Trump Breaking Protocol

47 साल बाद प्रोटोकॉल तोड़कर ताइवानी राष्ट्रपति से बात करेंगे डोनाल्ड ट्रंप!

करीब 47 साल से अमेरिका और ताइवान के राष्ट्रपतियों के बीच सीधे बातचीत नहीं हुई. अब अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने संकेत दिया है कि वह ताइवान के राष्ट्रपति लाई चिंग-ते से बात कर सकते हैं. इस एक बयान ने वॉशिंगटन, बीजिंग और ताइपे के बीच कूटनीतिक हलचल तेज कर दी है. चीन ने इसे ‘गलत संदेश’ बताया है, जबकि ताइवान इसे अपने लिए बड़ी डिप्लोमैटिक जीत मान रहा है. सवाल है कि आखिर 1979 में ऐसा क्या हुआ था कि अमेरिकी और ताइवानी नेताओं के बीच सीधे संपर्क लगभग बंद हो गए, और अब ट्रंप इसे बदलने की कोशिश क्यों कर रहे हैं?

1979 वह साल था जब अमेरिका ने आधिकारिक तौर पर ताइवान की जगह चीन को मान्यता दे दी. उस समय अमेरिकी राष्ट्रपति जिमी कार्टर ने बीजिंग के साथ राजनयिक संबंध स्थापित किए और ‘वन चाइना पॉलिसी’ को मंजूर किया. इसका मतलब यह था कि अमेरिका चीन की उस स्थिति को मानता है जिसमें बीजिंग ताइवान को चीन का हिस्सा बताता है.

इसके बाद अमेरिका ने ताइवान के साथ औपचारिक राजनयिक रिश्ते खत्म कर दिए. यही वजह रही कि अमेरिकी राष्ट्रपति और ताइवान के राष्ट्रपति के बीच सार्वजनिक या आधिकारिक बातचीत लगभग बंद हो गई. अमेरिका ने हालांकि ताइवान से पूरी दूरी नहीं बनाई. उसी साल अमेरिकी कांग्रेस ने ताइवान रिलेशन एक्ट पास किया, जिसके जरिए अमेरिका ने ताइवान की सुरक्षा और रक्षा सहयोग जारी रखा.

यानी अमेरिका ने एक संतुलन बनाया. एक तरफ वह चीन को आधिकारिक मान्यता देता रहा, दूसरी तरफ ताइवान को सैन्य और आर्थिक मदद भी देता रहा.

यहां सबसे ज्यादा धोखा होता है. चीन कहता है कि ताइवान उसका हिस्सा है और दुनिया को इसे मानना चाहिए. इसे चीन ‘वन चाइना प्रिंसिपल’ कहता है. लेकिन अमेरिका तकनीकी रूप से चीन के इस दावे को ‘मान्यता’ नहीं देता, बल्कि सिर्फ मानता है कि चीन ऐसा दावा करता है. अमेरिका की अपनी ‘वन चाइना पॉलिसी’ है, जिसमें वह ताइवान की आजादी को खुलकर सपोर्ट भी नहीं करता और चीन के कब्जे को भी औपचारिक मंजूरी नहीं देता. यही रणनीतिक उथल-पुथल पिछले कई दशकों से अमेरिकी नीति का आधार रही है.

डोनाल्ड ट्रंप ने पहली बार यह परंपरा 2016 में तोड़ी थी. राष्ट्रपति चुनाव जीतने के बाद उन्होंने ताइवान की तत्कालीन राष्ट्रपति लाई चिंग-ते से फोन पर बात की थी. 1979 के बाद यह पहली बार था जब किसी अमेरिकी राष्ट्रपति या राष्ट्रपति-निर्वाचित नेता ने सीधे ताइवान के राष्ट्रपति से बातचीत की. उस समय चीन ने तीखी प्रतिक्रिया दी थी और इसे अमेरिकी नीति के खिलाफ बताया था.

हालांकि उस समय ट्रंप सत्ता संभालने से पहले थे, इसलिए बीजिंग ने विरोध किया. लेकिन अब स्थिति अलग है क्योंकि ट्रंप राष्ट्रपति पद पर रहते हुए ताइवान के राष्ट्रपति से बात करने का संकेत दे रहे हैं.

अभी नया विवाद क्यों खड़ा हुआ?

