बिहार की राजनीति में जनसुराज पार्टी के संस्थापक प्रशांत किशोर ने बड़ा राजनीतिक संदेश दिया है। बांकीपुर विधानसभा सीट पर हुए उपचुनाव में उनकी पार्टी ने शानदार प्रदर्शन करते हुए भाजपा के मजबूत गढ़ को कड़ी चुनौती दी है। सोमवार को सामने आए रुझानों और नतीजों ने राज्य की राजनीति में नई चर्चा छेड़ दी है। बांकीपुर सीट लंबे समय से भाजपा का प्रभावशाली क्षेत्र मानी जाती रही है। यही वजह है कि इस सीट पर जनसुराज की बढ़त को एक महत्वपूर्ण राजनीतिक उपलब्धि के रूप में देखा जा रहा है। परिणामों के बाद जनसुराज समर्थकों में उत्साह का माहौल है, जबकि भाजपा के लिए यह नतीजा चिंता का विषय माना जा रहा है। दरअसल, यह सीट भाजपा के राष्ट्रीय अध्यक्ष नितिन नवीन के राज्यसभा जाने के बाद खाली हुई थी, जिसके चलते उपचुनाव कराए गए। सीट बचाने के लिए भाजपा ने पूरी ताकत झोंक दी थी, लेकिन प्रशांत किशोर की चुनावी रणनीति और जमीनी अभियान ने मुकाबले को पूरी तरह बदल दिया।
ऐसे में सबसे बड़ा सवाल यही है कि आखिर प्रशांत किशोर ने भाजपा के इस मजबूत किले में सेंध कैसे लगाई? आइए जानते हैं वे प्रमुख कारण, जिन्होंने बांकीपुर के चुनावी समीकरण को बदलकर रख दिया।
बांकीपुर सीट क्यों थी अहम?
बांकीपुर विधानसभा सीट को बिहार में भाजपा के सबसे मजबूत गढ़ों में गिना जाता है। इस सीट पर पार्टी का दबदबा करीब तीन दशक से कायम रहा है। वर्ष 1995 में भाजपा ने इस क्षेत्र में जीत का सिलसिला शुरू किया था, जो लंबे समय तक जारी रहा। उस समय यह सीट पटना पश्चिम के नाम से जानी जाती थी। 1995 से 2005 तक भाजपा नेता नवीन किशोर ने यहां लगातार जीत दर्ज कर पार्टी की मजबूत पकड़ बनाई। उनके निधन के बाद वर्ष 2006 में हुए उपचुनाव में उनके पुत्र नितिन नवीन ने जीत हासिल कर राजनीतिक विरासत को आगे बढ़ाया। इसके बाद विधानसभा क्षेत्रों के परिसीमन के पश्चात यह सीट बांकीपुर के नाम से जानी जाने लगी। वर्ष 2010 से नितिन नवीन लगातार इस सीट का प्रतिनिधित्व करते रहे और हर चुनाव में जीत दर्ज की। हाल ही में भाजपा का राष्ट्रीय अध्यक्ष बनने के बाद उन्होंने विधानसभा सदस्यता से इस्तीफा दे दिया, जिसके कारण इस सीट पर उपचुनाव कराए गए।
कौन-कौन हैं उम्मीदवार?
