डॉलर को BRICS की चुनौती या सिर्फ बचाव? लोकल करेंसी का बढ़ता दम

BRICS Vs USD : अमेरिका की वैश्विक ताकत सिर्फ उसकी सैन्य क्षमता तक सीमित नहीं है, बल्कि इसकी सबसे बड़ी वजह अमेरिकी डॉलर का दुनिया के व्यापार और वित्तीय व्यवस्था पर मजबूत दबदबा भी है। आज भी अंतरराष्ट्रीय कारोबार और वित्तीय लेनदेन में अमेरिकी डॉलर सबसे अधिक इस्तेमाल की जाने वाली मुद्रा बना हुआ है। JP Morgan की रिपोर्ट “De-Dollarization: Is the U.S. Dollar Losing Its Dominance?” के अनुसार, वैश्विक फॉरेन एक्सचेंज ट्रांजैक्शन में डॉलर की हिस्सेदारी करीब 90% है।

हालांकि, रिपोर्ट यह भी संकेत देती है कि समय के साथ डॉलर की पकड़ में धीरे-धीरे कमी आ रही है। इसके बावजूद फिलहाल ऐसी कोई दूसरी मुद्रा नहीं दिखती, जो आने वाले दशकों में अमेरिकी डॉलर की जगह पूरी तरह ले सके। सबसे बड़ी चुनौती डॉलर को वैश्विक विदेशी मुद्रा भंडार (Foreign Exchange Reserves) में अपनी हिस्सेदारी बनाए रखने के मोर्चे पर मिल रही है। 2021 के बाद से वैश्विक रिजर्व में डॉलर की हिस्सेदारी 2 प्रतिशत से अधिक घट चुकी है, जो बदलते वैश्विक आर्थिक समीकरणों की ओर इशारा करती है।

BRICS को क्यों माना जा रहा डॉलर के लिए चुनौती?
BRICS आज दुनिया की सबसे बड़ी उभरती अर्थव्यवस्थाओं के समूहों में से एक है। इस संगठन में भारत, रूस, चीन, ब्राजील और दक्षिण अफ्रीका समेत कुल 11 सदस्य देश शामिल हैं। ये देश मिलकर वैश्विक GDP का लगभग 40%, दुनिया की करीब 50% आबादी और लगभग 36% भू-भाग का प्रतिनिधित्व करते हैं। वहीं, वैश्विक व्यापार में भी BRICS की हिस्सेदारी करीब 25% मानी जाती है। यही बढ़ता आर्थिक प्रभाव अमेरिकी डॉलर के लंबे समय से चले आ रहे प्रभुत्व के लिए एक संभावित चुनौती के रूप में देखा जा रहा है। सदस्य देश आपसी व्यापार में स्थानीय मुद्राओं (Local Currencies) के इस्तेमाल को लगातार बढ़ावा दे रहे हैं। इसके साथ ही BRICS और शंघाई सहयोग संगठन (SCO) के स्तर पर साझा मुद्रा (Common Currency) की संभावनाओं पर भी समय-समय पर चर्चा होती रही है। यही कारण है कि वैश्विक वित्तीय व्यवस्था में BRICS की इस रणनीति को डी-डॉलराइजेशन की दिशा में एक महत्वपूर्ण कदम माना जा रहा है।

BRICS करेंसी पर क्या है भारत की स्थिति?
भारत का जोर सीधे डी-डॉलराइजेशन का नेतृत्व करने पर नहीं, बल्कि रुपये को अंतरराष्ट्रीय स्तर पर अधिक स्वीकार्य बनाने और BRICS देशों के बीच वैकल्पिक भुगतान प्रणालियों को मजबूत करने पर है। नई दिल्ली का मानना है कि स्थानीय मुद्राओं में व्यापार बढ़ाने से लेनदेन आसान होगा और डॉलर पर निर्भरता स्वाभाविक रूप से कम हो सकती है। वर्ष 2024 में विदेश मंत्री एस. जयशंकर ने भी साफ किया था कि भारत की कोई आधिकारिक ‘डी-डॉलराइजेशन’ नीति नहीं है। उन्होंने यह भी कहा कि BRICS के सभी सदस्य देशों का इस मुद्दे पर एक जैसा दृष्टिकोण नहीं है, इसलिए संगठन के भीतर डॉलर को लेकर पूरी तरह सहमति नहीं बनी है।

