FCRA क्या है?
FCRA (Foreign Contribution Regulation Act) भारत का वह कानून है, जो विदेश से मिलने वाले दान, अनुदान और अन्य आर्थिक सहायता को नियंत्रित करता है। इसके तहत यह तय किया जाता है कि कौन-सी संस्था विदेशी फंड प्राप्त कर सकती है और उसका इस्तेमाल किन उद्देश्यों के लिए किया जाएगा। गृह मंत्रालय इस कानून की निगरानी करता है। सरकार का कहना है कि FCRA का उद्देश्य विदेशी फंडिंग को रोकना नहीं, बल्कि यह सुनिश्चित करना है कि बाहरी धन का उपयोग देश की सुरक्षा, संप्रभुता और सार्वजनिक हितों के खिलाफ न हो।
सरकार सख्त क्यों हुई?
सरकार का मानना है कि वैश्वीकरण के साथ विदेशी फंड का प्रवाह लगातार बढ़ा है। हालांकि शिक्षा, स्वास्थ्य और राहत कार्यों में यह मदद अहम भूमिका निभाती है, लेकिन इसके जरिए देश की नीतियों या सामाजिक माहौल को प्रभावित करने की आशंका भी रहती है। इसी कारण FCRA के तहत विदेशी धन के स्रोत और उसके उपयोग पर नजर रखी जाती है, ताकि पारदर्शिता बनी रहे और विश्वसनीय संस्थाओं पर लोगों का भरोसा मजबूत हो।
कौन विदेशी फंड नहीं ले सकता?
FCRA कानून के तहत कुछ व्यक्तियों और संगठनों को विदेशी फंड प्राप्त करने की अनुमति नहीं है। इनमें राजनीतिक दल, चुनावी उम्मीदवार, सांसद, विधायक, न्यायाधीश, सरकारी कर्मचारी और राजनीतिक गतिविधियों से जुड़े संगठन शामिल हैं। सरकार का उद्देश्य यह सुनिश्चित करना है कि इन क्षेत्रों पर किसी भी तरह का विदेशी प्रभाव न पड़े।
किसी NGO को विदेशी फंड कैसे मिलता है?
विदेशी फंड प्राप्त करने के लिए किसी संस्था को FCRA के तहत पंजीकरण या विशेष परियोजना के लिए पूर्व अनुमति (Prior Permission) लेना जरूरी होता है। विदेश से आने वाली राशि पहले SBI की नई दिल्ली स्थित निर्धारित FCRA शाखा के खाते में जमा होती है। इसके बाद संस्था जरूरत के अनुसार धनराशि को अन्य खातों में ट्रांसफर कर सकती है। FCRA पंजीकरण की वैधता पांच साल होती है, जिसके बाद इसका नवीनीकरण कराना आवश्यक है।
पहले से कौन-कौन से नियम लागू हैं?
FCRA नियमों के अनुसार, विदेशी फंड प्राप्त करने वाली संस्थाएं कुल राशि का अधिकतम 20% हिस्सा प्रशासनिक खर्चों पर ही उपयोग कर सकती हैं। शेष धनराशि को उसी कार्य या परियोजना पर खर्च करना होता है, जिसके लिए फंड मिला है। इसके अलावा संस्थाओं को हर साल ऑडिट रिपोर्ट और FC-4 फॉर्म के माध्यम से दान, प्राप्त राशि और खर्च का पूरा विवरण ऑनलाइन जमा करना अनिवार्य है।
2026 में क्या बदला?
नए नियमों में डेजिग्नेटेड अथॉरिटी (नामित प्राधिकरण) की व्यवस्था को प्रमुख बदलाव माना जा रहा है। इसके तहत यदि किसी NGO का FCRA पंजीकरण रद्द हो जाता है या उसका नवीनीकरण नहीं होता, तो विदेशी फंड से बनाई गई संपत्तियां और शेष धनराशि अस्थायी रूप से नामित प्राधिकरण के नियंत्रण में चली जाएंगी। पंजीकरण बहाल होने पर यह संपत्ति संस्था को वापस मिल सकती है, जबकि ऐसा न होने पर इसे सार्वजनिक हित में सरकारी विभागों को सौंपा जा सकता है। धार्मिक स्थलों की मूल धार्मिक पहचान बनाए रखना भी अनिवार्य रहेगा।
सुप्रीम कोर्ट ने क्या कहा?
2022 में नोएल हार्पर बनाम भारत संघ मामले में सुप्रीम कोर्ट ने FCRA के 2020 संशोधनों को बरकरार रखा। कोर्ट ने स्पष्ट किया कि विदेशी फंड प्राप्त करना किसी संस्था का मौलिक अधिकार नहीं है। राष्ट्रीय सुरक्षा और सार्वजनिक व्यवस्था को ध्यान में रखते हुए सरकार विदेशी अंशदान पर नियम और नियंत्रण लागू कर सकती है।
सरकार और NGOs की दलील
सरकार का कहना है कि FCRA का उद्देश्य विदेशी दान को रोकना नहीं, बल्कि उसमें पारदर्शिता और निगरानी सुनिश्चित करना है। नियमों का पालन करने वाली संस्थाओं के लिए विदेशी सहयोग जारी है। हालांकि, कई NGOs और विपक्षी दलों का मानना है कि सख्त नियम, बढ़ी हुई प्रक्रियाएं और नए प्रावधान छोटे संगठनों के लिए मुश्किलें पैदा कर सकते हैं, जिससे जमीनी स्तर के काम पर असर पड़ सकता है।

