Women Safety in India: भारत में महिलाओं की सुरक्षा को लेकर समय-समय पर कानूनों को और सख्त बनाया गया, लेकिन अपराधों में अपेक्षित कमी नहीं दिखी। राष्ट्रीय अपराध रिकॉर्ड ब्यूरो (NCRB) के अनुसार, 2024 में महिलाओं के खिलाफ अपराध के 4.41 लाख से अधिक मामले दर्ज हुए, जिनमें करीब 29,500 रेप के केस शामिल हैं। यानी औसतन हर दिन 1,210 महिलाओं के खिलाफ अपराध और 82 रेप के मामले दर्ज हुए। ये केवल दर्ज मामलों के आंकड़े हैं, जबकि कई घटनाएं रिपोर्ट तक नहीं हो पातीं। ऐसे में सबसे बड़ा सवाल यही है कि जब कानून मौजूद हैं, तो अपराध क्यों नहीं रुक रहे? क्या भारत में महिला सुरक्षा के लिए बने कानून पर्याप्त नहीं हैं, या फिर उनकी प्रभावी तरीके से पालना और पुलिस-प्रशासन की कार्रवाई में कमी है?
भारत में महिला सुरक्षा का कानून
अगर भारत में महिलाओं की सुरक्षा से जुड़े कानूनों की बात करें, तो कानूनी ढांचा काफी व्यापक है। 1 जुलाई 2024 से लागू भारतीय न्याय संहिता (BNS), 2023 में महिलाओं और बच्चों के खिलाफ अपराधों के लिए अलग अध्याय बनाया गया है। इसमें बलात्कार, गैंगरेप, यौन उत्पीड़न, स्टॉकिंग, एसिड अटैक समेत कई गंभीर अपराधों के लिए सख्त प्रावधान हैं। इसके अलावा घरेलू हिंसा से महिला संरक्षण अधिनियम, 2005 महिलाओं को घरेलू हिंसा से सुरक्षा प्रदान करता है, जबकि POSH Act, 2013 कार्यस्थल पर यौन उत्पीड़न की रोकथाम और पीड़ितों को न्याय दिलाने के लिए कानूनी व्यवस्था सुनिश्चित करता है।
•अनैतिक देह व्यापार (रोकथाम) अधिनियम, 1956 (Immoral Traffic (Prevention) Act, 1956) commercial sexual exploitation और human trafficking से निपटने के लिए बनाया गया प्रमुख कानून है।
भारतीय न्याय संहिता (BNS), 2023 में महिलाओं के खिलाफ अपराधों को लेकर धारा 63 से 79 तक विस्तृत प्रावधान किए गए हैं। इन धाराओं के तहत बलात्कार, यौन उत्पीड़न, स्टॉकिंग और एसिड अटैक जैसे गंभीर अपराधों के लिए सख्त सजा का प्रावधान है। इसके अलावा, धारा 69 में पहचान छिपाकर या शादी का झूठा वादा करके बनाए गए यौन संबंधों को भी एक अलग अपराध की श्रेणी में रखा गया है।
•घरेलू हिंसा से महिला संरक्षण अधिनियम, 2005 (DV Act, 2005) महिलाओं को शारीरिक, यौन, मौखिक/भावनात्मक और आर्थिक- हर तरह की घरेलू हिंसा से सुरक्षा प्रदान करता है।
•POSH Act, 2013 कार्यस्थल पर महिलाओं को यौन उत्पीड़न से सुरक्षा देने वाला प्रमुख कानून है। इसके तहत हर संस्थान में शिकायतों के निपटारे के लिए आंतरिक शिकायत समिति (Internal Complaints Committee-ICC) गठित करना अनिवार्य है, ताकि पीड़ित महिलाओं को समय पर और निष्पक्ष न्याय मिल सके।
•महिलाओं का अशोभनीय चित्रण (निषेध) अधिनियम, 1986 का उद्देश्य विज्ञापनों, प्रकाशनों, पुस्तकों, पत्रिकाओं और अन्य मीडिया माध्यमों में महिलाओं के अशोभनीय या अपमानजनक चित्रण पर रोक लगाना है। यह कानून महिलाओं की गरिमा और सम्मान की रक्षा के लिए बनाया गया है।
कानून कमजोर या फिर पुलिस का एक्शन?
