12 और 13 सितंबर को दिल्ली के भारत मंडपम में BRICS देशों का अहम सम्मेलन आयोजित होने जा रहा है। रूस के राष्ट्रपति व्लादिमीर पुतिन समेत कई सदस्य देशों के राष्ट्राध्यक्षों के दिल्ली पहुंचने की संभावना है, जबकि चीन के राष्ट्रपति शी जिनपिंग की भारत यात्रा को लेकर अभी स्थिति स्पष्ट नहीं है। अगर जिनपिंग भारत आते हैं, तो करीब सात साल बाद यह उनकी पहली भारत यात्रा होगी। ऐसे में दिल्ली में होने वाला यह BRICS शिखर सम्मेलन खास महत्व रखता है। इस दौरान BRICS के बढ़ते प्रभाव, इसके कामकाज और वैश्विक अर्थव्यवस्था में इसकी भूमिका के साथ-साथ भारत के लिए इस सम्मेलन से जुड़े अहम हितों पर भी दुनिया की नजर रहेगी।
BRICS है क्या, क्यों हुआ इसका गठन
BRICS शब्द का इस्तेमाल पहली बार 2001 में अर्थशास्त्री जिम ओ’नील ने ब्राजील, रूस, भारत और चीन के लिए किया था। 2009 में रूस में पहला औपचारिक BRICS सम्मेलन हुआ और 2010 में दक्षिण अफ्रीका के जुड़ने के बाद यह समूह BRICS बना। यह किसी संधि या स्थायी सचिवालय वाला संगठन नहीं, बल्कि सहमति के आधार पर काम करने वाला समूह है, जिसकी अध्यक्षता हर साल एक सदस्य देश करता है। 2023 के विस्तार के बाद मिस्र, इथियोपिया, ईरान, सऊदी अरब और UAE को शामिल किया गया, जबकि 2024 में इंडोनेशिया भी सदस्य बना। आज BRICS में 11 पूर्ण सदस्य हैं और वैश्विक अर्थव्यवस्था व आबादी में इसकी बड़ी हिस्सेदारी है।
आबादी और अर्थव्यवस्था दोनों में दबदबा
BRICS के 11 सदस्य देश—ब्राजील, रूस, भारत, चीन, दक्षिण अफ्रीका, मिस्र, इथियोपिया, ईरान, सऊदी अरब, UAE और इंडोनेशिया—वैश्विक अर्थव्यवस्था और आबादी में बड़ा योगदान रखते हैं। भारत सरकार के मुताबिक, इन देशों में दुनिया की करीब 49.5% आबादी रहती है, यानी लगभग हर दूसरा व्यक्ति BRICS देशों से जुड़ा है। वहीं PPP के आधार पर वैश्विक GDP में BRICS की हिस्सेदारी करीब 40% है, जो IMF के 2025 अनुमानों में 40.7% तक पहुंचने का अनुमान है। बाजार विनिमय दर के हिसाब से भी इसकी हिस्सेदारी करीब 28-29% है। ऐसे में आबादी और आर्थिक ताकत के लिहाज से BRICS दुनिया के सबसे प्रभावशाली समूहों में शामिल हो चुका है।
आर्थिक ताकत और डॉलर से दूरी की कोशिश
BRICS का प्रमुख उद्देश्य वैश्विक वित्तीय व्यवस्था में पश्चिमी देशों के प्रभाव का संतुलन बनाना और विकासशील देशों के लिए वैकल्पिक मंच तैयार करना है। इसी दिशा में समूह ने विश्व बैंक और IMF की तर्ज पर न्यू डेवलपमेंट बैंक (NDB) और कंटीजेंट रिजर्व अरेंजमेंट (CRA) की स्थापना की। NDB ने 2016 से अब तक करीब 32 अरब डॉलर के 96 विकास परियोजनाओं को मंजूरी दी है। हालांकि, इसका आकार अभी भी विश्व बैंक की तुलना में पांच गुना से अधिक छोटा है।
डॉलर पर निर्भरता घटाना
BRICS देश आपसी कारोबार में डॉलर पर निर्भरता कम करने और स्थानीय मुद्राओं में लेन-देन बढ़ाने की दिशा में जोर दे रहे हैं। ब्राजील के राष्ट्रपति लूला साझा BRICS करेंसी की पैरवी कर चुके हैं, हालांकि विशेषज्ञ इसे फिलहाल मुश्किल लक्ष्य मानते हैं। वैश्विक व्यापार में डॉलर की मजबूत पकड़ और साझा मुद्रा के लिए जरूरी बैंकिंग व वित्तीय एकीकरण की कमी बड़ी चुनौतियां हैं। BRICS की इस पहल से अमेरिका में भी चिंता बढ़ी है। डोनाल्ड ट्रंप ने चेतावनी दी है कि डॉलर की भूमिका कमजोर करने की कोशिश करने वाले BRICS देशों पर 100% तक टैरिफ लगाया जा सकता है।
