आप रोजाना ChatGPT का इस्तेमाल करते हैं, Google पर सर्च करते हैं या Gmail से मेल भेजना आपके लिए आम बात है. लेकिन क्या आपने कभी सोचा है कि अगर यह सब एक दिन बंद हो गया, तो क्या होगा. ये कोई साइंस फिक्शन की कहानी नहीं है. ये एक असली खतरा है, जिसे एक्सपर्ट ‘किल स्विच’ कह रहे हैं. भारत आज आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस (AI) के मामले में दुनिया का तीसरा सबसे बड़ा देश बन चुका है. ChatGPT के 33 करोड़ औऱ Google Gemini के 22.9 करोड़ मासिक यूजर हैं. लेकिन ये सारी विदेशी कंपनियां हैं. हमारी डिजिटल दुनिया की रीढ़ किसी और के हाथ में है. तो जरा सोचिए कि यह खतरा कितना बड़ा हो सकता है…
पहला खतरा: जब कोई एक बटन दबाकर सब कुछ बंद कर दे
ये सबसे बड़ा और सबसे गंभीर खतरा है. भारत डिजिटल संवाद 2026 नाम के एक बड़े सम्मेलन में सबसे चौंकाने वाली चेतावनी दी गई कि भारत का डिजिटल बैकबोन रिमोट से ‘स्विच ऑफ’ किया जा सकता है. इस सम्मेलन में नीति-निर्माता, साइबर सुरक्षा एक्सपर्ट और उद्योग के दिग्गज जुटे थे.
हमारा बैंकिंग सिस्टम, टेलीकॉम नेटवर्क और एनर्जी इंफ्रास्ट्रक्चर सब धीरे-धीरे क्लाउड पर शिफ्ट हो रहा है. ये क्लाउड ज्यादातर अमेजन (AWS), माइक्रोसॉफ्ट (Azure), गूगल (Cloud) जैसी विदेशी कंपनियों के पास है.
एक्सपर्ट्स का कहना है कि सिर्फ डेटा को भारत में रख लेना काफी नहीं है. असली सवाल ये है कि ‘चाबी’ यानी कंट्रोल किसके पास है. डेटा भले ही भारत में हो, लेकिन अगर उसे एक्सेस करने, एन्क्रिप्ट करने और ऑपरेट करने का कंट्रोल किसी और के पास है, तो हम असली मालिक नहीं हैं.
IIIT हैदराबाद के डायरेक्टर डॉ. संदीप के. शुक्ला ने साफ कहा, ‘आप किसी ऐसे प्लेटफॉर्म पर पूरी तरह निर्भर नहीं रह सकते, जिसे बाहर से किसी भी पल बंद किया जा सकता है.’ इसका मतलब साफ है कि अगर कल कोई विदेशी सरकार किसी राजनयिक तनाव के चलते इन सेवाओं को बंद करने का आदेश दे, तो भारत की बैंकिंग, स्वास्थ्य, शिक्षा और रक्षा सब कुछ ठप हो सकता है.
दूसरा खतरा: ‘इंटेलिजेंस’ इम्पोर्ट में डॉलर में चुकानी पड़ेगी कीमत
आज ChatGPT, Gemini, Claude जैसे AI मॉडल ज्यादातर फ्री हैं, लेकिन ये मुफ्त का दौर ज्यादा दिन नहीं चलेगा. कंपनियां पहले से ही यूज-बेस्ड प्राइसिंग की तरफ शिफ्ट हो रही हैं. यानी, जितना इस्तेमाल करोगे, उतना पैसा देना होगा.
मीडिया रिपोर्ट्स के मुताबिक, भारत को तेल और सोने के आयात पर पहले से ही भारी नुकसान उठाना पड़ता है. सिर्फ FY26 में ही भारत ने क्रूड ऑयल और गोल्ड पर 206 बिलियन डॉलर (लगभग 19.65 लाख करोड़ रुपए) खर्च किए. अब इसमें ‘इंटेलिजेंस’ का आयात जुड़ सकता है.
Zoho के फाउंडर श्रीधर वेम्बू ने इस खतरे को बड़ी ही सटीकता से समझाया है. वेम्बू ने Big Tech (Google, Meta, OpenAI, Amazon) की तुलना ईस्ट इंडिया कंपनी से की है. वेम्बू का कहना है, ‘हम अपना कच्चा माल यानी हमारा डेटा और हमारी प्रतिभा सस्ते में बेचते हैं, जबकि तैयार प्रोडक्ट (AI सर्विसेज) महंगे दाम पर खरीदते हैं.’
ये AI सर्विसेज पूरी तरह पेड हो जाएंगी, तो भारत की विदेशी मुद्रा (forex) पर भारी बोझ बढ़ जाएगा.
तीसरा खतरा: जब कंपनी ने ही बंद कर दिया एक्सेस
जून 2026 में एक ऐसी घटना हुई, जिसने भारत के स्टार्टअप इकोसिस्टम को हिलाकर रख दिया. अमेरिकी AI कंपनी Anthropic ने अपना एडवांस AI मॉडल ‘Fable 5’ अचानक वापस ले लिया, क्योंकि अमेरिकी सरकार ने राष्ट्रीय सुरक्षा के नाम पर ऐसा करने को कहा था.
इसका मतलब यह है कि जिन भारतीय स्टार्टअप्स ने अपना पूरा काम इस मॉडल पर बनाया था, वे बेकार हो गए. उनके पास कोई ऑप्शन नहीं था, क्योंकि वे खुद का मॉडल नहीं बना सके थे.
