भारतीय रेलवे ने हरित परिवहन की दिशा में बड़ा कदम उठाते हुए देश की पहली हाइड्रोजन ट्रेन को शुरू कर दिया है। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने हरियाणा के जींद रेलवे स्टेशन से इस ट्रेन को हरी झंडी दिखाई। यह ट्रेन जींद और सोनीपत के बीच संचालित होगी। इसके साथ ही भारत उन चुनिंदा देशों की सूची में शामिल हो गया है, जहां हाइड्रोजन ईंधन से चलने वाली शून्य-उत्सर्जन (Zero Emission) ट्रेनें संचालित होती हैं। इस ट्रेन की सबसे बड़ी खासियत यह है कि इसे चलाने के लिए न डीजल की जरूरत होती है और न ही 25 केवी ओवरहेड बिजली की। हाइड्रोजन फ्यूल सेल तकनीक से संचालित यह ट्रेन ईंधन के रूप में हाइड्रोजन का उपयोग करती है और उप-उत्पाद के रूप में केवल पानी छोड़ती है।
क्या है टेक्नोलॉजी?
देश की पहली हाइड्रोजन ट्रेन में अत्याधुनिक प्रोपल्शन टेक्नोलॉजी का इस्तेमाल किया गया है, जो इसे पारंपरिक ट्रेनों से अलग बनाती है। यह सिस्टम करीब 3,200 हॉर्सपावर तक की क्षमता विकसित करता है, जिससे ट्रेन बेहतर रफ्तार और प्रदर्शन के साथ संचालित होती है। हाइड्रोजन फ्यूल सेल तकनीक के जरिए बिजली तैयार की जाती है, जो इंजन को शक्ति प्रदान करती है। इस पूरी प्रक्रिया में ऊर्जा उत्पादन के बाद केवल पानी ही उप-उत्पाद के रूप में निकलता है, जिससे यह पर्यावरण के लिए बेहद अनुकूल मानी जाती है। भारत के अलावा जर्मनी, जापान, चीन और अमेरिका जैसे कुछ चुनिंदा देश ही इस तकनीक का उपयोग कर रहे हैं या इसके परीक्षण में जुटे हैं।
हाइड्रोजन ट्रेन की 10 खास बातें
•NaMo GreenRail में कुल 10 कोच हैं, जिन्हें हाइड्रोजन फ्यूल सेल आधारित प्रोपल्शन सिस्टम से संचालित किया जाता है।
•ट्रेन में 1200 kW क्षमता वाला हाइड्रोजन फ्यूल सेल सिस्टम लगाया गया है, जो इंजन को आवश्यक ऊर्जा उपलब्ध कराता है।
•इंजन में हाइड्रोजन टैंक और फ्यूल सेल लगाए गए हैं। टैंकों में संग्रहित हाइड्रोजन से बिजली पैदा होती है, जिससे ट्रेन आगे बढ़ती है।
•ऊर्जा को सुरक्षित रखने और जरूरत के समय इस्तेमाल करने के लिए इसमें बैटरी स्टैक भी लगाए गए हैं।
•चालक के केबिन में PAPIS डिस्प्ले सिस्टम दिया गया है, जिससे ट्रेन की निगरानी और संचालन आसान होता है।
•ट्रेन में हाइड्रोजन की आपूर्ति के लिए जींद रेलवे स्टेशन पर हाइड्रोजन उत्पादन, भंडारण और रिफ्यूलिंग की विशेष व्यवस्था की गई है।
भारतीय रेलवे के लिए हाइड्रोजन ट्रेन परियोजना को भविष्य की स्वच्छ और आधुनिक रेल व्यवस्था की दिशा में एक अहम कदम माना जा रहा है। यदि यह पहल सफल रहती है, तो आने वाले समय में कालका-शिमला, दार्जिलिंग हिमालयन रेलवे, पातालपानी और नीलगिरी (ऊटी) जैसे हेरिटेज रेल मार्गों पर डीजल और कोयले से चलने वाली ट्रेनों की जगह पर्यावरण-अनुकूल हाइड्रोजन ट्रेनों का संचालन किया जा सकता है। इससे प्रदूषण में कमी आएगी और इन ऐतिहासिक रेल मार्गों पर ग्रीन ट्रांसपोर्ट को बढ़ावा मिलेगा।

