ईरान के साथ जंग में अमेरिका क्या हासिल करना चाहता है इसे लेकर अभी तक अनिश्चितता बनी हुई है. डोनाल्ड ट्रंप ने 21 अप्रैल को निर्धारित समय सीमा समाप्त होने से कुछ ही घंटे पहले ईरान के साथ एकतरफा रूप से सीजफायर की समय सीमा बढ़ा दी. इस महीने के भीतर ऐसा दूसरी बार हुआ है जब ट्रंप ने सीजफायर की घोषणा की है. इससे पहले उन्होंने 7 अप्रैल 2025 को ईरान की ओर से होर्मुज खोलने की समय सीमा खत्म होने से केवल 90 मिनट पहले 15 दिनों के सीजफायर की घोषणा की थी.
जल्द से जल्द युद्ध का अंत चाहते ट्रंप
अमेरिका की ओर से सीजफायर की घोषणा के पीछे चाहे जो भी तर्क दिए जा रहे हों, लेकिन एक बात स्पष्ट है कि ट्रंप जल्द से जल्द इस जंग का अंत चाहते हैं और वो भी अपनी शर्तों पर. ट्रंप की इस सोच के बाद ये सवाल उठने लगे हैं कि क्या अमेरिका को इस बात का एहसास हो गया है कि ईरान को सैन्य रूप से हराना मुश्किल है. क्या इसकी वजह ये है कि अमेरिका के पास ईरान के साथ लंबे समय तक चलने वाले युद्ध में लड़ने के लिए पर्याप्त संसाधन नहीं हैं? इस सवालों के जवाब के लिए दो अहम मुद्दों अमेरिका और इजरायल की युद्ध क्षमता और आगे के सैन्य अभियानों के विकल्प के बारे में जानना जरूरी है.
मौजूदा हालात में, अगर ईरान बिना शर्त स्ट्रेट ऑफ होर्मुज खोलने पर सहमत हो जाता है तो अमेरिका इसे तुरंत अपनी जीत मानकर युद्ध से अपना हाथ खींच लेगा. अमेरिका को लंबे समय तक चलने वाले युद्ध के लिए जरूरी हथियार जुटाना मुश्किल हो रहा है. यूएस अभी बस एक मौका खोज रहा है, जिससे वह अपनी जीत की घोषणा के साथ जंग से बाहर निकल सके.
खत्म हो रहा यूएस के हथियारों का जखीरा
ईरान में अमेरिका जिस तरह का युद्ध लड़ रहा है, उसके लिए मुख्य रूप से दो प्रकार के हथियारों की आवश्यकता होती है. पहला ऐसा हथियार, जिससे दूर से हमला किया जा सके, जिसमें एयरक्राफ्ट, शिप, आर्टिलरी और मिसाइल सिस्टम शामिल है. 7 अप्रैल को सीजफायर लागू होने से पहले ही अमेरिका ने शुरुआती 39 दिनों में लगभग 13,000 लक्ष्यों को निशाना बनाया था. दूसरी कैटेगरी एयर डिफेंस सिस्टम की है, जिसमें पैट्रियट मिसाइलें, थाड डिफेंस सिस्टम शामिल हैं.
सीएनएन की रिपोर्ट के मुताबिक ईरान के साथ जंग में अमेरिका के प्रमुख मिसाइलों का आधा भंडार खत्म हो चुका है. इन प्रणालियों को बदलने में तीन से पांच साल लगेंगे, भले ही उत्पादन बढ़ाने के लिए पहले से ही कॉन्ट्रैक्ट पर साइन हो चुके हों. अमेरिका ने प्रिसिजन स्ट्राइक मिसाइलों का 45% हिस्सा, THAAD इंटरसेप्टर का 50%, पैट्रियट एयर डिफेंस सिस्टम का करीब 50%, टोमाहॉक मिसाइल भंडार का लगभग 30% हिस्सा भी इस्तेमाल कर लिया है. लंबी दूरी की JASSM और SM-3/SM-6 मिसाइलों का 20 फीसदी यूएस ने इस्तेमाल कर लिया है.
जमीनी हमले के लिए गोला-बारूद का इस्तेमाल
अमेरिका ने जमीनी हमले को अंजाम देने के लिए जिन हथियारों का इस्तेमाल किया है उसमें सबसे पहला टॉमहॉक लैंड अटैक मिसाइल (TLM) है. यह समंदर से जमीनी टारगेट पर दागी जाने वाली लंबी दूरी की मिसाइल है. रिपोर्ट के मुताबिक अमेरिकी नौसेना ने ईरान युद्ध में अब तक 1,000 से अधिक टीएलएम का इस्तेमाल किया है. 2026 में टीएलएम का निर्धारित उत्पादन आपूर्ति आवश्यकताओं से काफी कम है. जापान को कथित तौर पर बताया गया है कि ईरान युद्ध के कारण उसकी 400 टॉमहॉक मिसाइलों की डिलीवरी में देरी हो सकती है.
अमेरिका और इजरायल के सैन्य अभियान की सफलता न केवल ईरान की सैन्य और आर्थिक क्षमताओं को तबाह करने पर निर्भर करती है, बल्कि ईरान द्वारा दागी जाने वाली मिसाइलों को रोकने और उसे नष्ट करने की क्षमता पर भी निर्भर करती है. पहले ये उम्मीद की जा रही थी कि ईरान से बैलिस्टिक मिसाइल के खतरे को दो चरणों में बेअसर कर दिया जाएगा. इनमें सबसे पहले पैट्रियट मिसाइल डिफेंस सिस्टम का नाम आता है, जिसका इस्तेमाल विमानों, बैलिस्टिक मिसाइलों और क्रूज मिसाइलों को रोकने और निशाना बनाने के लिए किया जाता है.
ईरानी मिसाइल को तबाह करने में हो रहे खूब खर्च
युद्ध में इस्तेमाल किया जा रहा एडवांस्ड रॉकेट एंड गाइडेंस टेक्नोलॉजी से लैस पैट्रियट एडवांस्ड कैपेबिलिटी-3 (PAC-3) मिसाइल है. ईरान से आने वाली किसी भी मिसाइल के लिए दो से चार इंटरसेप्टर दागे जाते हैं. युद्ध बढ़ने के साथ-साथ ईरान ने हाइपरसोनिक ग्लाइड तकनीक वाली एडवांस्ड मिसाइलों के साथ-साथ क्लस्टर बमों का भी इस्तेमाल किया है, जिसका मतलब है कि आने वाली मिसाइलों को रोकने के लिए सामान्य से अधिक संख्या में पैट्रियट मिसाइलें दागनी पड़ीं. इसका नतीजा ये हुआ कि खाड़ी में स्थित अधिकांश अमेरिकी ठिकानों (संयुक्त अरब अमीरात को छोड़कर) में इंटरसेप्टर खत्म हो गए हैं.
US में कम हो रहा हथियारों का उत्पादन
अमेरिका में हर साल इस तरह की करीब 100 मिसाइलों का ही उत्पादन होता है. युद्ध जारी रखने के लिए अमेरिका के सामने ये भी बड़ी चुनौती है. यह भी बताया जा रहा है कि अमेरिका अपने भंडार को बढ़ाने के लिए जापान और साउथ कोरिया से कुछ पैट्रियट मिसाइलों को ट्रांसफर करने पर विचार कर रहा है, जिससे इंडो पैसिफिक क्षेत्र में अमेरिका के लिए नई चुनौती पैदा हो सकती है.

