यमन के हूती विद्रोहियों की ओर से सऊदी अरब के तेल ठिकानों और अहम रणनीतिक ठिकानों पर लगातार किए जा रहे हमलों ने एक बार फिर मध्य पूर्व में तनाव बढ़ा दिया है। ऐसे समय में सबसे ज्यादा चर्चा पाकिस्तान की भूमिका को लेकर हो रही है। सऊदी अरब का लंबे समय से करीबी रक्षा सहयोगी होने और हाल में तुर्की व सऊदी के साथ नए सुरक्षा सहयोग समझौते का हिस्सा बनने के बावजूद पाकिस्तान अब तक इस मुद्दे पर बेहद सतर्क रुख अपनाए हुए है। इस समझौते को लेकर पहले इस्लामाबाद ने बड़े-बड़े दावे किए थे कि किसी एक सदस्य देश पर हमला सभी पर हमला माना जाएगा, लेकिन मौजूदा संकट में पाकिस्तान की ओर से न तो किसी सैन्य कार्रवाई का संकेत मिला है और न ही हूती विद्रोहियों के खिलाफ कोई कड़ा रुख देखने को मिला है। ऐसे में सवाल उठ रहे हैं कि आखिर पाकिस्तान की यह चुप्पी किस मजबूरी का संकेत है? क्या इसकी वजह क्षेत्रीय राजनीति, ईरान के साथ उसके रिश्ते, आर्थिक चुनौतियां हैं या फिर कोई बड़ी रणनीतिक गणना? यही वजह है कि सऊदी के समर्थन को लेकर पाकिस्तान का मौजूदा रुख अब अंतरराष्ट्रीय स्तर पर चर्चा का विषय बन गया है।
क्या है पाकिस्तान और सऊदी का रक्षा समझौत?
पाकिस्तान और सऊदी अरब के बीच 1982 से रक्षा सहयोग का मजबूत ढांचा मौजूद है, जिसके तहत पाकिस्तानी सेना वर्षों से सऊदी अरब की सुरक्षा और मक्का-मदीना जैसे पवित्र स्थलों की रक्षा में सहयोग करती रही है। हाल के वर्षों में तुर्की, सऊदी अरब और पाकिस्तान के बीच सुरक्षा सहयोग को और मजबूत करने की कोशिश भी हुई। इसके बावजूद हूती हमलों के मौजूदा संकट में पाकिस्तान सैन्य हस्तक्षेप से बचता नजर आ रहा है। सवाल यह है कि इतने करीबी रक्षा संबंधों और समझौतों के बावजूद इस्लामाबाद आखिर खामोश क्यों है? इसके पीछे कई रणनीतिक और राजनीतिक वजहें बताई जा रही हैं।
ईरान के साथ 900 किमी लंबी सीमा का डर
पाकिस्तान की चुप्पी की सबसे अहम वजह ईरान के साथ उसके संबंध माने जा रहे हैं। हूती विद्रोहियों को ईरान का समर्थन मिलने की बात लंबे समय से कही जाती रही है। ऐसे में यदि पाकिस्तान हूतियों के खिलाफ सीधे सैन्य कार्रवाई करता है, तो इससे तेहरान के साथ उसके रिश्तों में गंभीर तनाव पैदा हो सकता है। दोनों देशों के बीच करीब 900 किलोमीटर लंबी साझा सीमा भी है, इसलिए इस्लामाबाद किसी नए क्षेत्रीय मोर्चे का जोखिम उठाने से फिलहाल बचता नजर आ रहा है।
संसद का सर्वसम्मत फैसला (2015 का प्रस्ताव)
पाकिस्तान का मौजूदा रुख नया नहीं है। 2015 में जब सऊदी अरब ने यमन में हूती विद्रोहियों के खिलाफ सैन्य अभियान शुरू किया था, तब पाकिस्तान की संसद ने सर्वसम्मति से तटस्थ रहने का फैसला किया था। यही वजह है कि आज भी इस्लामाबाद उसी नीति का पालन करते हुए सीधे सैन्य हस्तक्षेप से दूरी बनाए हुए है।
देश के अंदर शिया-सुन्नी हिंसा का बड़ा खतरा
पाकिस्तान के लिए आंतरिक सामाजिक और सांप्रदायिक संतुलन बनाए रखना भी एक बड़ी चुनौती है। देश में शिया समुदाय की उल्लेखनीय आबादी है, जबकि यमन का संघर्ष अक्सर शिया हूती समूह और सऊदी समर्थित सुन्नी नेतृत्व के बीच टकराव के रूप में देखा जाता है। ऐसे में किसी एक पक्ष के समर्थन में खुलकर उतरना पाकिस्तान के भीतर सांप्रदायिक तनाव बढ़ा सकता है, इसलिए इस्लामाबाद बेहद सतर्क रुख अपनाए हुए है।
घर में टीटीपी (TTP) और चरमराता बजट
पाकिस्तान इस समय गंभीर आंतरिक सुरक्षा चुनौतियों का सामना कर रहा है। एक ओर सुरक्षा बलों को तहरीक-ए-तालिबान पाकिस्तान (TTP) और बलूच लिबरेशन आर्मी (BLA) जैसे उग्रवादी संगठनों की गतिविधियों से लगातार जूझना पड़ रहा है, वहीं दूसरी ओर देश गहरे आर्थिक संकट से भी गुजर रहा है। आईएमएफ के कर्ज और कमजोर वित्तीय स्थिति के बीच पाकिस्तान के लिए किसी बाहरी सैन्य संघर्ष में शामिल होना न केवल रणनीतिक, बल्कि आर्थिक रूप से भी भारी पड़ सकता है। यही कारण है कि इस्लामाबाद फिलहाल अपने संसाधनों को घरेलू मोर्चे पर ही केंद्रित रखना चाहता है।
क्या है पाकिस्तान का रुख?
