बिहार का रण : नीतीश कुमार के वोट बैंक में सेंधमारी करने वाले 2 नेता हो सकते हैं किंगमेकर,10% वोटों पर है पकड़

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बिहार विधान सभा चुनाव (Bihar Assembly Elections) में पहले चरण का मतदान हो चुका है। अब बाकी दो चरणों के लिए सभी सियासी दल एड़ी-चोटी का जोर लगा रहे हैं। यह पहला चुनाव है, जब राज्य में 4 गठबंधन मैदान में है। इससे पहले दो या तीन दलों के बीच या फिर दो गठबंधनों के बीच ही मुकाबले होते रहे हैं लेकिन सत्ताधारी NDA गठबंधन के लिए राजद की अगुवाई वाला विपक्षी महागठबंधन के अलावा उपेंद्र कुशवाहा की अगुवाई वाला GDSF गठबंधन और NDA से अलग हुए चिराग पासवान की पार्टी LJP न केवल उनके वोट बैंक में सेंधमारी कर रही हैं बल्कि उनके लिए रोज नई मुश्किलें खड़ी कर रही है।

उपेंद्र कुशवाहा वाले गठबंधन में मायावती की BSP, असदुद्दीन ओवैसी की AIMIM और देवेंद्र यादव की समाजवादी जनता दल के अलावा सुहेलदेव भारतीय समाज पार्टी शामिल है। पहले चरण के 71 सीटों में से 62 पर GDSF ने प्रचार किया था। RLSP का मूलत: वोट बैंक कोयरी-कुशवाहा समाज है, जिसकी आबादी 6% के करीब है लेकिन उसमें मायावती और ओवैसी के मिल जाने से माना जा रहा है कि गठबंधन के पास 8% वोट बैंक हो सकता है।

2015 के चुनावी आंकड़ों पर गौर करें तो उस वक्त NDA का हिस्सा रही रालोसपा को कुल दो सीटों के साथ 2.6% वोट मिले थे, जबकि BSP को अपने दम पर 2.1% वोट मिले थे। AIMIM को तब मात्र 0.2% वोट मिले थे लेकिन सीमांचल में एक सीट उप चुनाव में जीतने के बाद अब उसकी ताकत बदली दिखाई दे सकती है।

दक्षिण बिहार के औरंगाबाद, कैमूर, सासाराम, शेखुपरा, जमुई, मुंगेर, पूर्वी चंपारण और समस्तीपुर के इलाके में RLSP की पैठ और पकड़ मानी जाती है। इसी तरह उत्तर प्रदेश की सीमा से सटे सासाराम, कैमूर, गोपालगंज समेत आधा दर्जन जिलों में BSP और मायावती की अच्छी पकड़ मानी जाती है। कुशवाहा और मायावती इन इलाकों में दो चुनावी रैलियां कर चुके हैं। सीमांचल के इलाके खासकर किशनगंज, अररिया, कटिहार के इलाके में जहां मुस्लिमों की अच्छी आबादी है, वहां ओवैसी की वजह से इस गठबंधन का प्रभाव दमदार हो सकता है। यानी इस गठबंधन को कोयरी कुर्मी, धानुक, दलित, मुस्लिम और कुछ इलाकों (मधुबनी में) यादव वोटरों का समर्थन मिल सकता है। सबसे बड़ी बात ये है कि ये गठबंधन नीतीश के परंपरागत वोटरों (कोइरी, कुर्मी, धानुक और पसमांदा मुस्लिम) में ही सेंध लगा रहा है।

उधर, NDA से अलग हुए चिराग पासवान के पास 5% पासवानों का परंपरागत वोट बैंक सुरक्षित है। इसके अलावा उन्होंने जिन-जिन सीटों पर जेडीयू के खिलाफ उम्मीदवार खड़े किए हैं, वहां पहले चरण में NDA वोट बैंक में सेंधमारी हुई है और आगे के दो चरणों में भी ये सिलसिला जारी रह सकता है। 2015 में लोजपा NDA के साथ थी, तब उसे एक सीट के साथ कुल 4.8% वोट मिले थे।

2015 के आंकड़ों के हिसाब से GDSF और LJP के पास कुल करीब 10% वोट बैंक हैं लेकिन मौजूदा राजनीतिक समीकरण और परिवेश में इन दोनों के पास 12% से ज्यादा वोट बैंक हो सकते हैं। ऐसे में अगर त्रिशंकु विधान सभा हुई तो सत्ता की चाभी इन दोनों नेताओं के पास हो सकती है। दोनों नेताओं (पासवान और कुशवाहा) का इतिहास दोनों गठबंधनों (जेडीयू-बीजेपी का एनडीए और राजद-कांग्रेस का यूपीए) के साथ रहने का रहा है।

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