पश्चिम बंगाल में बीजेपी की जीत को भारतीय राजनीति का बड़ा बदलाव माना जा रहा है. ये दिखाता है कि बीजेपी अब हिंदी पट्टी से आगे बढ़ चुकी है, उसने हिंदुत्व और कल्याणकारी योजनाओं के जरिए अपनी पैठ बनाई. विपक्ष के लिए यह गहरी चिंता का विषय है, क्योंकि उनके वोटों का बिखराव बीजेपी की जीत का मुख्य कारण रहा.
पश्चिम बंगाल में बीजेपी की जीत को सिर्फ सत्ता परिवर्तन नहीं, बल्कि भारतीय राजनीति के बड़े बदलाव के तौर पर देखा जा रहा है. जिस बंगाल को कभी बीजेपी के लिए सबसे कठिन राजनीतिक जमीन माना जाता था, वहां जीत के बाद पार्टी का आत्मविश्वास नई ऊंचाई पर है. लेकिन दूसरी तरफ विपक्ष के सामने सबसे बड़ा सवाल यह है कि आखिर बीजेपी को रोका कैसे जाए? क्योंकि बंगाल के नतीजों ने विपक्ष की एकता, नेतृत्व और रणनीति तीनों पर बड़े सवाल खड़े कर दिए हैं.
बंगाल में बीजेपी की जीत ने यह साफ कर दिया है कि अब पार्टी सिर्फ हिंदी पट्टी तक सीमित नहीं रही. बीजेपी ने बंगाली अस्मिता बनाम बाहरी की राजनीति को हिंदुत्व और वेलफेयर के बड़े नैरेटिव से काउंटर किया. मुफ्त योजनाएं, मजबूत संगठन और हिंदुत्व की भावनात्मक राजनीति इस तिकड़ी ने बीजेपी को बंगाल में ऐतिहासिक बढ़त दिलाई
भाषा और क्षेत्रीय पहचान के ऊपर एक राजनीति
सबसे बड़ा संदेश यह गया कि भाषा और क्षेत्रीय पहचान से ऊपर भी एक राजनीतिक पहचान तैयार की जा सकती है.यानी जिस तरह बंगाल में हिंदुत्व ने अपनी जगह बनाई, उसी तरह दक्षिण भारत की राजनीति को लेकर भी बीजेपी का आत्मविश्वास बढ़ा है. उस आत्मविश्वास के जवाब में अब विपक्ष ममता बनर्जी के साथ खड़ा होता दिख रहा है. राहुल गांधी ने उनसे बात कर ‘वोट चोरी’ का आरोप उठाया, वहीं अखिलेश यादव खुद कोलकाता पहुंचकर ममता से मिले और कहा कि दीदी, आप हारी नहीं हैं.
लेकिन पश्चिम बंगाल की जमीनी हकीकत वोट प्रतिशत में साफ दिखाई देती है. बीजेपी को 45.84% वोट मिले, जबकि टीएमसी को 40.80%. CPM को 4.45%, CPI- RSP समेत अन्य वाम दलों को करीब 1% और कांग्रेस को 2.97% वोट मिले. यानी पूरे विपक्ष का वोट शेयर जोड़ दें तो आंकड़ा 48.66% बैठता है, जो बीजेपी के वोट शेयर से ज्यादा है. यानी बीजेपी जितने अंतर से आगे निकली, लगभग उतना ही वोट टीएमसी से अलग बाकी विपक्षी दलों के खाते में चला गया. यही इस चुनाव का सबसे बड़ा राजनीतिक संदेश भी है. विपक्ष की हार सिर्फ़ जनाधार की नहीं, बल्कि बिखराव की भी कहानी है.
‘वोट बंटवारे’ बनाम ‘वोट चोरी’ की राजनीति’
INDIA गठबंधन खुद ‘एकता में अनेकता’ का प्रतीक है. कई राज्यों में इसके सहयोगी दल एक-दूसरे के खिलाफ चुनाव लड़ते हैं. ऐसे में विपक्ष अब ‘वोट बंटवारे’ बनाम ‘वोट चोरी’ की राजनीतिक लाइन पर खड़ा दिख रहा है और यही नैरेटिव आगे भी चलाया जाएगा कि ‘जहां-जहां SIR हुआ, वहां-वहां विपक्ष हारा. खासकर उन राज्यों में जहां बीजेपी पहले से मजबूत संगठनात्मक आधार रखती है.
लेकिन पश्चिम बंगाल का गणित विपक्षी दलों के लिए एक राजनीतिक अलार्म भी है. आने वाले चुनावों में यूपी, गुजरात, पंजाब जैसे राज्यों में विपक्षी दलों को आपसी फूट से ऊपर उठकर सोचना होगा. क्योंकि अगर विपक्षी वोट इसी तरह अलग-अलग खेमों में बंटता रहा, तो कई राज्यों में बीजेपी को सीधा फायदा मिलता रहेगा भले ही कुल विपक्षी वोट प्रतिशत उससे ज्यादा क्यों न हो.
बंगाल के नतीजों ने विपक्ष की सबसे बड़ी कमजोरी भी उजागर कर दी. बीजेपी विरोधी वोट एकजुट नहीं हो पाए. कांग्रेस, वाम दल और क्षेत्रीय पार्टियां अलग-अलग लड़ती रहीं और बीजेपी इसका फायदा उठाने में सफल रही. राष्ट्रीय स्तर पर विपक्ष एकता की बात करता है, लेकिन राज्यों में वही दल एक-दूसरे के खिलाफ चुनाव लड़ते हैं. यही वजह है कि बीजेपी का वोट लगातार मजबूत हो रहा है, जबकि विपक्षी वोट बिखर रहा है.
ये विपक्ष के लिए सिर्फ हार नहीं
अब विपक्ष के सामने सबसे बड़ी चुनौती सिर्फ गठबंधन बनाने की नहीं, बल्कि साझा नेतृत्व और साझा नैरेटिव तैयार करने की है. बंगाल की जीत ने बीजेपी को यह भरोसा दे दिया है कि अब देश का कोई भूगोल उसके लिए राजनीतिक रूप से अछूत नहीं बचा. लेकिन विपक्ष के लिए यह सिर्फ एक हार नहीं, बल्कि चेतावनी है. अगर विपक्ष ने समय रहते साझा रणनीति, साझा नेतृत्व और बीजेपी के मुकाबले मजबूत वैचारिक नैरेटिव तैयार नहीं किया, तो आने वाले समय में बीजेपी के लिए नए दरवाजे खुलते जाएंगे और विपक्ष के लिए राजनीति की खिड़कियां भी बंद होती जाएंगी.

