सावन खत्म होने और त्योहारों के मौसम से पहले प्याज की बढ़ती कीमतों ने आम लोगों की चिंता बढ़ा दी है। प्याज के साथ अन्य सब्जियों के दाम बढ़ने से किचन का बजट बिगड़ रहा है। सरकार कीमतों पर लगाम लगाने के लिए बफर स्टॉक को खपत वाले राज्यों तक पहुंचा रही है और ‘कांदा एक्सप्रेस’ भी चलाई जा रही है। दरअसल, प्याज की कीमतों में तेजी मांग बढ़ने से नहीं, बल्कि पुराने स्टॉक के खत्म होने और नई बड़ी फसल आने में लग रहे समय के कारण हुई है।
उपभोक्ता मामलों के विभाग के आंकड़ों के मुताबिक, 22 अगस्त को देश में प्याज की औसत खुदरा कीमत करीब 42 रुपये प्रति किलो पहुंच गई, जो पिछले साल के मुकाबले 45% और एक महीने में 19% अधिक है। दिल्ली में प्याज के दाम 65-70 रुपये प्रति किलो तक पहुंच गए हैं, जबकि कुछ दिन पहले यही कीमत करीब 35 रुपये थी। वहीं, थोक बाजारों में भी प्याज की कीमतों में तेज उछाल देखने को मिल रहा है।
एग्रोस्पेक्ट्रम इंडिया ने कृषि और किसान कल्याण विभाग के डेटा का हवाला देते हुए बताया है कि 18 अगस्त को प्याज़ की औसत थोक कीमत 2,897.64 रुपये प्रति क्विंटल थी। यह कीमत एक हफ़्ते पहले की तुलना में 31.93 प्रतिशत, एक महीने पहले की तुलना में 43 प्रतिशत और एक साल पहले की तुलना में 118.37 प्रतिशत ज़्यादा थी।
प्याज़ अचानक फिर से महंगा क्यों गया है?
प्याज की कीमतों में तेजी की मुख्य वजह रबी की पुरानी फसल का स्टॉक खत्म होना और खरीफ की नई फसल की आवक में समय लगना है। मार्च-अप्रैल में तैयार होने वाली रबी प्याज देश की प्रमुख स्टोरेज फसल है, जो आमतौर पर अक्टूबर तक बाजार की मांग पूरी करती है। अब पुराने भंडार घटने से बाजार नई खरीफ फसल की सप्लाई पर निर्भर हो रहा है, जिससे कीमतों में बढ़ोतरी देखने को मिल रही है।
सप्लाई पर असर
‘द इकोनॉमिक टाइम्स’ के मुताबिक, मार्च-अप्रैल में स्टोर की गई रबी प्याज आमतौर पर अक्टूबर तक बाजार की जरूरत पूरी करती है। वहीं कर्नाटक, तेलंगाना और आंध्र प्रदेश से आने वाली शुरुआती खरीफ प्याज इस दौरान सप्लाई का सहारा बनती है। लेकिन इस साल रबी प्याज का स्टॉक तेजी से घटने के साथ उसकी गुणवत्ता भी प्रभावित हुई है, जिससे नई खरीफ फसल आने तक सप्लाई का दबाव बढ़ गया है।
मौसम का असर
क्रिसिल इंटेलिजेंस की रिपोर्ट के मुताबिक, मार्च-अप्रैल में महाराष्ट्र में हुई बेमौसम बारिश और ओलावृष्टि ने सीजन के अंत की प्याज फसल को नुकसान पहुंचाया। इसका असर स्टोरेज में रखे प्याज पर भी पड़ा। ऐसे में बाजार में केवल प्याज की उपलब्धता ही कम नहीं हुई है, बल्कि पुराने स्टॉक की गुणवत्ता भी प्रभावित हुई है, जिससे सप्लाई पर दबाव बढ़ गया है।
अगली खरीफ़ फ़सल में देरी
