Coalgate Scam: देश के सबसे चर्चित विवादों में शामिल कोयला ब्लॉक आवंटन मामला एक बार फिर चर्चा में है। साल 2012 में सामने आए इस कथित घोटाले ने तत्कालीन UPA सरकार को भारी राजनीतिक नुकसान पहुंचाया था और पूर्व प्रधानमंत्री डॉ. मनमोहन सिंह भी सवालों के घेरे में आ गए थे। अब इस मामले में सर्वोच्च अदालत के फैसले के बाद इसे लेकर नई चर्चा शुरू हो गई है।
सुप्रीम कोर्ट ने अपने अंतिम फैसले में क्या कहा?
सुप्रीम कोर्ट ने अपने फैसले में कहा कि CBI की विस्तृत जांच में पूर्व प्रधानमंत्री डॉ. मनमोहन सिंह के खिलाफ अभियोजन योग्य कोई ठोस सबूत नहीं मिला था। अदालत ने माना कि क्लोजर रिपोर्ट को खारिज करने के लिए पर्याप्त आधार नहीं थे। साथ ही, कोर्ट ने यह भी कहा कि उनके निधन के बावजूद मामले से जुड़ी टिप्पणियों और आरोपों की न्यायिक समीक्षा करना आवश्यक था, ताकि निष्पक्ष न्याय सुनिश्चित किया जा सके।
सुप्रीम कोर्ट के इस फैसले के साथ ही देश के सबसे बड़े राजनीतिक और वित्तीय विवादों में से एक ‘कोयला घोटाला’ में पूर्व प्रधानमंत्री डॉ. मनमोहन सिंह पर लगे आरोपों का अध्याय हमेशा के लिए समाप्त हो गया है।
सुप्रीम कोर्ट की तीन सदस्यीय पीठ ने CBI की क्लोजर रिपोर्ट को मंजूरी देते हुए पूर्व प्रधानमंत्री डॉ. मनमोहन सिंह समेत सभी आरोपियों को इस आपराधिक मामले में राहत दे दी। अदालत ने उन्हें आरोपों से पूरी तरह मुक्त कर दिया।
पूर्व प्रधानमंत्री डॉ. मनमोहन सिंह के निधन के बाद यह मामला केवल कानूनी प्रक्रिया तक सीमित नहीं रहा, बल्कि उनकी छवि और विरासत से भी जुड़ गया। अब सुप्रीम कोर्ट के फैसले के बाद यह जानना जरूरी हो गया है कि कोयला ब्लॉक आवंटन मामला क्या था, इसमें उनके खिलाफ क्या आरोप लगाए गए थे और अदालत ने उन्हें किस आधार पर राहत दी।
कैसे शुरू हुआ ‘कोयला घोटाला’?
कोयला ब्लॉक आवंटन विवाद की शुरुआत 2012 में हुई, जब CAG की रिपोर्ट में आवंटन प्रक्रिया पर गंभीर सवाल उठाए गए। रिपोर्ट के अनुसार, 1993 से 2010 के बीच कई कोयला खदानें बिना खुली नीलामी के कंपनियों को आवंटित की गईं। आरोप था कि पारदर्शी बोली प्रक्रिया अपनाने के बजाय स्क्रीनिंग कमेटी की सिफारिशों के आधार पर खदानों का आवंटन किया गया।
CAG की अंतिम रिपोर्ट में कहा गया था कि बिना प्रतिस्पर्धी नीलामी के कोयला ब्लॉक आवंटित किए जाने से कई निजी कंपनियों को लाभ मिला। रिपोर्ट में अनुमान लगाया गया कि इस प्रक्रिया के कारण सरकारी खजाने को करीब 1.86 लाख करोड़ रुपये का संभावित नुकसान हुआ। रिपोर्ट सामने आने के बाद यह मामला राष्ट्रीय स्तर पर बड़ा राजनीतिक मुद्दा बन गया। इसके बाद CVC और CBI ने जांच शुरू की, जबकि मामले की निगरानी न्यायपालिका करती रही। वर्ष 2014 में सुप्रीम कोर्ट ने 1993 से 2010 के बीच किए गए अधिकांश कोयला ब्लॉक आवंटनों को मनमाना और नियमों के खिलाफ मानते हुए रद्द कर दिया।
डॉ. मनमोहन सिंह का नाम इस मामले में कैसे आया?
इस मामले में डॉ. मनमोहन सिंह का नाम सीधे तौर पर जुड़ने की मुख्य वजह यह थी कि 2004 से 2009 के बीच तत्कालीन प्रधानमंत्री होने के साथ-साथ कोयला मंत्रालय का प्रभार भी उन्हीं के पास था।
तालाबीरा-II ब्लॉक आवंटन मामला (2005): इस मामले का सबसे चर्चित पहलू ओडिशा के तालाबीरा-II कोयला ब्लॉक का आवंटन था। आरोप थे कि इस ब्लॉक को हिंदाल्को इंडस्ट्रीज को देते समय एक सरकारी कंपनी के दावे को पर्याप्त महत्व नहीं दिया गया, जिससे निजी क्षेत्र को अनुचित लाभ पहुंचाने के सवाल उठे।
CBI ट्रायल कोर्ट का कड़ा रुख (2015): CBI ने शुरुआती जांच के बाद अपनी क्लोजर रिपोर्ट में डॉ. मनमोहन सिंह को राहत दी थी, लेकिन मार्च 2015 में विशेष CBI अदालत ने इस रिपोर्ट को स्वीकार करने से इनकार कर दिया। इसके बाद मामले की कानूनी प्रक्रिया आगे बढ़ी और जांच पर नए सिरे से सवाल उठे।
विशेष अदालत ने मामले में संज्ञान लेते हुए डॉ. मनमोहन सिंह, पूर्व कोयला सचिव पी.सी. पारख, कुमार मंगलम बिड़ला और हिंदाल्को से जुड़े कुछ अधिकारियों को आरोपी मानकर समन जारी किए थे। हालांकि बाद में सुप्रीम कोर्ट ने इस आदेश पर रोक लगा दी, जिसके चलते मामला लंबे समय तक कानूनी प्रक्रिया में लंबित रहा।
हिस्ट्री विल बी काइंडर टू मी”
डॉ. मनमोहन सिंह ने पूरे मामले में किसी भी तरह की गलत मंशा या आपराधिक भूमिका से इनकार किया था। उनका कहना था कि कोयला ब्लॉकों की नीलामी के पक्ष में वह शुरुआत से थे, लेकिन विभिन्न मंत्रालयों और राज्यों के बीच सहमति बनाने में समय लगा। उन्होंने यह भी कहा था कि तालाबीरा-II ब्लॉक का आवंटन स्थापित प्रशासनिक प्रक्रिया और संबंधित राज्य सरकार की सिफारिशों के आधार पर किया गया था।
जनवरी 2014 में अपनी अंतिम प्रेस कॉन्फ्रेंस के दौरान डॉ. मनमोहन सिंह ने भरोसा जताया था कि समय के साथ सच सामने आएगा और इतिहास उनके कार्यकाल का निष्पक्ष आकलन करेगा। उन्होंने कहा था कि भविष्य में उनके योगदान और फैसलों को आज की तुलना में अधिक संतुलित नजरिए से देखा जाएगा।