यही ‘वेंडर लॉक-इन’ का खतरा है. भारतीय कंपनियां कुछ ही विदेशी AI प्रोवाइडर्स पर इतनी निर्भर हो गई हैं कि अगर उनकी एक्सेस या प्राइसिंग में भी बदलाव आए, तो उनका पूरा कामकाज ठप हो सकता है.
सोचिए अगर कल OpenAI या Google ने अपनी सेवाएं भारत में बंद कर दीं, या उनकी कीमतें 10 गुना बढ़ा दीं, तो भारत की कितनी कंपनियां और संस्थान बर्बाद हो जाएंगे?
चौथा खतरा: डेटा की सुरक्षा और आजादी
जब आप ChatGPT या Google पर कुछ टाइप करते हैं, तो आपका डेटा ज्यादातर विदेशों में और खासतौर पर अमेरिका के डेटा सेंटर्स में जाता है. Nasscom की रिपोर्ट के मुताबिक, बाहरी AI मॉडल्स पर निर्भर होने की वजह से डेटा संप्रभुता (data sovereignty), सुरक्षा और क्रिटिकल इंफ्रास्ट्रक्चर पर कंट्रोल की कमी जैसे गंभीर सवाल खड़े करती है.
हमारा डेटा जो हमारी सेहत, बैंकिंग, पहचान, यहां तक कि हमारी रक्षा से जुड़ा है, वो विदेशी कंपनियों और उनकी सरकारों की पहुंच में है. 2026 में सेकराइट इंडिया साइबर थ्रीट रिपोर्ट ने एक साल में 26.5 करोड़ से ज्यादा साइबर खतरों का पता लगाया. जब हमारा डेटा विदेशी सर्वर पर है, तो उसे सुरक्षित रखना और भी मुश्किल हो जाता है.
पांचवां खतरा: भारत का IT सेक्टर खतरे में है
भारत का IT सेक्टर 300 बिलियन डॉलर (लगभग 28.61 लाख करोड़) का है और इसमें 60 लाख लोग काम करते हैं. लेकिन AI के आने से ये सेक्टर खुद खतरे में है. मोतीलाल ओसवाल की रिपोर्ट के मुताबिक, AI तेजी से IT सर्विसेज का मार्जिन खा रहा है. AI की वजह से प्रोजेक्ट के आकार घट रहे हैं, प्राइसिंग पर दबाव है और ऑटोमेशन की वजह से नौकरियां खत्म हो रही हैं.
भारत में AI स्टार्टअप्स ने सिर्फ 86 करोड़ डॉलर जुटाए हैं, जबकि अमेरिका में 129 बिलियन डॉलर. यानी भारत के पास अपने AI मॉडल बनाने के लिए संसाधनों की बहुत कमी है. हमें विदेशी मॉडल्स पर ही निर्भर रहना पड़ता है.
छठा खतरा: बिना लोकल कॉन्टेक्स्ट के AI में 40% तक गलतियां
ये खतरा थोड़ा अलग है, लेकिन बहुत गंभीर है. इंडिया AI इम्पेक्ट समिट 2026 में महाराष्ट्र सरकार के वरिष्ठ अधिकारी बृजेश सिंह ने बताया कि बिना लोकल कॉन्टेक्स्ट के बने AI मॉडल्स में 40% तक गलती हो सकती है. मतलब, कोई AI मॉडल जो अमेरिका या यूरोप में बढ़िया काम करता है, वो भारत में गलत नतीजे दे सकता है, क्योंकि हमारी भाषाएं, हमारा कल्चर और हमारा डेटा अलग है.
अगर हम पुलिसिंग, ट्रैफिक मैनेजमेंट या स्वास्थ्य सेवा जैसे कामों में बिना टेस्ट किए विदेशी AI का इस्तेमाल करें, तो ये जानलेवा साबित हो सकता है.
सरकार इस खतरे से बचने के लिए क्या कर रही है?
भारत सरकार इस खतरे को समझती है. इस वजह से उसने इंडिया AI मिशन शुरू किया है. इसके तहत:
20 स्वदेशी AI मॉडल्स को सपोर्ट किया जा रहा है. इनमें 12 लार्ज लेंग्वेज मॉडल्स (LLMs) और 8 स्मॉल लेंग्वेज मॉडल्स (SLMs) शामिल हैं.
सर्वम AI, ज्ञानि AI, भारतजेन और अवतार AI जैसे भारतीय स्टार्टअप्स को बढ़ावा दिया जा रहा है.
93.18 लाख GPU घंटे रिसर्च के लिए मंजूर किए गए हैं.
26.5 लाख से ज्यादा लोगों ने YUVA AI for All प्रोग्राम पूरा किया है.
58 AI सेंटर्स ऑफ एक्सीलेंस (CoEs) को मंजूरी दी गई है.
प्रधानमंत्री मोदी ने 2047 तक भारत को AI सुपरपावर बनाने का लक्ष्य रखा है. OpenAI के CEO सैम ऑल्टमैन ने भी माना है कि दुनिया का कोई भी देश भारत की AI एनर्जी की बराबरी नहीं कर सकता है. ChatGPT भारत में OpenAI का दूसरा सबसे बड़ा मार्केट है, जहां 10 करोड़ से ज्यादा वीकली एक्टिव यूजर हैं.