ब्रिक्स के भीतर की दरारें
BRICS के विस्तार के साथ इसकी आंतरिक चुनौतियां भी बढ़ी हैं। भारत और चीन के बीच सीमा विवाद और ग्लोबल साउथ में नेतृत्व को लेकर प्रतिस्पर्धा के चलते दोनों देशों के बीच मतभेद बने हुए हैं, जिससे भारत समूह के विस्तार को लेकर सतर्क रहा है। रूस-यूक्रेन युद्ध ने भी BRICS के भीतर अलग-अलग रुख सामने ला दिए हैं। वहीं, सऊदी अरब-ईरान और मिस्र-इथियोपिया जैसे क्षेत्रीय विवाद भी अब समूह के सामने हैं। पश्चिमी देशों ने लंबे समय तक BRICS को ज्यादा गंभीरता से नहीं लिया, लेकिन कुछ यूरोपीय नीति-निर्माताओं का मानना है कि पश्चिम के प्रति बढ़ती नाराजगी को नजरअंदाज नहीं किया जा सकता, खासकर विकासशील और निम्न-आय वाले देशों की जरूरतों पर लंबे समय से पर्याप्त ध्यान न दिए जाने के कारण।
अब बात दिल्ली समिट की-12–13 सितंबर
भारत इस बार चौथी बार BRICS की अध्यक्षता कर रहा है। दिल्ली के भारत मंडपम में होने वाले 18वें BRICS शिखर सम्मेलन की थीम ‘बिल्डिंग फॉर रेजिलिएंस, इनोवेशन, को-ऑपरेशन एंड सस्टेनबिलिटी’ रखी गई है। भारत की अध्यक्षता में देश के 25 से अधिक शहरों में अब तक 350 के करीब बैठकें आयोजित की जा चुकी हैं, जिससे सम्मेलन से पहले व्यापक स्तर पर तैयारियां पूरी की गई हैं।
सबसे बड़ा सवाल
BRICS समिट में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और चीन के राष्ट्रपति शी जिनपिंग के बीच द्विपक्षीय मुलाकात होती है या नहीं, इस पर सबकी नजरें टिकी हैं। अगर दोनों नेताओं की बैठक होती है, तो यह सम्मेलन की सबसे अहम कूटनीतिक घटनाओं में से एक होगी, खासकर LAC पर तनाव कम करने की कोशिशों के बीच। भारत के लिए यह समिट केवल मेजबानी का अवसर नहीं, बल्कि चीन और रूस के साथ संतुलन साधने के साथ अमेरिका के साथ अपने अहम रिश्तों को बनाए रखने की चुनौती भी है। BRICS के विस्तार को लेकर भारत पहले से सतर्क रहा है, क्योंकि चीन के करीबी नए सदस्यों से समूह में बीजिंग का प्रभाव बढ़ने की आशंका रहती है।
मिडिल ईस्ट में अमेरिका और ईरान के बीच बढ़ते तनाव ने भारत समेत कई देशों के लिए कूटनीतिक चुनौती बढ़ा दी है। भारत, ब्राजील और दक्षिण अफ्रीका जैसे देशों के अमेरिका के साथ मजबूत संबंध हैं, लेकिन वे रूस और चीन के साथ भी रणनीतिक रिश्ते बनाए हुए हैं। ऐसे में भारत के सामने एक ओर रूस से तेल खरीदने और चीन के साथ BRICS मंच साझा करने की जरूरत है, तो दूसरी ओर अमेरिका की टैरिफ संबंधी चेतावनियों से निपटने की चुनौती है। यही संतुलन साधना भारत की विदेश नीति के लिए अहम परीक्षा बन गया है।
पश्चिम-विरोधी गुट’ की छवि से दूर रहना भारत की चुनौती
BRICS की अध्यक्षता के दौरान भारत का जोर समूह को पश्चिम-विरोधी मंच की छवि से दूर रखते हुए व्यापार, तकनीक और जलवायु वित्त जैसे ग्लोबल साउथ के व्यावहारिक मुद्दों पर रखने का होगा। साथ ही भारत रूस और अमेरिका दोनों के साथ संतुलित रिश्ते बनाए रखने की कोशिश करेगा। शी जिनपिंग की संभावित भारत यात्रा से भारत-चीन संबंधों को भी नई दिशा मिलने की उम्मीद है। वहीं, BRICS में आगे और देशों के जुड़ने की संभावना के बीच सबसे बड़ी चुनौती अलग-अलग हितों वाले सदस्यों के बीच सहमति बनाना होगी। दिल्ली समिट में भारत की असली परीक्षा इसी मोर्चे पर होगी।

