द्रौपदी मुर्मू बनेंगी Madam President! जानें- BJP की रणनीति के सियासी फायदे

राष्ट्रपति चुनाव 2022 (President Elections 2022) के लिए भारतीय जनता पार्टी (BJP) की अगुवाई वाले राष्ट्रीय जनतांत्रिक गठबंधन (NDA) ने मंगलवार को अपने उम्मीदवार के नाम की घोषणा कर दी. झारखंड की पूर्व राज्यपाल, ओडिशा की पूर्व मंत्री और भारतीय जनता पार्टी की पूर्व नेता द्रौपदी मुर्मू ( Draupadi Murmu) का देश का अगला राष्ट्रपति बनना तय माना जा रहा है. उनके नाम के ऐलान के साथ ही बीजेपी ने आगामी विधानसभा चुनावों ( Upcoming Assembly Elections) को लेकर अपनी संभावित रणनीति को स्पष्ट कर दिया है.

राष्ट्रपति चुनाव के अंकगणित में बीजेपी और एनडीए का पलड़ा भारी है. ऐसी परिस्थिति में द्रौपदी मुर्मू का राष्ट्रपति चुना जाना लगभग निश्चित है. आइए, जानने की कोशिश करते हैं कि मुर्मू को राष्ट्रपति बनाने से भारतीय जनता पार्टी को फौरी तौर पर और दूरगामी सियासी फायदे के रूप में क्या बढ़त मिल सकती है. साथ ही इस अहम फैसले से बीजेपी के रणनीतिकारों ने कितना बड़ा राजनीतिक दांव लगाया है.

पूर्वी भारत में मजबूत होंगी BJP की जड़ें

आदिवासी समुदाय ( Scheduled Tribe Community) से आने वाली महिला उम्मीदवार द्रौपदी मुर्मू को राष्ट्रपति पद के लिए आगे कर बीजेपी ने विपक्ष के सामने बहुत बड़ी चुनौती पेश कर दी है. राजनीतिक जानकारों के मुताबिक देश के आदिवासी समुदाय और महिलाओं के बीच अपनी पैठ को मजबूत करने में जुटी बीजेपी को इस फैसले से पूर्वी भारत के राज्यों में भी अपनी जड़ें मजबूत करने में बड़ी मदद मिलेगी. द्रौपदी मुर्मू ओडिशाके मयूरभंज जिले की निवासी हैं. ओडिसा की राजनीति में उनका सीधा और असरदार दखल रहा है. वहीं झारखंड में वह राज्यपाल रह चुकी हैं.

विधानसभा चुनावों में मिलेगा सीधा लाभ

राजनीतिक विश्लेषकों के मुताबिक भारतीय जनता पार्टी को इस फैसले से आने वाले विधानसभा चुनावों जैसे ओडिशा, झारखंड, गुजरात, मध्य प्रदेश, राजस्थान और महाराष्ट्र जैसे कई राज्यों में काफी फायदा हो सकता है. इन सभी राज्यों में आदिवासी समुदाय बड़े वोट समूह के रूप में असर रखते हैं. इन सभी राज्यों में भारतीय जनता पार्टी के लिए पिछला चुनाव संघर्षपूर्ण रहा है. खासकर आदिवासी बहुल सीटों पर बीजेपी की मेहनत अपेक्षित रंग नहीं ला सकी थी. इन सभी राज्यों में इस साल और अगले साल चुनाव है.

2024 लोकसभा चुनाव पर भी निगाहें

देश में दो टेन्योर से सत्तारुढ़ बीजेपी के लिए लोकसभा चुनाव 2024 की रणनीति के लिए भी ये फैसला एक कारगर कदम साबित हो सकता है. लोकसभा चुनाव 2019 से पहले 2017 में अनुसूचित समुदाय से आने वाले रामनाथ कोविंद को राष्ट्रपति बनाए जाने के फैसले का असर आगामी विधानसभा चुनावों और लोकसभा चुनाव 2019 पर साफ दिखा था. चुनावी आंकड़ों के मुताबिक देश में इस समुदाय के सबसे अधिक वोट बीजेपी को मिले थे. माना जा रहा है कि ऐसा ही इतिहास 2024 में अनुसूचित जनजाति समुदाय के वोट के मामले में सामने आ सकता है. क्योंकि देश के सभी राज्यों में आदिवासी समुदाय फैला हुआ है.

