इस शख्स की 44 साल की कहानी आपको कभी निराश नहीं होने देगी, जिंदगी जीने का तरीका सिखाएगी

कई लोगों को लगता है कि मैं हाथों के बिना ही पैदा हुआ था. लेकिन, ये सच्चाई नहीं है. मेरा बचपन बहुत शानदार बीत रहा था. लेकिन, 7 साल की उम्र में एक हादसे ने बिना हाथों के कर दिया. मैं इसे बुरा नहीं कहूंगा. मैं तो बस ये कहता हूं कि इस हादसे के बाद मेरी लाइफ स्टाइल और काम करने का तरीका बदला. औरों से थोड़ा अलग. बस. बाकी मुझे लगता है कि मेरी ऑब्जर्वेशन पॉवर काफी बढ़ गई और मैं लोगों को ऑब्जर्व करके वही चीज बेहतर से बेहतर कर लेता हूं. मैं स्पोर्ट्स में बेहतर हूं. फुटबॉल खेलता हूं. अच्छा तैराक हूं. स्केटिंग अच्छी करता हूं. पढ़ाई ठीक-ठाक की है. समय-समय पर अलग-अलग बिजनेस ट्राई किया और बेहतर किया. समाजिक संगठनों से जुड़ा हूं और काम कर रहा हूं. और 2016 में एक नई चीज जुड़ गई कि मैं भारत का पहला बगैर हाथों वाला कार लाइसेंस होल्डर बन गया. लिम्का रिकॉर्ड में भी यह शामिल है. यह कहना है विक्रम अग्निहोत्री का.

विक्रम मध्य प्रदेश के इंदौर में रहते हैं. हमारे इस सवाल कि आपके दोनों हाथ नहीं हैं, आप क्या सोचते हैं. उस पर वह कहते हैं, “देखिए सोचूंगा क्या. मैं तो करता हूं. मैं हर वो काम कर लेता हूं जो हाथों से किया जा सकता है. मैं शेविंग करता हूं. खाना खाता हूं. गेम्स खेलता हूं. तैराक हूं. 2015 से कार भी चला रहा हूं. वोट करता हूं. कुछ भी ऐसा नहीं है जो नहीं कर सकता हूं. हां, मैं थोड़े अलग तरह से करता हूं.”

आज जो हूं उसमें मेरी मां और भाई का बहुत बड़ा रोल
विक्रम दुनिया को अलग नजर से देखते हैं. इंसानों को लेकर उनका जो अनुभव है, उस पर वह कहते हैं, “मेरे पिता पुलिस ऑफिसर रहे हैं. तो उन्होंने मुझे काफी मोटिवेट किया, लेकिन आज जो हूं उसमें मेरी मां और भाई का बहुत बड़ा रोल है. मां ने कभी मुझे आश्रित होना नहीं सिखाया. कई बार तो लोग उन्हें कहते थे कि वह कैसी हैं जो बेटे की हेल्प नहीं कर रही हैं. लेकिन, मां ने मेरी उतनी हेल्प की, जिससे मुझे दूसरों की हेल्प लेने की जरूरत न पड़े. उन्होंने मुझे सेल्फ डिपेंडेंट होना सिखाया है. उन्होंने ये सिखाया है कि हाथों के बिना भी जिंदगी सामान्य हो सकती है. मैं खाना खाता था तो वह मुझे अपने से खाना खाने के सारे ट्रिक देती थीं. मुझे चम्मच-कांटे से खाना अच्छा नहीं लगता था, मुंह से खाता था. धीरे-धीरे मैं हर चीज में फ्लेक्सिबल हो गया. इसमें मेरी ऑब्जर्वेशन पॉवर का भी काफी रोल रहा”.