हाल के दिनों में ट्रंप और चीनी राष्ट्रपति शी जिनपिंग के बीच बैठक हुई थी. इसी दौरान ताइवान का मुद्दा फिर केंद्र में आ गया. रिपोर्ट्स के मुताबिक शी जिनपिंग ने ट्रंप से कहा कि ताइवान अमेरिका-चीन रिश्तों का सबसे संवेदनशील मुद्दा है और अगर इसे गलत तरीके से संभाला गया तो टकराव बढ़ सकता है.
चीन को इतनी परेशानी क्यों है?

चीन ताइवान को अपना हिस्सा मानता है और कहता है कि कोई भी विदेशी सरकार अगर ताइवान के राष्ट्रपति से आधिकारिक संपर्क करती है, तो वह ताइवान को अलग देश मानने जैसा कदम होगा. बीजिंग इसे अपनी संप्रभुता के खिलाफ मानता है.

एक्सपर्ट्स इसके पीछे 4 बड़ी वजहें बताते हैं:

चीन पर दबाव बनाने की रणनीति: ट्रंप लंबे समय से चीन के खिलाफ सख्त रुख अपनाते रहे हैं. ट्रेड, टेक्नोलॉजी और सैन्य प्रभाव के मुद्दे पर वह अक्सर बीजिंग पर दबाव बनाते रहे हैं. अब ताइवान का मुद्दा भी उसी रणनीति का हिस्सा माना जा रहा है. कई रिपोर्ट्स में कहा गया है कि ट्रंप ताइवान को चीन के खिलाफ नेगोशिएशन टूल की तरह इस्तेमाल कर रहे हैं.
इंडो-पैसिफिक में शक्ति संतुलन: अमेरिका मानता है कि चीन का बढ़ता सैन्य प्रभाव एशिया में शक्ति संतुलन बदल सकता है. ताइवान इस रणनीति में बेहद अहम है क्योंकि वह चीन के बिल्कुल पास स्थित है और अमेरिकी सहयोगी देशों जैसे जापान और फिलीपींस के लिए भी महत्वपूर्ण है.
सेमीकंडक्टर फैक्टर: ताइवान दुनिया की सबसे बड़ी चिप मैन्युफैक्चरिंग ताकतों में से एक है. ताइवान सेमीकंडक्टर मैन्युफैक्चरिंग कंपनी जैसी कंपनियां दुनिया के एडवांस्ड सेमीकंडक्टर सप्लाई का बड़ा हिस्सा बनाती हैं. अमेरिका नहीं चाहता कि चीन का प्रभाव इस इंडस्ट्री पर बढ़े.
घरेलू राजनीति: अमेरिका में चीन के खिलाफ सख्त रुख अब दोनों पार्टियों में लोकप्रिय हो चुका है. ऐसे में ट्रंप का यह कदम घरेलू राजनीति में भी उन्हें मजबूत नेता के तौर पर पेश करता है.
क्या अमेरिका अब ताइवान को देश मानने जा रहा है?

एक्सपर्ट्स का मानना है कि फिलहाल ऐसा नहीं दिखता. अमेरिका अभी भी आधिकारिक तौर पर ‘वन चाइना पॉलिसी’ पर कायम है. ट्रंप ने भी सार्वजनिक रूप से यह नहीं कहा कि अमेरिका ताइवान की आजादी को मान्यता देगा. लेकिन अगर अमेरिकी राष्ट्रपति और ताइवान के राष्ट्रपति के बीच सीधी बातचीत होती है, तो यह दशकों पुरानी डिप्लोमैटिक परंपरा को कमजोर जरूर करेगी.

इस बीच ताइवान क्या चाहता है?

ताइवान खुद को एक संप्रभु लोकतांत्रिक देश मानता है. वहां की चुनी हुई सरकार लगातार अंतरराष्ट्रीय पहचान बढ़ाने की कोशिश करती रही है. राष्ट्रपति लाई चिंग-ते ने हाल में कहा कि अगर ट्रंप उनसे बात करते हैं, तो वह चीन के बढ़ते दबाव और क्षेत्रीय शांति के मुद्दे उठाएंगे. हालांकि ताइवान आधिकारिक तौर पर यह भी कहता है कि वह मौजूदा स्थिति को बनाए रखना चाहता है और युद्ध नहीं चाहता.

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