रांची की सड़कों पर हजारों प्रतियोगी छात्र कई दिनों से भर्ती परीक्षाओं में कथित अनियमितताओं और पारदर्शी जांच की मांग को लेकर आंदोलन कर रहे हैं। यह आंदोलन अब केवल एक परीक्षा का विवाद नहीं, बल्कि युवाओं के भविष्य और सरकारी भर्ती व्यवस्था पर भरोसे का सवाल बन चुका है।
दिलचस्प बात यह है कि कुछ समय पहले जब राष्ट्रीय स्तर पर परीक्षा संबंधी विवाद सामने आए थे, तब विपक्ष ने केंद्र सरकार को घेरा था। संसद से लेकर सड़क तक आंदोलन हुए, शिक्षा मंत्री के इस्तीफे की मांग उठी और छात्रों के मुद्दे को लोकतंत्र का बड़ा प्रश्न बताया गया।
अब सवाल झारखंड का है। यहां सरकार में शामिल दलों, विशेषकर कांग्रेस और उसके सहयोगियों की सक्रियता अपेक्षाकृत कम दिखाई दे रही है। इससे यह राजनीतिक प्रश्न उठ रहा है कि क्या छात्रों का मुद्दा सत्ता और विपक्ष बदलने के साथ अपना महत्व भी बदल लेता है?
राजनीति में यह धारणा लंबे समय से रही है कि विपक्ष जनता के मुद्दे उठाता है और सत्ता समाधान देती है। लेकिन जब वही दल सत्ता में आ जाए, तब उसकी कसौटी और भी कठिन हो जाती है। यदि छात्र लगातार धरने पर बैठे हों, भूख हड़ताल चल रही हो और सरकार की ओर से संवाद या ठोस समाधान की गति धीमी दिखे, तो आलोचना होना स्वाभाविक है।
हालांकि निष्पक्षता की मांग यह भी करती है कि किसी भी दल का मूल्यांकन केवल उसके विरोध प्रदर्शन से नहीं, बल्कि उसके फैसलों और समाधान की क्षमता से किया जाए। यदि सरकार निष्पक्ष जांच कराती है, दोषियों पर कार्रवाई करती है और भर्ती प्रक्रिया में सुधार लाती है, तो वही उसकी सबसे बड़ी राजनीतिक प्रतिक्रिया होगी।
यह आंदोलन एक व्यापक सवाल छोड़ रहा है—क्या भारत में छात्रों के मुद्दे सिद्धांत से तय होते हैं या सत्ता की स्थिति से? यदि किसी राज्य में विपक्ष छात्र आंदोलन का नेतृत्व करता है और दूसरे राज्य में सत्ता में आने के बाद वही दल मौन रहता है, तो उस पर राजनीतिक दोहरे मापदंड का आरोप लगना स्वाभाविक है।
युवाओं के लिए परीक्षा केवल एक परीक्षा नहीं होती; वह वर्षों की मेहनत, परिवार की उम्मीदों और भविष्य का सवाल होती है। इसलिए छात्र आंदोलनों पर राजनीतिक प्रतिक्रिया भी सत्ता और विपक्ष की सुविधा से नहीं, बल्कि समान संवेदनशीलता और जवाबदेही के आधार पर होनी चाहिए।

