पश्चिम बंगाल विधानसभा चुनाव की मतगणना के रुझानों में भारतीय जनता पार्टी की बढ़त ने सियासी माहौल को पूरी तरह बदल दिया है। कोलकाता में पार्टी मुख्यालय के बाहर बीजेपी कार्यकर्ताओं ने जमकर जश्न मनाया, प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की तस्वीरें लहराई गईं, ‘जय श्री राम’ के नारे लगाए गए और नेता प्रतिपक्ष शुभेंदु अधिकारी के समर्थन में आवाज बुलंद की। वहीं, दूसरी ओर तृणमूल कांग्रेस की स्थिति बेहद कमजोर नजर आई, और पार्टी 15 साल बाद सत्ता से बाहर होती दिख रही है। आइए जानते हैं वे 5 बड़े कारण, जिनकी वजह से ममता बनर्जी सत्ता में वापसी से चूकती नजर आईं।
- कानून व्यवस्था के मुद्दे पर नाकामी
राज्य में कानून-व्यवस्था लंबे समय से एक बड़ा चुनावी मुद्दा रहा। विपक्ष ने लगातार आरोप लगाया कि कई इलाकों में हिंसा, राजनीतिक झड़पें और अपराध की घटनाएं बढ़ी हैं। आरजी कर मेडिकल कॉलेज में ‘रेप और मर्डर’ की घटना के बाद लोगों के सब्र का बांध टूट गया। आम लोगों के बीच लगातार सुरक्षा को लेकर चिंता देखने को मिली। बीजेपी ने इस मुद्दे को जोर-शोर से उठाया और राज्य प्रशासन पर भेदभाव करने के आरोप लगाए। चुनावी हिंसा और स्थानीय स्तर पर बढ़ते तनाव ने भी कई इलाकों में मतदाताओं को प्रभावित किया और ममता सरकार लोगों में कानून व्यवस्था को लेकर भरोसा जगा पाने में नाकाम रही। - भ्रष्टाचार के मुद्दे पर जनता की नाराजगी
भ्रष्टाचार के आरोपों ने भी TMC की छवि को नुकसान पहुंचाया। कई सरकारी योजनाओं और भर्ती प्रक्रियाओं को लेकर सवाल उठे, जिससे आम जनता में असंतोष बढ़ा। विपक्ष ने इन मुद्दों को चुनावी मंच पर प्रमुखता से उठाया और सरकार को घेरने में कामयाब रही। बीजेपी ने लोगों को यह यकीन दिला दिया कि राज्य सरकार में हो रही भर्तियों से लेकर ठेके-टेंडर तक में पारदर्शिता की कमी है और जिम्मेदार लोगों पर सख्त कार्रवाई नहीं हो रही। अमित शाह ने अपनी चुनावी रैलियों में बार-बार ‘सिंडिकेट राज’ को खत्म करने का जिक्र किया और रुझान बता रहे हैं कि जनता ने इसे हाथों-हाथ लिया। - घुसपैठियों के प्रति नरम होने का आरोप
बीजेपी ने तृणमूल कांग्रेस पर हर रैली में आरोप लगाया कि वह घुसपैठ के मुद्दे पर सख्ती नहीं दिखा रही। सीमावर्ती इलाकों में यह मुद्दा काफी प्रभावी रहा। पार्टी ने इसे राष्ट्रीय सुरक्षा और स्थानीय संसाधनों से जोड़ा, जिससे लोगों के बीच इस मुद्दे पर चर्चा तेज हो गई। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और गृहमंत्री अमित शाह सहित बीजेपी के सभी बड़े नेता जनता यह भरोसा दिलाने में कामयाब रहे कि अगर सूबे में बीजेपी की सरकार बनती है तो घुसपैठियों को राज्य से बाहर ‘फेंक’ दिया जाएगा। वहीं, TMC इस आरोप का प्रभावी जवाब देने में कमजोर नजर आई और जनता पर असर छोड़ने में नाकाम रही। - मुस्लिम तुष्टिकरण के आरोपों की काट न होना
ममता बनर्जी के पिछले 15 साल के शासनकाल के दौरान TMC पर मुस्लिम तुष्टिकरण के आरोप भी जमकर लगे। बीजेपी लगातार इस मुद्दे को उठाती रही और कहती रही कि सरकार एक वर्ग विशेष को प्राथमिकता दे रही है। यह आरोप संदेशखाली जैसे उन इलाकों में असरदार रहा, जहां अपराधों में लिप्त होने के बावजूद शाहजहां शेख जैसे मुस्लिम अपराधियों पर सख्त कार्रवाई नहीं हुई। बीजेपी के इन आरोपों का मजबूत तरीके से जवाब देने में टीएमसी सफल नहीं रही, जिससे विपक्ष को अपने पक्ष में माहौल बनाने का मौका मिला। - 15 साल का एंटी-इन्कंबैंसी फैक्टर
लगातार 15 साल तक सत्ता में रहने के बाद एंटी-इन्कंबैंसी फैक्टर भी तृणमूल कांग्रेस के कमजोर प्रदर्शन का बड़ा कारण बना। लंबे समय तक एक ही सरकार रहने से और तमाम मुद्दों पर कमजोर प्रदर्शन की वजह से लोगों में बदलाव की भावना तेज होने लगी। कई जगहों पर स्थानीय मुद्दों और विकास कार्यों को लेकर भी जमकर असंतोष देखने को मिला। बीजेपी ने इस भावना को खूब भुनाया और खुद को एक मजबूत विकल्प के रूप में पेश किया। इससे मतदाताओं का झुकाव धीरे-धीरे बदलाव की ओर और अंतत: बीजेपी की ओर बढ़ता गया।
बीजेपी की आक्रामक रणनीति ने किया ‘खेला’
पश्चिम बंगाल के चुनावी रुझानों ने यह साफ कर दिया है कि इस बार मुकाबला पूरी तरह बदल गया है। बीजेपी की आक्रामक रणनीति और TMC के खिलाफ बने माहौल ने बड़ा असर डाला। कानून-व्यवस्था, भ्रष्टाचार, घुसपैठ, तुष्टिकरण और एंटी-इन्कंबैंसी जैसे मुद्दों ने मिलकर चुनावी नतीजों की दिशा तय कर दी। हालांकि अंतिम नतीजे अभी थोड़ी दूर हैं, लेकिन रुझानों से यह संकेत जरूर मिल रहा है कि बंगाल की राजनीति एक नए दौर में प्रवेश करने जा रही है। अब सूबे में बीजेपी की पहली सरकार का बनना करीब-करीब तय हो गया है।

