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इन छह सीटों पर क्या करेंगे Jyotiraditya Scindia, हारे हुए समर्थकों को दिलवा पाएंगे टिकट या BJP से होगा टकराव?

केंद्रीय मंत्री ज्योतिरादित्य सिंधिया बीजेपी की केंद्रीय राजनीति में तेजी से आगे बढ़ रहे हैं। दूसरी ओर एमपी में पार्टी के पुराने नेता उन्हें अलग-थलग करने की कोई कोशिश नहीं छोड़ रहे। पुराने नेताओं की यह गोलबंदी इस साल के अंत में सिंधिया के लिए मुसीबत बन सकती है। अपने समर्थकों के लिए किसी भी हद तक जाने वाले सिंधिया को टिकट बंटवारे के दौरान चुनौतियों का सामना करना पड़ सकता है। खासकर उन छह सीटों पर जहां उनके समर्थक उपचुनाव में हार गए थे।

उपचुनाव में हार गए थे छह समर्थक

साल 2020 में सिंधिया के साथ 22 विधायकों ने कांग्रेस छोड़ बीजेपी का दाम थामा था। इनमें से 19 सिंधिया के कट्टर समर्थक थे जबकि बाकी तीन अन्य कारणों से कांग्रेस से नाराज थे। उपचुनाव में सिंधिया के 19 में से 13 समर्थक दोबारा विधायक बन गए, लेकिन छह को हार का सामना करना पड़ा। 2023 के विधानसभा चुनाव में टिकट बंटवारे के समय इन छह सीटों पर सिंधिया अपने समर्थकों को टिकट दिलवा पाते हैं या नहीं, यह देखने वाली बात होगी। यदि उन्हें टिकट नहीं मिला तो बीजेपी नेतृत्व के साथ सिंधिया का टकराव भी हो सकता है।

बीजेपी के नए दावेदार ठोंक रहे दावा

विधानसभा उपचुनाव में डबरा से इमरती देवी, दिमनी से गिरिराज दंडोतिया, ग्वालियर पूर्व से मुन्नालाल गोयल, गोहद से रणवीर जाटव, करेरा से जसवंत सिंह जाटव और मुरैना से रघुराज सिंह कंसाना की हार हुई थी। इन सभी को कांग्रेस उम्मीदवारों ने हराया था। अब इन सीटों पर बीजेपी के नए उम्मीदवार अपना दावा ठोंक रहे हैं। दूसरी ओर, यह करीब-करीब तय है कि कांग्रेस अपने सीटिंग विधायकों को दोबारा मैदान में उतारेगी।

मुश्किलें इसलिए भी ज्यादा

ये सभी छह विधायक सिंधिया के कट्टर समर्थक हैं। इनमें से कई कमलनाथ सरकार में मंत्री थे, लेकिन अपने आका के एक इशारे पर इस्तीफा दे दिया था। उपचुनाव में तो सिंधिया उन्हें टिकट दिलाने में कामयाब रहे, लेकिन हार के बाद परिस्थितियां काफी बदल चुकी हैं। डबरा में इमरती देवी प्रदेश के गृह मंत्री नरोत्तम मिश्रा से कई बार भिड़ चुकी हैं। ग्वालियर पूर्व में मुन्नालाल गोयल को हराने वाले प्रवीण पाठक बीच-बीच में अपने सुर बदलते रहते हैं। पाठक सिंधिया के विरोधी हैं, लेकिन गाहे-बगाहे उनका बीजेपी प्रेम जागता रहता है।

उसूलों पर आंच आए तो…

यह तय है कि इन सीटों पर सिंधिया अपने समर्थकों को टिकट दिलाने में कोई कसर नहीं छोड़ेंगे। कांग्रेस से उनकी विदाई के पीछे भी यही सबसे बड़ा कारण था। सिंधिया ने तब आरोप लगाया था कि कमलनाथ सरकार में उनके समर्थकों की सुनवाई नहीं होती। समर्थकों की शिकायत पर ही उन्होंने सड़क पर उतरने की चेतावनी दी थी और वसीम बरेलवी का एक मशहूर शेर भी कहा था- उसूलों पर जहां आंच आए टकराना जरूरी है,
अगर जिंदा हो तो जिंदा नजर आना जरूरी है।

यहीं से शुरू हुआ टकराव

सिंधिया के इस बयान के बाद ही कमलनाथ से उनका सीधा टकराव शुरू हुआ था। इसका अंतिम नतीजा यह हुआ कि सिंधिया अपने समर्थक विधायकों के साथ बीजेपी में चले गए और कांग्रेस की सरकार गिर गई। कमलनाथ को मुख्यमंत्री पद छोड़ना पड़ा। इसके बाद शिवराज सिंह चौहान फिर से मुख्यमंत्री बने और सिंधिया-समर्थक दोबारा चुनाव जीतकर विधायक और मंत्री बने। जो चुनाव हार गए, उनका पेंच फंसने की संभावना हो सकती है।

क्या दोहराएगा इतिहास

सिंधिया के बारे में कहा जाता है कि वे अपने समर्थकों के लिए किसी भी हद तक जाने से गुरेज नहीं करते। दूसरी ओर, उनके विरोधी टिकट बंटवारे के दौरान इन छह सीटों पर मुश्किलें खड़ी करने में कोई कसर नहीं छोड़ेंगे। यदि दोनों में से कोई पक्ष झुकने को राजी नहीं हुआ तो 2020 काइतिहास दोहराने की संभावना से इनकार नहीं किया जा सकता।

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