अब तक क्या कदम उठाए गए?
चीन का CIPS और रूस का SPFS जैसे वैकल्पिक वित्तीय नेटवर्क पश्चिमी भुगतान प्रणालियों पर निर्भरता घटाने की दिशा में अहम पहल माने जाते हैं। 2024 के कजान BRICS शिखर सम्मेलन में BRICS Bridge और BRICS Pay जैसे प्रस्तावों पर भी चर्चा हुई। वहीं, 2026 में भारत की BRICS अध्यक्षता के दौरान स्थानीय मुद्राओं में सीमा-पार भुगतान को बढ़ावा देने और New Development Bank की भूमिका मजबूत करना प्रमुख वित्तीय प्राथमिकताओं में शामिल है।

क्या है सबसे बड़ी मुश्किल?
स्थानीय मुद्रा में व्यापार का विचार सरल लगता है, लेकिन व्यवहार में कई चुनौतियां सामने आती हैं। सबसे बड़ी समस्या तब होती है, जब दो देशों के बीच व्यापार संतुलित नहीं होता। भारत-रूस व्यापार इसका प्रमुख उदाहरण है। रूस से बड़े पैमाने पर तेल आयात के कारण भारतीय रुपये रूसी बैंकों के वोस्ट्रो खातों में जमा होते गए, जबकि रूस उन रुपयों का समान स्तर पर उपयोग नहीं कर सका। रुपये की सीमित परिवर्तनीयता के चलते इन फंड्स का इस्तेमाल भी सीमित रहा, जिससे स्थानीय मुद्रा में व्यापार की व्यावहारिक कठिनाइयां उजागर हुईं।

करेंसी बदली कितना असान?
अमेरिकी डॉलर की सबसे बड़ी ताकत उसकी वैश्विक स्वीकार्यता और आसान खरीद-बिक्री है। इसके विपरीत, BRICS देशों की कई मुद्राएं पूंजी नियंत्रण और अन्य नियामकीय प्रतिबंधों के दायरे में हैं। चीन का युआन इसका प्रमुख उदाहरण है, जहां सरकारी नियंत्रण के कारण इसकी अंतरराष्ट्रीय पहुंच अब भी सीमित है। यही वजह है कि केवल डॉलर की जगह युआन, रुपया या रूबल में व्यापार शुरू करना पर्याप्त नहीं है। असली चुनौती यह है कि इन मुद्राओं में जमा धन का दूसरे देशों में कितनी आसानी से और कितने व्यापक स्तर पर उपयोग किया जा सकता है।

क्या है लोकल करेंसी ट्रेड की सीमा?
स्थानीय मुद्राओं में व्यापार बढ़ाने की राह में सबसे बड़ी चुनौती सुरक्षित और तरल (लिक्विड) निवेश विकल्पों की कमी है। यदि किसी BRICS देश के पास दूसरी सदस्य देश की मुद्रा का बड़ा ट्रेड सरप्लस जमा हो जाए, तो उसे ऐसी परिसंपत्ति चाहिए जहां वह इस धन को सुरक्षित रख सके। अमेरिका के पास इसके लिए विशाल ट्रेजरी बॉन्ड बाजार मौजूद है, जहां दुनिया भर के केंद्रीय बैंक और निवेशक आसानी से निवेश कर सकते हैं। इसके विपरीत, BRICS देशों के पास अभी ऐसा कोई साझा और गहरा वित्तीय बाजार नहीं है। यही वजह है कि डॉलर को चुनौती देना आसान नहीं है, क्योंकि किसी मुद्रा की भूमिका केवल भुगतान तक सीमित नहीं होती, बल्कि वह निवेश और विदेशी मुद्रा भंडार का भी महत्वपूर्ण माध्यम होती है।

क्यों भरोसे का संकट बड़ी चुनौती?
BRICS के भीतर आर्थिक सहयोग जितना महत्वपूर्ण है, उतनी ही बड़ी चुनौती सदस्य देशों के बीच विश्वास और रणनीतिक मतभेद भी हैं। भारत और चीन के बीच व्यापार असंतुलन के साथ-साथ सीमा विवाद जैसी संवेदनशील समस्याएं मौजूद हैं, जो किसी साझा वित्तीय व्यवस्था को जटिल बनाती हैं। ऐसे में यदि भविष्य में BRICS किसी एक मुद्रा या साझा करेंसी पर निर्भर होता है, तो उसके दुरुपयोग या आर्थिक दबाव के जोखिम को लेकर भी सवाल उठते हैं। यही कारण है कि विशेषज्ञों का मानना है कि फिलहाल साझा BRICS मुद्रा की अवधारणा व्यावहारिक रूप से काफी दूर है और संगठन का फोकस अभी स्थानीय मुद्राओं में व्यापार और वैकल्पिक भुगतान व्यवस्था को मजबूत करने पर अधिक है।

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