SCO Summit 2026: किर्गिजस्तान में 1 सितंबर को आयोजित शंघाई सहयोग संगठन (SCO) शिखर सम्मेलन पर दुनिया की नजरें टिकी हैं। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी, रूस के राष्ट्रपति व्लादिमीर पुतिन और चीन के राष्ट्रपति शी जिनपिंग की मौजूदगी ने इस बैठक को और अहम बना दिया है। अमेरिका और पश्चिमी देशों के कई रणनीतिक विशेषज्ञ SCO को वैश्विक आर्थिक संतुलन में उभरती ताकत के रूप में देख रहे हैं। हालांकि, संगठन ने आधिकारिक तौर पर कभी भी डॉलर या मौजूदा वैश्विक आर्थिक व्यवस्था को चुनौती देने का लक्ष्य घोषित नहीं किया है।
क्या है SCO?
शंघाई सहयोग संगठन (SCO) की नींव 1996 में ‘शंघाई-5’ के रूप में पड़ी थी, जिसमें चीन, रूस, कजाकिस्तान, किर्गिस्तान और ताजिकिस्तान शामिल थे। 2001 में उज्बेकिस्तान के जुड़ने के बाद इसे SCO का रूप दिया गया। आज भारत समेत इसके 10 सदस्य देश हैं। संगठन का मुख्य उद्देश्य आतंकवाद, अलगाववाद और चरमपंथ से मुकाबला करने के साथ सदस्य देशों के बीच व्यापार, ऊर्जा, परिवहन और विज्ञान के क्षेत्र में सहयोग बढ़ाना है। अपने व्यापक भौगोलिक और आर्थिक प्रभाव के कारण SCO दुनिया की करीब 40% आबादी और लगभग 30% GDP का प्रतिनिधित्व करता है।
भारत, रूस और चीन अहम?
SCO में भले ही 10 सदस्य देश हैं, लेकिन भारत, रूस और चीन इसकी अहम धुरी माने जाते हैं। इन तीनों की बढ़ती नजदीकी को अमेरिका और पश्चिमी देशों के लिए बड़ी रणनीतिक चुनौती के तौर पर देखा जाता है। रूस और चीन SCO को पश्चिमी गुटों के प्रभाव के मुकाबले एक मजबूत मंच के रूप में विकसित करने पर जोर देते रहे हैं। हाल के वर्षों में SCO सम्मेलनों से वैश्विक अर्थव्यवस्था और वित्तीय व्यवस्था में एकतरफा दबदबे के खिलाफ सहयोग बढ़ाने का संदेश भी सामने आया है।
अमेरिका ने डॉलर को बनाया हथियार
अमेरिका पर रूस और ईरान जैसे देशों के खिलाफ डॉलर के दबदबे को आर्थिक दबाव के साधन के तौर पर इस्तेमाल करने के आरोप लगते रहे हैं। इसका असर भारत और चीन समेत कई देशों पर भी पड़ा है। ऐसे में SCO के सदस्य डॉलर के ‘वेपनाइजेशन’ को लेकर चिंता जता रहे हैं। हालांकि, संगठन ने अभी ग्लोबल ट्रेड में डी-डॉलराइजेशन को बढ़ावा देने की कोई आधिकारिक योजना पेश नहीं की है, लेकिन इस मुद्दे पर लगातार हो रही चर्चा बदलते वैश्विक आर्थिक समीकरणों की ओर इशारा करती है।
वित्तीय संप्रभुता और आर्थिक सुरक्षा पर जोर
SCO की शुरुआत जहां आतंकवाद और अलगाववाद से मुकाबले के उद्देश्य से हुई थी, वहीं अब आर्थिक सुरक्षा और वित्तीय संप्रभुता भी इसके एजेंडे में अहम हो गई है। सदस्य देश ग्लोबल ट्रेड को पश्चिमी वित्तीय सिस्टम और SWIFT पर निर्भरता से कम करने के विकल्पों पर जोर दे रहे हैं। अस्ताना और तियानजिन घोषणापत्र में SCO नेताओं ने एकतरफा प्रतिबंधों के वैश्विक ऊर्जा व खाद्य सुरक्षा पर पड़ने वाले असर पर चिंता जताते हुए न्यायसंगत, लोकतांत्रिक और बहुध्रुवीय आर्थिक व्यवस्था की जरूरत बताई है।
नेशनल करेंसी में ट्रेड सेटलमेंट
SCO ने स्थानीय मुद्राओं में व्यापार को बढ़ावा देने की दिशा में संस्थागत रोडमैप तैयार किया है। इसे सीधे तौर पर डॉलर विरोधी पहल नहीं, बल्कि 2022 के समरकंद शिखर सम्मेलन में मंजूर किए गए राष्ट्रीय मुद्राओं में आपसी भुगतान बढ़ाने के रोडमैप के रूप में पेश किया गया। इसके बाद 2023 के नई दिल्ली और 2024 के अस्ताना सम्मेलनों में द्विपक्षीय व बहुपक्षीय कारोबार में स्थानीय मुद्राओं के इस्तेमाल को बढ़ाने की रणनीति को आगे बढ़ाया गया।
दिखने लगा बदलाव का असर
रूस और चीन के बीच स्थानीय मुद्राओं में कारोबार तेजी से बढ़ा है। 2024 में दोनों देशों का द्विपक्षीय व्यापार रिकॉर्ड करीब 243 अरब डॉलर तक पहुंचा, जिसमें 90% से ज्यादा लेनदेन रूबल और युआन में हुआ। वहीं, भारत-रूस व्यापार में भी ऊर्जा और अन्य वस्तुओं के भुगतान के लिए रुपये, रूबल समेत गैर-डॉलर विकल्पों का इस्तेमाल बढ़ा है।
वैकल्पिक वित्तीय अवसंरचना
SCO के सदस्य देश डॉलर और SWIFT पर निर्भरता कम करने के लिए वैकल्पिक वित्तीय तंत्र विकसित करने की दिशा में आगे बढ़ रहे हैं। तियानजिन सम्मेलन में SCO डेवलपमेंट बैंक स्थापित करने पर सहमति की बात सामने आई है, जिसका उद्देश्य ऊर्जा, रेलवे, कनेक्टिविटी और औद्योगिक परियोजनाओं के लिए स्थानीय मुद्राओं में वित्त उपलब्ध कराना होगा। इससे सदस्य देशों को पश्चिमी वित्तीय संस्थानों पर निर्भरता कम करने और विकास परियोजनाओं के लिए वैकल्पिक फंडिंग विकल्प मिलने की उम्मीद है।

