बेतिया राज की जमीन का मामला अब केवल राजस्व विभाग की फाइल नहीं है। यह बिहार सरकार की नीयत, नीति और प्रशासनिक संवेदनशीलता की परीक्षा बन चुका है।
2024 में बेतिया राज की संपत्तियों को राज्य में निहित करने का कानून बना और अब 2026 में इस प्रक्रिया को तेज किया जा रहा है। जुलाई में छह जिलों में करीब 7,272 एकड़ निहित संपत्ति का विवरण भी सार्वजनिक किया गया।
सरकारी जमीन को अतिक्रमण से मुक्त कराना जरूरी है। अगर भूमाफिया ने बेतिया राज की जमीन पर कब्जा किया है तो उसके खिलाफ कठोर कार्रवाई होनी ही चाहिए। लेकिन असली सवाल उन परिवारों का है जो दशकों से वहां रह रहे हैं और जिनके पास जमीन से जुड़े पुराने दस्तावेज भी हैं।
@भूमाफिया और दशकों से बसे गरीब परिवार को एक ही श्रेणी में रखना न्याय नहीं होगा।
सरकार को यह सुनिश्चित करना होगा कि हर दावेदार को निष्पक्ष सुनवाई मिले, पुराने दस्तावेजों की सही जांच हो और केवल रिकॉर्ड में नाम होने के आधार पर किसी का घर उजाड़ने की स्थिति न बने।
दूसरा @बड़ा सवाल आंकड़ों का है। सर्वे में करीब 24,477 एकड़ जमीन सामने आने की बात कही गई है, जबकि जुलाई में करीब 7,272 एकड़ निहित जमीन का विवरण जारी हुआ। सरकार को स्पष्ट करना चाहिए कि बाकी जमीन की स्थिति क्या है और उसके निहितीकरण की प्रक्रिया कब पूरी होगी।
लेकिन सबसे बड़ा सवाल है—सरकार के कब्जे में आने वाली जमीन का इस्तेमाल किसके लिए होगा?
क्या वहां स्कूल, अस्पताल, विश्वविद्यालय, उद्योग और दूसरी जनहितकारी परियोजनाएं बनेंगी? क्या पुराने कब्जाधारियों को कानूनी अधिकार देकर विवाद समाप्त किया जाएगा? या भविष्य में इस जमीन के व्यावसायिक इस्तेमाल के रास्ते खुलेंगे?
यहीं से सरकार की असली परीक्षा शुरू होती है।
सरकार के पास एक ऐतिहासिक अवसर है—बेतिया राज की दशकों पुरानी जमीन समस्या को पारदर्शी और न्यायपूर्ण तरीके से खत्म करने का।
भूमाफिया पर कार्रवाई हो, वैध दावेदारों को अधिकार मिले, गरीब परिवारों के साथ संवेदनशीलता बरती जाए और सरकारी जमीन के भविष्य का पूरा खाका जनता के सामने रखा जाए।
तभी यह अभियान भूमि सुधार कहलाएगा।
वरना सवाल उठेगा कि वर्षों से विवादित जमीन को सरकार के कब्जे में लेने के बाद क्या बिहार में जमीन का एक नया खेल शुरू होने जा रहा है?
इस सवाल का जवाब चंपारण ही नहीं, पूरी बिहार की राजनीति के लिए महत्वपूर्ण होगा।

