करीना कपूर खान और पृथ्वीराज सुकुमारन की बहुप्रतीक्षित फिल्म ‘दायरा’ का ट्रेलर 31 अगस्त को रिलीज हो गया। फिल्म महिलाओं के खिलाफ होने वाले जघन्य अपराध, न्याय की तलाश और पुलिस कार्रवाई की संवैधानिक सीमाओं जैसे संवेदनशील मुद्दों को केंद्र में रखती है। कहानी एक दुष्कर्म पीड़िता के मामले और उसके बाद हुए विवादित एनकाउंटर की जांच के जरिए यह सवाल उठाती है कि न्याय दिलाने की जिम्मेदारी निभाते हुए पुलिस की सीमा क्या होनी चाहिए और यदि कानून के रखवाले ही कानून से आगे बढ़ जाएं, तो जवाबदेही किसकी होगी। ट्रेलर में करीना और पृथ्वीराज दो पुलिस अधिकारियों के दमदार किरदारों में आमने-सामने नजर आते हैं।
महिला सुरक्षा और यौन अपराध जैसे गंभीर मुद्दों पर आधारित फिल्म ‘दायरा’ का ट्रेलर ऐसे समय सामने आया है, जब दिल्ली-एनसीआर में एक नाबालिग से कथित सामूहिक दुष्कर्म की घटना ने पूरे देश को झकझोर दिया है। इस वारदात के बाद महिला सुरक्षा, अपराधियों को सजा, पुलिस की कार्रवाई और न्याय व्यवस्था को लेकर नई बहस छिड़ गई है। एक बार फिर सवाल उठ रहे हैं कि सख्त कानूनों के बावजूद महिलाओं के खिलाफ अपराध क्यों नहीं थम रहे और आखिर इस समस्या की असली जड़ क्या है।
आज की दिल्ली की घटना ने फिर डराया
दिल्ली-एनसीआर में हाल ही में सामने आए एक कथित सामूहिक दुष्कर्म के मामले ने महिला सुरक्षा को लेकर चिंता एक बार फिर बढ़ा दी है। आरोप है कि 16 वर्षीय किशोरी के साथ चलती बस में दुष्कर्म किया गया। मामले में बस के चालक और कंडक्टर को गिरफ्तार कर लिया गया है। शुरुआती जांच में यह भी सामने आया है कि बस में लगे सीसीटीवी कैमरे काम नहीं कर रहे थे। पुलिस पूरे मामले की जांच कर रही है और सभी पहलुओं की पड़ताल में जुटी है।
निर्भया की याद हुई ताजा
इस घटना ने एक बार फिर 2012 के निर्भया कांड की याद ताजा कर दी है, जिसने पूरे देश को झकझोर दिया था। उस मामले के बाद कानूनों को और सख्त किया गया, महिलाओं की सुरक्षा के लिए कई नई व्यवस्थाएं लागू की गईं और पुलिस-प्रशासन में सुधार की मांग तेज हुई। हालांकि, वर्षों बाद भी महिलाओं के खिलाफ अपराध लगातार सामने आ रहे हैं, जिससे यह सवाल फिर उठने लगा है कि क्या सिर्फ सख्त कानून पर्याप्त हैं या उन्हें प्रभावी ढंग से लागू करना भी उतना ही जरूरी है।
ये है महिला सुरक्षा का असली मतलब
महिला सुरक्षा केवल सड़कों पर पुलिस गश्त, सीसीटीवी कैमरों या बेहतर रोशनी तक सीमित नहीं है। इसकी सबसे अहम कड़ी एक ऐसी भरोसेमंद और निष्पक्ष व्यवस्था है, जहां किसी भी महिला को अपराध की शिकायत दर्ज कराने में डर या हिचक महसूस न हो और उसे समय पर न्याय मिलने का पूरा विश्वास हो।
निर्भया के बाद बहुत कुछ बदला,लेकिन सब कुछ नहीं
यह कहना उचित नहीं होगा कि निर्भया कांड के बाद कोई बदलाव नहीं आया। कानूनों को सख्त किया गया, पुलिस व्यवस्था और महिला सुरक्षा से जुड़े कई कदम उठाए गए, साथ ही जागरूकता भी बढ़ी। हालांकि, केवल कानून बनाना काफी नहीं है। उनकी प्रभावी क्रियान्वयन, तेज न्याय प्रक्रिया और पुलिस, परिवहन, शिक्षा व्यवस्था के साथ समाज की सोच में बदलाव भी महिलाओं की सुरक्षा सुनिश्चित करने के लिए उतना ही जरूरी है।
दायरा’ हमें क्या सोचने पर मजबूर करती है?
फिल्म ‘दायरा’ केवल अपराध के बाद न्याय की प्रक्रिया पर सवाल नहीं उठाती, बल्कि व्यवस्था की जिम्मेदारियों पर भी सोचने के लिए मजबूर करती है। वहीं, हाल की वास्तविक घटनाएं यह बड़ा सवाल खड़ा करती हैं कि क्या हमारी व्यवस्था महिलाओं और लड़कियों को अपराध होने से पहले पर्याप्त सुरक्षा देने में सक्षम है।