अपने साथ हुए हादसे के बारे में वह कहते हैं, “मैं 7 साल का था. उस समय पिता एसपी रायगढ़ थे. एक शाम हम लोग मां के एक परिचित के घर गए थे. वहां खेलते-खेलते मैं 11 हजार वोल्ट के हाइटेंशन तार के संपर्क में आ गया था. इससे मेरे दोनों हाथ जल गए. हड्डियां गल गईं. उसके बाद मुझे बॉम्बे हॉस्पिटल में भर्ती कराया गया. तीन महीने अस्पताल रहा. इसके बाद भी हाथों को काटना पड़ा. लेकिन, मां ने हौसला नहीं हारा और मुझे भी निराश नहीं होने दिया. उन्होंने इस तरह प्रेरित किया कि मेरा कॉन्फिडेंस लेवल बढ़ा. स्ट्रेंग्थ बढ़ी. फ्लेक्सिबिलिटी आने लगी. आप कह सकते हैं कि खेल-कूद के जरिए मैं सामान्य जीवन में आने लगा.”

वह कहते हैं, “मेडिकल की भाषा में कहें तो मैं 90% डिसेबल हूं. लेकिन, इसका मतलब ये नहीं है कि मैं 90% कुछ नहीं कर सकता हूं. लेकिन, ये बस सोचने की चीज है. मैं ब्रश करता हूं. शेविंग करता हूं. नहाता हूं. कपड़े पहनता हूं. नाश्ता करता हूं. लिखता हूं. मैं सारे काम वैसे ही करता हूं जैसे दूसरे करते हैं. तो सच कहें तो मेरे अंदर डिसेबिलिटी फैक्टर है ही नहीं कुछ. मैं कइयों को कहता भी हूं कि मैं तो बस चीजें दूसरे तरह से कर रहा हूं. ये नया आविष्कार नहीं है. बस अपने तरीके से कर रहा हूं.”

दूसरों पर निर्भर ना रहूं इसलिए सीखी ड्राइविंग
वह कहते हैं, ” एक्सीडेंट के बाद आर्टिफिशियल हाथ लगाए गए थे. लेकिन, डॉक्टरों ने कहा था कि जो पर्सेंटेज ऑफ डिसेबिलिटी है, उसमें ये आर्टिफिशियल हाथ भी काम नहीं करेंगे. ऐसे में शुरू से दिमाग में ये था कि मुझे अपने तरीके से हर काम करना चाहिए. ये एक ऐसी कंडीशन है जिसमें आपको और आपके परिवार को खुद ही सीखना पड़ेगा. मेरे परिवार का भी यही लक्ष्य था कि मैं आत्मनिर्भर बनूं. बस उसी का हिस्सा कार ड्राइविंग का भी था.”

विक्रम कहते हैं, “मुझे कहीं भी जाना होता था मैं ड्राइवर या फ्रेंड पर निर्भर रहता था. ड्राइवर नहीं आया तो मेरी पूरी दिनचर्या बदल जाती थी. हालांकि अपने ऑब्जर्वेशन से मैं लोगों को देख-देख कर समझ गया था कि कैसे ड्राइविंग होती है. यहां मैं ये भी समझ गया था कि मैनुअल कार मैं चला नहीं पाऊंगा. मुझे ऑटोमेटिक कार को ही ट्राई करना होगा. साथ ही सबसे बड़ी समस्या ड्राइविंग लाइसेंस की थी.”

भाई ने मुझे हर वक्त सपोर्ट किया
वह कहते हैं, “इसके पीछे मेरी पढ़ाई ने भी काफी योगदान दिया. एक्सीडेंट के समय मैं क्लास-2 में था और मेरा भाई क्लास-3 में. घर वालों ने मुझे प्रमोट कराकर भाई के क्लास में भेज दिया. भाई ने मुझे हर वक्त सपोर्ट किया. मैं झल्लाता था. फ्रस्ट्रेशन में आता था, तो वह समझाता. मेरी मदद करता था. उसने हमेशा मेरी जिंदगी आसान की. मां ने हर समय बेहतर करने के लिए प्रेरित किया. मुझे कभी लगा ही नहीं कि मैं कमतर हूं. दूसरी चीज की मुंबई का माहौल ऐसा नहीं था कि क्लास के बच्चे किसी तरह की बात करें. सब फ्रेंडली था. वहीं मैं भी बहुत कॉन्फीडेंट होता गया. मैंने 89 में बीकॉम करने के बाद 91 में एमए किया.”

