
निवेशकों हैं तो क्या करें?
मौजूदा गिरावट से साफ है कि सिर्फ मजबूत GDP से शेयर बाजार में तेजी नहीं आती। महंगाई, ब्याज दर, रुपया, कच्चा तेल, विदेशी निवेश और कंपनियों की कमाई जैसे कई फैक्टर बाजार की दिशा तय करते हैं। ऐसे में निवेशकों को घबराकर शेयर बेचने के बजाय कंपनी के फंडामेंटल और निवेश की अवधि पर ध्यान देना चाहिए।