सवाल यह है कि जब महिलाओं की सुरक्षा के लिए इतने सख्त कानून मौजूद हैं, तो अपराधों में कमी क्यों नहीं आ रही? कई कानूनी विशेषज्ञों का मानना है कि समस्या कानूनों की नहीं, बल्कि उनके प्रभावी क्रियान्वयन की है। निर्भया मामले में पीड़िता की ओर से पैरवी कर चुकीं सुप्रीम कोर्ट की वरिष्ठ अधिवक्ता सीमा समृद्धि कुशवाहा का कहना है कि भारत में कानून पर्याप्त मजबूत हैं, लेकिन उन्हें लागू करने में गंभीर कमी है। उनके मुताबिक, राजनीतिक, पुलिस और न्यायिक व्यवस्था में जवाबदेही और इच्छाशक्ति का अभाव सबसे बड़ी चुनौती है। उनका मानना है कि कानून का डर केवल अपराधियों में ही नहीं, बल्कि उसे लागू करने वाले अधिकारियों में भी होना चाहिए, तभी व्यवस्था प्रभावी ढंग से काम करेगी।
महिला सुरक्षा के मुद्दे पर उत्तर प्रदेश के पूर्व डीजीपी ओमप्रकाश (ओपी) सिंह की राय भी इसी दिशा में जाती है। उनका कहना है कि भारत में कानून कमजोर नहीं हैं, बल्कि चुनौती उनके प्रभावी और लगातार पालन की है। उनके अनुसार, निर्भया कांड के बाद कानूनों को और सख्त बनाया गया, लेकिन सिर्फ कड़ी सजा से अपराध नहीं रुकते। ओपी सिंह का मानना है कि एसओपी (SOP) और प्रोटोकॉल तभी कारगर होंगे, जब उनके पालन की नियमित ऑडिट, स्वतंत्र निगरानी और हर स्तर पर स्पष्ट जवाबदेही तय हो। केवल नियम बना देना पर्याप्त नहीं, बल्कि उनके उल्लंघन पर जिम्मेदारी भी तय होनी चाहिए।
दिल्ली में निर्भया कांड 2 और उससे उठते सवाल
हालिया मामलों ने भी महिला सुरक्षा के मामलों में पुलिस की कार्रवाई पर सवाल खड़े किए हैं। अगस्त 2026 में दिल्ली में एक नाबालिग से चलती बस में कथित रेप की घटना 4 अगस्त को हुई, लेकिन मामला 31 अगस्त को सार्वजनिक हुआ और उसी दिन आरोपियों की गिरफ्तारी हुई। इस देरी ने पुलिस की कार्यप्रणाली और जवाबदेही पर बहस तेज कर दी। वरिष्ठ अधिवक्ता सीमा समृद्धि कुशवाहा का कहना है कि जांच और कार्रवाई के लिए समय-सीमा तय होने के बावजूद उसके पालन में लापरवाही बरतने वाले अधिकारियों पर प्रभावी कानूनी कार्रवाई नहीं होती। उनके मुताबिक, जब तक पुलिस और जांच एजेंसियों की स्पष्ट जवाबदेही तय नहीं होगी, तब तक कानून का असर पूरी तरह दिखाई नहीं देगा।
दिल्ली रेपकांड को लेकर एडवोकेट सीमा समृद्धि कुशवाहा ने पुलिस और सुरक्षा व्यवस्था की खामियों पर सवाल उठाए हैं। उनका कहना है कि निर्भया केस के बाद बसों में पर्दे और ब्लैक फिल्म पर रोक, चेकपोस्ट पर जांच और सीसीटीवी जैसी सुरक्षा व्यवस्था के निर्देश दिए गए थे। इसके बावजूद परीचौक से दिल्ली के कश्मीरी गेट तक बस की जांच क्यों नहीं हुई और सीसीटीवी काम क्यों नहीं कर रहा था, यह गंभीर सवाल है। उन्होंने इन लापरवाहियों के लिए जिम्मेदार अधिकारियों की जवाबदेही तय करने की जरूरत पर जोर दिया।
महिला सुरक्षा की चुनौती ‘कमजोर कानून’ की नहीं
कुल मिलाकर, भारत में महिला सुरक्षा की सबसे बड़ी चुनौती कानूनों की कमी नहीं, बल्कि उनके कमजोर क्रियान्वयन और जवाबदेही के अभाव की है। निर्भया कांड के बाद कानूनों को लगातार सख्त किया गया और नए आपराधिक कानूनों में भी महिलाओं की सुरक्षा के लिए व्यापक प्रावधान किए गए। लेकिन कानून तभी असरदार होगा, जब पुलिस और प्रशासन उसे जमीन पर ईमानदारी से लागू करें। सीसीटीवी, चेकिंग और सुरक्षा प्रोटोकॉल होने के बावजूद वारदातें होना और कार्रवाई में देरी यह बताती है कि सिस्टम की जवाबदेही अब भी बड़ा सवाल है। जब तक लापरवाही के लिए जिम्मेदार अधिकारियों पर ठोस कार्रवाई नहीं होगी, तब तक सिर्फ कानून सख्त करने से महिलाओं में सुरक्षा का भरोसा कायम नहीं हो पाएगा।

