भारत में बढ़ते साइबर फ्रॉड के बीच सरकार ने बड़ा खुलासा किया है. गृह मंत्रालय के मुताबिक, I4C और 1930 हेल्पलाइन की मदद से अब तक 32.80 लाख शिकायतों में 11,158 करोड़ रुपये से ज्यादा रकम बचाई गई है.

भारत में साइबर ठगी के मामले तेजी से बढ़ रहे हैं. हर दिन हजारों लोग फर्जी कॉल, ऑनलाइन लिंक, इंवेस्टमेंट के झांसे और डिजिटल पेमेंट फ्रॉड का शिकार हो रहे हैं. कई बार लोगों की पूरी जीवनभर की जमा पूंजी कुछ ही मिनटों में ठगों के खातों में पहुंच जाती है. ऐसे में सबसे बड़ा सवाल यह होता है कि अगर समय रहते शिकायत कर दी जाए तो क्या पैसा वापस मिल सकता है? इसी सवाल का जवाब केंद्र सरकार ने संसद में दिया है.
गृह मंत्रालय ने लोकसभा में बताया कि साइबर ठगी रोकने के लिए बनाए गए इंडियन साइबर क्राइम कोऑर्डिनेशन सेंटर (I4C) और 1930 हेल्पलाइन की मदद से अब तक 32.80 लाख यानी हर रोज लगभग करीब 1700 शिकायतों में लोगों के 11,158 करोड़ से ज्यादा रुपये की रकम ठगों के पास जाने से बचाई गई है. सरकार का कहना है कि साइबर अपराध से निपटना राज्यों की जिम्मेदारी है, लेकिन केंद्र सरकार तकनीकी मदद, प्रशिक्षण और नई व्यवस्था तैयार कर राज्यों की सहायता कर रही है.

डिजिटल प्लेटफॉर्म शुरू किए
इसी दिशा में I4C बनाया गया है, जहां बैंक, टेलीकॉम कंपनियां, पेमेंट कंपनियां और जांच एजेंसियां मिलकर साइबर ठगी रोकने का काम करती हैं. गृह मंत्रालय के अनुसार, सिर्फ पैसे बचाने तक ही काम सीमित नहीं है, बल्कि लाखों फर्जी सिम, मोबाइल हैंडसेट, बैंक खातों और साइबर अपराधियों की पहचान कर उन पर कार्रवाई भी की जा रही है. संसद में पेश किए गए आंकड़े बताते हैं कि साइबर अपराध के खिलाफ सरकार ने कई नए डिजिटल प्लेटफॉर्म शुरू किए हैं, जिनका मकसद शिकायत दर्ज कराने से लेकर जांच और कार्रवाई तक की प्रक्रिया को तेज करना है.
सरकार ने क्या-क्या बताया?
32.80 लाख शिकायतों में 11,158 करोड़ से ज्यादा रुपये बचाए गए.
15.75 लाख सिम कार्ड और 5.77 लाख IMEI ब्लॉक किए गए.
30.48 लाख संदिग्ध पहचान और 32.08 लाख म्यूल बैंक खाते चिन्हित किए गए, जिससे 25,698 करोड़ रुपये के संदिग्ध लेनदेन रोके गए.
29,837 से ज्यादा आरोपियों की गिरफ्तारी में मदद मिली.
1930 हेल्पलाइन कैसे करती है मदद?
गृह मंत्रालय ने बताया कि सिटीजन फाइनेंशियल साइबर फ्रॉड रिपोर्टिंग एंड मैनेजमेंट सिस्टम (CFCFRMS) को 2021 में शुरू किया गया था. इसका उद्देश्य यह है कि जैसे ही किसी व्यक्ति के साथ ऑनलाइन ठगी हो, वह तुरंत 1930 हेल्पलाइन या राष्ट्रीय साइबर अपराध रिपोर्टिंग पोर्टल पर शिकायत दर्ज करा सके. अगर शिकायत समय पर दर्ज हो जाए तो बैंक और दूसरी एजेंसियां मिलकर ठगी की रकम को आगे ट्रांसफर होने से रोकने की कोशिश करती हैं. मंत्रालय के अनुसार, इसी व्यवस्था की वजह से अब तक हजारों करोड़ रुपये बचाए जा सके हैं.