प्याज की कीमतों में राहत के लिए अब खरीफ फसल की आवक का इंतजार है, लेकिन इसकी शुरुआत में देरी हो रही है। ‘द इकोनॉमिक टाइम्स’ के मुताबिक, महाराष्ट्र में मानसून देर से पहुंचने के कारण खरीफ की बुआई प्रभावित हुई है। इससे नासिक से नई प्याज की सप्लाई देर से आने की संभावना है, ऐसे में दक्षिणी राज्यों से आने वाली प्याज की सप्लाई फिलहाल काफी अहम हो गई है।
प्याज की कीमतों पर मौसम का सीधा असर पड़ता है, क्योंकि सप्लाई में मामूली बाधा भी दाम में तेज उतार-चढ़ाव ला सकती है। इस बार भी बेमौसम बारिश और ओलावृष्टि ने सप्लाई चेन को प्रभावित किया है। क्रिसिल इंटेलिजेंस के मुताबिक, महाराष्ट्र में मार्च-अप्रैल की बारिश से देर से तैयार होने वाली फसल और स्टोरेज में रखे प्याज को नुकसान पहुंचा, जिससे मौजूदा कीमतों पर दबाव बढ़ा है।
सरकार के लिए प्याज़ खरीदना महंगा हुआ
केंद्र सरकार बढ़ती कीमतों पर काबू पाने के लिए प्याज का बफर स्टॉक तैयार कर रही है, लेकिन इस बार खरीद लागत भी बढ़ गई है। सरकार को मौजूदा सीजन में न्यूनतम सुनिश्चित खरीद कीमत (MAPP) सात बार बढ़ानी पड़ी है। नासिक में प्याज के बढ़ते बाजार भाव के बीच किसानों से पर्याप्त खरीद करना चुनौती बन गया है। ऐसे में सरकार के लिए स्टॉक तैयार करना और जरूरत पड़ने पर उसे बाजार में उतारना दोनों ही मुश्किल हो रहे हैं।
सरकार ने चला दिया ‘कांदा एक्सप्रेस’
केंद्र सरकार अब बढ़ती कीमतों पर लगाम लगाने के लिए अपने बफर स्टॉक का इस्तेमाल कर रही है। इसके तहत ‘कांदा एक्सप्रेस’ के जरिए नासिक से दिल्ली, चेन्नई, कोच्चि और गुवाहाटी जैसे बड़े बाजारों तक प्याज पहुंचाया जाएगा। इसका उद्देश्य उन शहरों में प्याज की सप्लाई बढ़ाना है, जहां खुदरा कीमतें राष्ट्रीय औसत से काफी ज्यादा हैं।
सरकार खुले बाज़ार में भी प्याज़ का स्टॉक उतारने की योजना बना रही है। यह पहली बार नहीं है जब सरकार ने कीमतों को काबू में रखने के लिए अपने प्याज़ के बफ़र स्टॉक का इस्तेमाल किया है। मकसद यह है कि कमी के समय स्टॉक जारी किया जाए और कीमतों में अचानक होने वाली भारी बढ़ोतरी के असर को कम किया जाए।
क्या जल्द ही प्याज़ के दाम कम होंगे?
आने वाले दिनों में प्याज की कीमतें नई फसल की आवक पर निर्भर करेंगी। ‘हिंदुस्तान टाइम्स’ के मुताबिक, विशेषज्ञों का अनुमान है कि सितंबर-अक्टूबर में प्याज के दाम अपने ऊपरी स्तर पर पहुंच सकते हैं। इस दौरान रबी का पुराना स्टॉक खत्म होने और खरीफ फसल की आवक में देरी से सप्लाई पर दबाव बना रह सकता है। ऐसे में अगले कुछ हफ्तों का मौसम कीमतों की दिशा तय करने में अहम भूमिका निभाएगा।
‘द इकोनॉमिक टाइम्स’ के मुताबिक, प्याज की कीमतों की दिशा तय करने में सितंबर का मौसम अहम रहेगा। प्याज कारोबारी दानिश शाह के अनुसार, बारिश से फसल को नुकसान हुआ तो दाम और बढ़ सकते हैं, जबकि अच्छी गुणवत्ता वाली फसल की पर्याप्त आवक से कीमतों पर दबाव कम हो सकता है। वहीं, सरकार का बफर स्टॉक तत्काल राहत दे सकता है, लेकिन आगे की स्थिति नई फसल की मात्रा और गुणवत्ता पर निर्भर करेगी।