डिसेबिलिटी पर कर रहे हैं पीएचडी
वह कहते हैं, “मेरी मां कहती थीं कि मैं इतनी अच्छी बहस करता हूं तो वकील होना चाहिए था. तो मैं 23 साल बाद 2015 में एलएलबी करने लगा. अभी मैं डिसेबिलिटी पर ही पीएचडी कर रहा हूं. वह कहते हैं, एलएलबी की पढ़ाई के दौरान ही मैंने मोटर व्हीकल एक्ट को पढ़ा. उसमें ये पाया कि उसमें पैर से कार चलाने पर कोई डिस्क्वालिफिकेशन नहीं है. यानी की हाथों का न होना रोड़ा नहीं है. उसमें बस ड्राइविंग स्किल की बात है. तो मैंने ये तय किया कि गाड़ी तो मैं बेहतर चला लूंगा.”

इस तरह बना ड्राइविंग लाइसेंस
विक्रम कहते हैं, “इसके बाद 2015 मई में मैंने एक ऑटोमेटिक कार खरीदी. एक महीने में मैंने कार चलाना सीख लिया और फिर लर्नर लाइसेंस के लिए आरटीओ साहब के पास पहुंचा. लेकिन, एक मेंटल ब्लॉक होता है न कि उन्होंने मुझे देखकर ही कह दिया कि नहीं लाइसेंस नहीं मिल पाएगा. लेकिन, मैंने उन्हें कहा कि एक बार आप मेरे साथ ड्राइव पर चलिए, देख लीजिए. मैंने उन्हें कार में बैठाकर घुमाया तो वे समझ तो गए कि मुझे गाड़ी चलानी आती है. लेकिन, उनके मन में टेक्निकलिटी को लेकर संशय था.”

वह कहते हैं, “आरटीओ ने पता किया कि देश में कहीं भी कोई बिना हाथ वाले शख्स को लाइसेंस नहीं मिला है. हालांकि, बाद में उन्होंने मुझे लर्नल लाइसेंस दे दिया. ये मेरे लिए शुरुआत थी. लेकिन, उसके बाद अधिनियम में कुछ समस्या थी जिसकी वजह से टेक्निकल प्रॉब्लम आ रही थी परमानेंट लाइसेंस देने में. इसी दौरान मेरी मुलाकात नितिन गडकरी जी से हुई. मैंने उन्हें सब कुछ बताया. 15 महीने बाद 29 सितंबर 2016 को आरटीओ साहब का फोन आया. उन्होंने लर्नर लाइसेंस का स्टेट्स पूछा.

इस दौरान आरटीओ ने लिखित में रिजेक्ट कर दिया. उन्होंने कहा था कि मैं हाथ से सिग्नल नहीं दे सकता हूं और थर्ड पार्टी के लिए रिस्क हूं. मैंने उन्हें चैलेंज किया कि अब कार में इंडिकेटर होता है. हाथ से सिग्नल देना रिस्क है. दूसरा ये कि आपके पास ऐसा कहां डेटा है कि मेरे जैसे लोगों ने एक्सीडेंट किया है. मैंने कमिश्नर ट्रांसपोर्ट के ट्रिब्यूनल में चैलेंज किया. उन्होंने इसे एक्सेप्ट किया. मेरा मकसद था कि सभी दिव्यांगों को इससे मदद मिलनी चाहिए.”

लाइसेंस मिलना एक शुरुआत
वह कहते हैं, “इस दौरान 2016 में दिल्ली पर्यटन विभाग से नियमों में अमेंडमेंट हुआ. इसके बाद 30 सितंबर को मुझे पहला लाइसेंस मिला. लिम्का बुक ऑफ वर्ल्ड रिकॉर्ड ने भी इसे जगह दी है. इसके बाद काफी दिव्यांगों ने मुझसे कॉन्टेक्ट किया. अब तक 16 लोगों ने मुझसे कॉन्टेक्ट किया है.”

विक्रम बताते हैं, “मैं बचपन से मोटर स्पोर्ट्स से फैसिनेट रहता था. कार रेसिंग मुझे बहुत फैसिनेट करती थी. लाइसेंस मिलने के बाद 2017 में मैंने एक कार रैली में भाग लिया. इसी रैली में मैं अमेच्योर केटेगरी में फर्स्ट आ गया. इसके बाद डेजर्ट स्टॉर्म नाम से एक रैली होती है. 2018 में मैं इसमें प्रोफेशनल केटेगरी में सेकेंड आया.”