महिला सशक्तिकरण की मिसाल

आधी आबादी यानी महिलाओं को भी द्रौपदी मुर्मू को राष्ट्रपति उम्मीदवार बनाए जाने के बीजेपी के फैसले से एक विशेष संदेश पहुंचा है. बीते कई साल से बीजेपी को सभी चुनावों में महिलाओं का बड़ा समर्थन मिला है. तीन तलाक खत्म करने के फैसले, सबका साथ-सबका विकास जैसे नारे वगैरह से महिलाओं में बीजेपी के लिए बना सॉफ्ट कॉर्नर और मजबूत हो सकता है. देश के सबसे बड़े संवैधानिक पद पर वंचित अनुसूचित जनजाति समुदाय से महिला उम्मीदवार बनाए जाने से दोनों वर्गों को बेहतर संदेश मिला है.

राष्ट्रपति चुनाव के लिए जरूरी वोट

भारतीय जनता पार्टी की भावी राजनीतिक रणनीति में पूर्वी भारत ( Look East Policy), आदिवासी और महिला शामिल रही है. इसलिए राष्ट्रपति चुनाव के लिए उम्मीदवार का नाम तय करने वाली हर बैठक में द्रौपदी मुर्मू का नाम चर्चा में शामिल रहा है. आखिरकार उनका नाम ही तय हुआ, क्योंकि उनमें इन तीनों का ही समन्वय है. शिक्षक के पेशे से जुड़े होने की वजह से द्रौपदी मुर्मू बेहद सौम्य महिला भी हैं. उनका राजनीतिक जीवन भी निर्विवाद रहा है. उनके नाम पर राष्ट्रपति चुनाव के लिए जरूरी वोट जुटाने में भी मदद मिलेगी. ओडिशा के मुख्यमंत्री और बीजेडी प्रमुख नवीन पटनायक की सहमति सामने भी आ चुकी है.

पीएम मोदी- शाह के गृह क्षेत्र पर नजर

भारतीय जनता पार्टी को इस साल गुजरात में होने जा रहे विधानसभा चुनाव में भी इस बड़े फैसले का बड़ा लाभ मिल सकता है. गुजरात में कई सीटों पर आदिवासी मतदाता निर्णायक भूमिका निभाते हैं. अगर वे एक साथ किसी पार्टी के साथ आ जाएं तो प्रदेश की सत्ता तय कर सकते हैं. दशकों से बीजेपी के गढ़ और प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और गृहमंत्री अमित शाह के गृह क्षेत्र गुजरात में आदिवासियों की वोट की ताकत पर कांग्रेस और आम आदमी पार्टी भी पूरा जोर लगा रही है.

गुजरात में 14.8 फीसदी आदिवासी वोट

साल 2017 में कांग्रेस ने बीजेपी को काफी नजदीकी टक्कर दी थी. कांग्रेस ने अपने परंपरागत आदिवासी वोटरों पर फिर से कब्जा करने की कोशिश की थी. गुजरात की कुल आबादी में आदिवासियों की करीब 14.8 फीसदी हिस्सेदारी है. वहीं, कुल 27 सीटें अनूसूचित जनजाति के लिए आरक्षित हैं. 2017 के चुनाव में इनमें आधी सीटों पर भी कमल नहीं खिल पाया था. उत्तर में अंबाजी से दक्षिण में अंबेरगांव तक फैले आदिवासी बेल्ट में द्रौपदी मुर्मू को सर्वोच्च पद पर पहुंचाने का संदेश बीजेपी के लिए संजीवनी जैसा हो सकता है. इस बार बीजेपी की निगाह में गुजरात की जीत बेहद अहम है.