कैसे बना उत्तर कोरिया न्यूक्लियर पावर? वो ताकत जिससे अमेरिका भी डरता है!

दुनिया के नक्शे पर सबसे छोटा दिखने वाला उतर कोरिया आज अपनी ताकत के कारण विश्विक राजनीति में बड़ा प्रभाव रखता है। 1950 के दशक के बाद कोरियाई युद्ध के बाद जब देश दो हिस्सों —उतर और दक्षिण में बंटा, तो उतर को भारी तबाही का सामना करना पड़ा। इसी अनुभव ने उसके नेतृत्व को यह सोचने पर मजबूर किया देश की सुरक्षा के लिए असाधारण शक्ति जरूरी है। 1980 के दशक में प्योंगयांग के परमाणु कार्यक्रम की शुरुआत इसी सोच का परिणाम थी, जिसने आगे चलकर उत्तर कोरिया को एक परमाणु ताकत के रूप में स्थापित कर दिया, भले ही उसे अंतरराष्ट्रीय प्रतिबंधों और दबावों का सामना करना पड़ा हो |

1960 के दशक सोवियत संघ के सहयोग से उत्तर कोरिया ने अपने परमाणु कार्यक्रम की बुनियाद रखी। यांगबोइन में रिसर्च रिएक्टर स्थापित किया गया और वैज्ञानिकों को विशेष प्रशिक्षण दिया गया। शुरुआत में इसे शांतिपूर्ण ऊर्जा परियोजना के रूप में पेश किया गया, लेकिन समय के साथ इसके असली उद्देश्य सामने आने लगे। 1980 के दशक तक उत्तर कोरिया प्लूटोनियम उत्पादन की क्षमता हासिल कर चुका था, जो परमाणु हथियार बनाने का अहम आधार है।

सबसे विवादित अध्याय
1990 का दशक उत्तर कोरिया को परमाणु कार्यक्रम के लिए सबसे संवेदनशील दौर माना जाता है। सोवियत संघ के टूटने के बाद उसे नए सहयोगी की तलाश थी, और इसी दौरान पाकिस्तान के साथ उसके संबंधों की चर्चा सामने आई। आरोप लगे कि दोनों देशों के बीच तकनीकी सहयोग हुआ, जिसमें उत्तर कोरिया ने मिसाइल तकनीक साझा की, जबकि बदले में उसे यूरेनियम संवर्धन से जुड़ी जानकारी मिली।माना जाता है कि इस कथित सहयोग ने उसके परमाणु कार्यक्रम को और तेजी से आगे बढ़ाने में अहम भूमिका निभाई।

दुनिया के सामने खुली चुनौती
अमेरिका और अंतर्राष्ट्रीय एजेंसियों को उत्तर कोरिया के परमाणु कार्यक्रम की जानकारी मिल चुकी थी, जिसके चलते 1994 में एक समझौते के जरिए इसे रखने की कोशिश की गई, लेकिन यह प्रयास लम्बे समय तक टीक नहीं सका। इसके बाद 2003 में उत्तर कोरिया ने प्रमाण अप्रसार संधि (NPT) से अलग होकर दुनिया को खुली चुनौती दे दी। 9 अक्टूबर 2006 को उसने अपना पहला परमाणु परीक्षण किया, जिसने वैश्विक स्तर पर हलचल मचा दी। इसके बाद भी उसने कई परीक्षण किए, जिनमें 2017 का परीक्षण सबसे शक्तिशाली माना जाता है।

किम जोंग के सत्ता में आने के बाद कार्यक्रम में आई और तेजी
2011 में किम जोंग उन के सत्ता संभालने के बाद उत्तर कोरिया के परमाणु और मिसाइल कार्यक्रम में तेजी आ गई। उन्होंने “ब्यूजिंग” नीति के तहत आर्थिक विकास और परमाणु शक्ति को एक साथ आगे बढ़ने पर जोर दिया। इसी दौर में देश ने नई पीढ़ी की मिसाइलें विकसित की, जिनमें इंटरकॉन्टिनेंटल बैलेस्टिक मिसाइलें भी शामिल हैं, जो हजारों किलोमीटर दूर तक मार करने में सक्षम हैं।

हो सकते है 20 से 60 परमाणु हथियार
आज उत्तर कोरिया के पास अनुमानित तौर पर 20 से 60 परमाणु हथियार होने की संभावना जताई जाती है। उसकी उन्नत मिसाइल क्षमता अमेरिका तक पहुंचने में सक्षम मानी जाती है, जिसके कारण वैश्विक स्तर पर तनाव के बावजूद सीधा सैन्य संघर्ष टलता रहा है। दक्षिण कोरिया की सुरक्षा, चीन की रणनीतिक भूमिका और संभावित बड़े पैमाने की तबाही इस स्थिति को और जटिल बना देते हैं। अब उत्तर कोरिया एक देश नहीं, बल्कि एक परमाणु हकीकत बन चुका है — जहां यह सवाल अब भी बना हुआ है कि ये हथियार सुरक्षा के लिए हैं या किसी बड़े टकराव का संकेत।

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