बांकीपुर विधानसभा उपचुनाव में मुकाबला बेहद दिलचस्प और हाई-प्रोफाइल रहा। भारतीय जनता पार्टी ने इस सीट से नीरज कुमार सिन्हा को मैदान में उतारा। खास बात यह रही कि पार्टी ने नामांकन प्रक्रिया समाप्त होने से ठीक पहले अपने उम्मीदवार में बदलाव कर सभी को चौंका दिया था। वहीं, राष्ट्रीय जनता दल (राजद) ने रेखा गुप्ता पर भरोसा जताया। रेखा गुप्ता इससे पहले 2025 के विधानसभा चुनाव में भी इसी सीट से राजद की प्रत्याशी रह चुकी थीं। इस चुनाव की सबसे अधिक चर्चा जनसुराज पार्टी के संस्थापक प्रशांत किशोर को लेकर रही। चुनावी रणनीतिकार के रूप में पहचान बनाने वाले प्रशांत किशोर पहली बार स्वयं चुनावी मैदान में उतरे और बांकीपुर से अपनी दावेदारी पेश की। उनके चुनाव लड़ने के ऐलान के बाद इस उपचुनाव ने राज्य ही नहीं, बल्कि राष्ट्रीय स्तर पर भी राजनीतिक ध्यान आकर्षित किया। अब नतीजों में प्रशांत किशोर ने जीत दर्ज कर बिहार की राजनीति में एक नया अध्याय जोड़ दिया है। उनकी इस सफलता को जनसुराज के लिए बड़ी उपलब्धि और राज्य के राजनीतिक समीकरणों में अहम बदलाव के संकेत के रूप में देखा जा रहा है।
बीजेपी के वोट बैंक में जबरदस्त सेंधमारी
चुनाव से पहले भाजपा को भरोसा था कि बांकीपुर सीट पर उसकी जीत लगभग तय है। इसकी एक बड़ी वजह यहां का सामाजिक समीकरण था। क्षेत्र में सवर्ण मतदाताओं की संख्या करीब 33 प्रतिशत मानी जाती है, जबकि लगभग 14 प्रतिशत वोटर कायस्थ समुदाय से आते हैं। नितिन नवीन भी इसी समाज से जुड़े रहे हैं और भाजपा उम्मीदवार नीरज कुमार सिन्हा का संबंध भी कायस्थ समुदाय से था। इन्हीं आंकड़ों के आधार पर भाजपा को उम्मीद थी कि परंपरागत समर्थन उसके पक्ष में मजबूती से बना रहेगा। लेकिन चुनावी नतीजों ने अलग तस्वीर पेश की। परिणामों से संकेत मिलता है कि प्रशांत किशोर ने न केवल नए मतदाताओं को अपने पक्ष में किया, बल्कि भाजपा के पारंपरिक वोट बैंक में भी प्रभावी सेंध लगाने में सफलता हासिल की। यही वजह रही कि भाजपा की मजबूत मानी जाने वाली इस सीट पर मुकाबले का समीकरण बदल गया।
बांकीपुर का जातीय समीकरण
जाति प्रतिशत
सवर्ण 33%
कायस्थ 14%
गैर-कायस्थ सवर्ण 19%
यादव 12%
वैश्य 12%
दलित 8%
मुस्लिम 9%
प्रशांत किशोर ने कैसे हिलाया भाजपा का किला?
बांकीपुर उपचुनाव में प्रशांत किशोर की सफलता के पीछे सामाजिक समीकरणों को भी एक महत्वपूर्ण कारण माना जा रहा है। राजनीतिक विश्लेषकों के अनुसार, उन्होंने चुनाव प्रचार के दौरान खुद को भाजपा के विकल्प के रूप में पेश करने की रणनीति अपनाई, जिसका असर मतदाताओं पर देखने को मिला। प्रशांत किशोर ब्राह्मण समुदाय से आते हैं और बांकीपुर सीट पर ब्राह्मण, भूमिहार तथा राजपूत मतदाताओं की उल्लेखनीय संख्या है। माना जा रहा है कि उन्होंने सवर्ण मतदाताओं के एक हिस्से के साथ-साथ अत्यंत पिछड़ा वर्ग (EBC) के वोटों में भी अच्छी पैठ बनाई। यही वजह रही कि पारंपरिक वोटिंग पैटर्न में बदलाव देखने को मिला। इसके अलावा, राजनीतिक गलियारों में यह भी चर्चा है कि जनसुराज ने विपक्षी वोट बैंक में भी सेंध लगाई। कुछ विश्लेषकों का मानना है कि मुस्लिम मतदाताओं के एक वर्ग का समर्थन भी प्रशांत किशोर को मिला, जिससे मुकाबले का समीकरण बदल गया। वहीं, राजद के कुछ नेताओं ने भी दावा किया है कि भाजपा और जदयू के पारंपरिक वोटों का एक हिस्सा जनसुराज के पक्ष में गया, जिसका असर चुनाव परिणामों में साफ दिखाई दिया।