फर्जी सिम और बैंक खातों पर भी कार्रवाई
साइबर ठग अक्सर फर्जी सिम और दूसरे लोगों के बैंक खातों का इस्तेमाल करते हैं. इसे रोकने के लिए सरकार ने सस्पेक्ट रजिस्ट्री बनाई है. संसद में दी गई जानकारी के मुताबिक, 30 जून 2026 तक 15.75 लाख से ज्यादा सिम कार्ड, 5.77 लाख IMEI ब्लॉक किए गए. इसके अलावा 30.48 लाख संदिग्ध पहचान और 32.08 लाख म्यूल बैंक खातों की जानकारी साझा की गई, जिससे 25,698 करोड़ रुपये के संदिग्ध लेनदेन रोके गए.
ठगी के शिकार लोगों को जल्दी मिलेगा पैसा
गृह मंत्रालय ने साइबर ठगी की शिकायतों के निपटारे को तेज और एक जैसा बनाने के लिए नया स्टैंडर्ड ऑपरेटिंग प्रोसीजर (SOP) लागू किया है. इसके तहत शिकायत दर्ज होने से लेकर बैंकों के साथ समन्वय, पीड़ितों की शिकायतों का समाधान, खातों पर लगी रोक हटाने और ठगी गई रकम सही व्यक्ति को वापस दिलाने तक की पूरी प्रक्रिया तय की गई है. अप्रैल 2026 से मनी रेस्टोरेशन मॉड्यूल शुरू किया गया है, जिससे ठगी का पैसा जल्दी लौटाया जा सके. वहीं ग्रिवेंस रिड्रेसल मॉड्यूल बैंक खाते फ्रीज होने या खाते पर लगी रोक से जुड़ी शिकायतों का जल्द निपटारा करता है.
सिर्फ कार्रवाई नहीं, पुलिस को भी मिल रही ट्रेनिंग
गृह मंत्रालय ने बताया कि साइबर अपराध की जांच बेहतर बनाने के लिए पुलिस और न्यायिक अधिकारियों को लगातार प्रशिक्षण दिया जा रहा है. CyTrain पोर्टल के जरिए 1.63 लाख से ज्यादा अधिकारियों का रजिस्ट्रशन हुआ है और 1.61 लाख से ज्यादा सर्टिफिकेट जारी किए गए हैं. वहीं, साइबर कमांडो प्रोग्राम के तहत 281 साइबर कमांडो ट्रेंड किए जा चुके हैं. इसके अलावा प्रतिबिम्ब (Pratibimb) मॉड्यूल और समन्वय (Samanvaya) प्लेटफॉर्म राज्यों की पुलिस को अलग-अलग राज्यों में जुड़े साइबर अपराधियों तक पहुंचने में मदद कर रहे हैं. पुलिस के लिए साइबर अपराधियों की जानकारी और जांच में मदद देने वाले प्लेटफॉर्म. इनके जरिए 29,837 से ज्यादा गिरफ्तारियां हुई.
साइबर जांच में पुलिस को मिल रही मदद
नेशनल-डिजिटल इन्वेस्टिगेशन सपोर्ट सेंटर (National- Digital Investigation Support Centre), जिसे पहले नेशनल साइबर फॉरेंसिक लेबोरेटरी (इन्वेस्टिगेशन) कहा जाता था, I4C के तहत नई दिल्ली (2019) और असम (2025) में स्थापित किया गया है. इसका उद्देश्य राज्यों और केंद्रशासित प्रदेशों की पुलिस के जांच अधिकारियों (IOS) को साइबर अपराध के मामलों में शुरुआती स्तर पर डिजिटल फॉरेंसिक और जांच संबंधी सहायता देना है. 30 जून 2026 तक नई दिल्ली स्थित केंद्र ने साइबर अपराध के 14,064 से अधिक मामलों में राज्यों और केंद्रशासित प्रदेशों की कानून प्रवर्तन एजेंसियों (LEAs) की मदद की है.
जागरूकता कैसे बढ़ाई जा रही है?
सरकार साइबर ठगी से बचाव के लिए 1930 हेल्पलाइन, CyberDost सोशल मीडिया अकाउंट, SMS, टीवी- रेडियो, स्कूल अभियान, सिनेमा हॉल, IPL, MyGov, मेट्रो स्टेशन, रेलवे स्टेशन और एयरपोर्ट जैसे कई माध्यमों से लोगों को लगातार जागरूक कर रही है.