पाकिस्तान फिलहाल ऐसा संतुलित रुख अपनाए हुए है, जिससे न तो सऊदी अरब के साथ उसके रणनीतिक रिश्ते प्रभावित हों और न ही वह सीधे यमन संघर्ष का हिस्सा बने। इसी रणनीति को विश्लेषक ‘कैलकुलेटेड न्यूट्रैलिटी’ यानी सोची-समझी तटस्थता मानते हैं। सऊदी अरब में तैनात पाकिस्तानी सैनिकों की भूमिका फिलहाल सुरक्षा और प्रशिक्षण तक सीमित है और उन्हें यमन सीमा पर किसी भी सैन्य अभियान में शामिल होने की अनुमति नहीं है। हूती हमलों के बाद पाकिस्तान हर बार आधिकारिक बयान जारी कर हमलों की निंदा करता है और सऊदी की सुरक्षा के प्रति अपना समर्थन दोहराता है, लेकिन सैन्य हस्तक्षेप से दूरी बनाए रखता है। हाल ही में रक्षा मंत्री ख्वाजा आसिफ ने भी कहा कि पाकिस्तान सऊदी अरब के साथ मजबूती से खड़ा है, लेकिन उसके बयान में प्रत्यक्ष सैन्य कार्रवाई का कोई संकेत नहीं दिया गया।
पाकिस्तान की मजबूरी
करीबी रक्षा संबंधों और सुरक्षा सहयोग के दावों के बावजूद पाकिस्तान मौजूदा हालात में बेहद संतुलित और सतर्क रणनीति अपना रहा है। एक ओर उसे सऊदी अरब के साथ अपने रणनीतिक और आर्थिक रिश्ते बनाए रखने हैं, तो दूसरी ओर ईरान के साथ तनाव बढ़ाने से भी बचना है। इसके अलावा देश के भीतर सांप्रदायिक संवेदनशीलता, आंतरिक सुरक्षा चुनौतियां और कमजोर आर्थिक स्थिति भी उसके फैसलों को प्रभावित कर रही हैं। यही कारण है कि इस्लामाबाद फिलहाल सैन्य हस्तक्षेप के बजाय केवल कूटनीतिक समर्थन और आधिकारिक बयानों तक सीमित नजर आ रहा है। पाकिस्तान की मौजूदा नीति यह संकेत देती है कि वह क्षेत्रीय संघर्ष में सीधे शामिल होने के बजाय दोनों पक्षों के बीच संतुलन बनाए रखने की कोशिश कर रहा है।
बड़े-बड़े दावों की पोल खुली
मौजूदा संकट ने यह जरूर दिखाया है कि पाकिस्तान अपने सुरक्षा सहयोग और सैन्य साझेदारी के दावों के बावजूद किसी बड़े क्षेत्रीय संघर्ष में सीधे शामिल होने से बच रहा है। विश्लेषकों का मानना है कि इसके पीछे ईरान के साथ संबंध, घरेलू सुरक्षा चुनौतियां और आर्थिक दबाव जैसी कई रणनीतिक वजहें हैं। दूसरी ओर, सऊदी अरब भी अब अपनी सुरक्षा व्यवस्था को अधिक आत्मनिर्भर और आधुनिक बनाने पर जोर दे रहा है। इसी दिशा में वह उन्नत मिसाइल रक्षा प्रणालियों को मजबूत करने के साथ-साथ नए रक्षा साझेदारों के साथ सहयोग बढ़ाने की कोशिश कर रहा है। ऐसे में मध्य पूर्व की बदलती भू-राजनीति के बीच पाकिस्तान की संतुलन साधने की नीति और सऊदी की नई सुरक्षा रणनीति आने वाले समय में क्षेत्रीय समीकरणों को प्रभावित कर सकती है।

