हिजली जेल से IIT तक का सफर, अंग्रेजों की जेल बनी भारत की टेक्नोलॉजी की जन्मभूमि

स्वतंत्रता दिवस पर देश की आजादी की कहानी याद करते हुए हिजली डिटेंशन कैंप का इतिहास भी बेहद खास है। पश्चिम बंगाल की इसी जगह पर अंग्रेज स्वतंत्रता सेनानियों और क्रांतिकारियों को कैद करते थे। आजादी के बाद यही परिसर भारत के तकनीकी भविष्य की नींव बना और यहीं से देश के पहले IIT की शुरुआत हुई। आज यही संस्थान IIT खड़गपुर के नाम से दुनियाभर में अपनी पहचान बना चुका है।

हिजली की वही दीवारें, जो कभी गुलामी और संघर्ष की गवाह थीं, आज भारत की तकनीकी तरक्की की कहानी कहती हैं। इन्हीं ऐतिहासिक दीवारों के बीच देश के युवाओं ने ज्ञान और विज्ञान के जरिए नए भारत की नींव मजबूत की। IIT खड़गपुर का सफर सिर्फ एक संस्थान की कहानी नहीं, बल्कि जेल से विश्वविद्यालय और संघर्ष से आत्मनिर्भरता तक भारत की यात्रा का प्रतीक है।

हिजली का इतिहास आजादी के संघर्ष की एक दर्दनाक घटना से भी जुड़ा है। 16 सितंबर 1931 को ब्रिटिश पुलिस ने कैंप में दो निहत्थे बंदियों संतोष कुमार मित्र और तारकेश्वर सेनगुप्ता की गोली मारकर हत्या कर दी थी। इस घटना से पूरे देश में आक्रोश फैल गया। नेताजी सुभाष चंद्र बोस उनके शव लेने हिजली पहुंचे, जबकि रवींद्रनाथ टैगोर समेत कई राष्ट्रीय नेताओं ने ब्रिटिश कार्रवाई की कड़ी निंदा की।

ब्रिटिश शासन के दौरान बंगाल का मिदनापुर इलाका स्वतंत्रता आंदोलन का बड़ा केंद्र था। आंदोलन में युवाओं की बढ़ती भागीदारी से चिंतित अंग्रेजों ने 1930 में हिजली डिटेंशन कैंप बनाया, जहां कई स्वतंत्रता सेनानियों को हिरासत में रखा जाता था। लेकिन आजादी के बाद इसी हिजली की पहचान बदल गई और यह स्थान भारत की तकनीकी शिक्षा के एक नए युग की शुरुआत का गवाह बना।

आजादी के बाद भारत के सामने सबसे बड़ी चुनौतियों में से एक थी विज्ञान और तकनीक के क्षेत्र में आत्मनिर्भर बनना। इसी उद्देश्य से 1946 में एन.आर. सरकार समिति ने देश के अलग-अलग हिस्सों में उच्च तकनीकी संस्थान स्थापित करने की सिफारिश की। इसी योजना ने भारत में IIT व्यवस्था की नींव रखी। आधिकारिक इतिहास के मुताबिक, IIT खड़गपुर मई 1950 में अस्तित्व में आया और सितंबर 1950 में हिजली परिसर में स्थानांतरित हुआ।

पहले IIT का नाम था टेक्निकल इंस्टीट्यूट
18 अगस्त 1951 को हिजली के उसी ऐतिहासिक डिटेंशन कैंप में भारत के भावी इंजीनियरों की पढ़ाई शुरू हुई। पहले बैच में 224 छात्र और 42 शिक्षक शामिल थे और कैंप की पुरानी इमारतों में ही क्लासरूम व लैब तैयार किए गए। कभी जहां स्वतंत्रता सेनानियों को कैद रखा जाता था, वहीं अब आजाद भारत के युवा विज्ञान और तकनीक की शिक्षा ले रहे थे। शुरुआत में इसे टेक्निकल इंस्टीट्यूट कहा गया, लेकिन 1956 के कानून के बाद इसे IIT खड़गपुर का नाम मिला।

कब लगी थी IIT की पहली क्लास
18 अगस्त 1951 को मौलाना अबुल कलाम आजाद ने संस्थान का औपचारिक उद्घाटन किया, जो आगे चलकर देश के पहले IIT के रूप में स्थापित हुआ। इसके बाद 1956 में संसद के कानून के तहत IIT खड़गपुर को ‘इंस्टीट्यूट ऑफ नेशनल इंपोर्टेंस’ का दर्जा मिला। इसी साल संस्थान के मुख्य भवन का भी उद्घाटन हुआ, जिससे हिजली की ऐतिहासिक पहचान को एक नई दिशा मिली।

मुख्य इमारत को बनाया गया म्यूजियम
जिस हिजली परिसर में अंग्रेजों ने स्वतंत्रता सेनानियों को कैद किया था, वहीं आजाद भारत ने ज्ञान और तकनीक की नई इबारत लिखी। 1956 के पहले दीक्षांत समारोह में पंडित जवाहरलाल नेहरू ने इस संस्थान को बदलते भारत के भविष्य का प्रतीक बताया था। हिजली की पुरानी जेल इमारत को आज भी संरक्षित रखा गया है और अब इसे ‘नेहरू म्यूजियम ऑफ साइंस एंड टेक्नोलॉजी’ के रूप में इस्तेमाल किया जाता है।

Leave a Comment

Your email address will not be published. Required fields are marked *

बिहार के इन 2 हजार लोगों का धर्म क्या है? विश्व का सबसे अमीर क्रिकेट बोर्ड कौन सा है? दंतेवाड़ा एक बार फिर नक्सली हमले से दहल उठा SATISH KAUSHIK PASSES AWAY: हंसाते हंसाते रुला गए सतीश, हृदयगति रुकने से हुआ निधन India beat new Zealand 3-0. भारत ने किया कीवियों का सूपड़ा साफ, बने नम्बर 1