आज है जगन्नाथ यात्रा, जानें पूरी परम्परा और पौराणिक महत्व

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हिन्दू धर्म में भगवन जगन्नाथ एक विशेष महत्व रखते है और उनकी रथ यात्रा भी बड़े धूम धाम से निकाली जाती है . प्रभु जगन्नाथ की रथ यात्रा का शुभारंभ हो चुका है. रथयात्रा में भगवान जगन्नाथ, उनके बड़े भाई बलराम और बहन सुभद्रा का रथ भी निकाला जाता है. हिंदू धर्म में जगन्नाथ धाम की बहुत महिमा बताई गई है. जगन्नाथ धाम को धरती पर वैकुंठ भी कहा गया है. हर साल देश-विदेश से लाखों लोग इस यात्रा में भाग लेने आते थे. लेकिन इस साल कोरोना वायरस (Corona virus) के चलते धारा-144 लाग कर दी गई है. इस कारण केवल कोरोना के टीके लगवाए हुए और पूरे नियमों का पालन करने वाली पुजारी और पुरोहित इस यात्रा में हिस्सा बन पाए हैं. आइए जानते हैं जगन्नाथ रथ यात्रा का धार्मिक व पौराणिक महत्व और ये यात्रा क्यों निकाली जाती है

उड़ीसा के समुंद्र किनारे स्थिति पुरी धाम के जगन्नाथ मंदिर का उल्लेख स्कन्द पुराण में भी पढ़ने को मिल जाएगा. मान्यता अनुसार इस धाम में भगवान जगन्नाथ रूपी श्रीकृष्ण अपनी बहन सुभद्रा और बड़े भाई बलभद्र या बलराम के साथ इसी मंदिर में विराजमान हैं. इस धाम में इन तीनों की काष्ठ से निर्मित प्रतिमा स्थापित है, जिन्हें परंपरा अनुसार प्रत्येक 12 वर्ष में बदल दिया जाता है. हालांकि हर वर्ष के आषाढ़ मास के शुक्ल पक्ष की द्वितीया तिथि को भगवान जगन्नाथ की रथ यात्रा निकाले जाने का भी विधान है. इस दौरान भगवान अपने रथ पर सवार होकर, सारा नगर भ्रमण करते हैं और भक्तों के बीच आकर उन्हें दर्शन देते हैं. इस यात्रा में तीन रथ तैयार किये जाते हैं, जिसमें से सबसे आगे भगवान के बड़े भाई बलराम जी का रथ होता है जिसे तालध्वज कहा जाता है, और उनके रथ का रंग लाल और हरा होता है. उसके पीछे भगवान की बहन सुभद्रा जी का रथ जिसे दर्पदलन या पद्म रथ कहा जाता है और इस रथ का रंग काले या नीले और लाल रंग का होता है. फिर अंत में सबसे पीछे भगवान श्रीकृष्ण के अवतार श्री जगन्नाथ जी का रथ चलता होता है और इस रथ को नंदी घोष के नाम से जाना जाता है, जो पीले रंग का होता है .

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