विपक्ष ने पिछले दो साल के चुनाव रद्द कराकर दोबारा मतदान कराने की मांग की है. क्या बंगाल, महाराष्ट्र समेत राज्यों में फिर चुनाव संभव हैं? जानिए संविधान और कानून के प्रावधान.

विपक्ष ने पिछले दो साल में हुए चुनावों को रद्द करके दोबारा मतदान कराने की मांग उठाई है. इसमें लोकसभा चुनाव के साथ बंगाल, महाराष्ट्र और हरियाणा समेत अलग-अलग राज्यों के चुनाव भी शामिल हैं. कांग्रेस अध्यक्ष मल्लिकार्जुन खड़गे ने बैलेट पेपर से चुनाव कराने की मांग भी की है. राहुल गांधी ने 2024 के लोकसभा चुनाव की निष्पक्षता पर सवाल उठाए हैं. आइए जानते हैं विपक्ष ने चुनाव रद्द करने की मांग क्यों की है? क्या आठ राज्यों में दोबारा चुनाव कराना संभव है? और भारतीय कानून इस बारे में क्या कहता है?
- विपक्ष ने चुनाव रद्द करने की मांग क्यों की?
कांग्रेस और INDIA गठबंधन के नेताओं का आरोप है कि मतदाता सूची में बदलाव, वोटरों के नाम हटाने और EVM के इस्तेमाल में गड़बड़ी के जरिए चुनावों को प्रभावित किया गया. 25 अक्टूबर को बिहार के पटना में एक कार्यक्रम में कांग्रेस अध्यक्ष मल्लिकार्जुन खड़गे ने पिछले दो साल में हुए सभी विधानसभा चुनाव रद्द करने की मांग की. उन्होंने पश्चिम बंगाल, हरियाणा, बिहार और महाराष्ट्र का नाम लेते हुए आरोप लगाया कि इन राज्यों में जनादेश चुराकर सरकारें बनाई गईं. उन्होंने SIR पर भी रोक लगाने की मांग की. उनका कहना है कि जिन मतदाताओं के नाम गलत तरीके से हटाए गए हैं, उन्हें दोबारा जोड़ा जाए. साथ ही भविष्य के चुनाव बैलेट पेपर से कराए जाएं.
इससे पहले INDIA गठबंधन के नेताओं ने राष्ट्रपति द्रौपदी मुर्मू को ज्ञापन देकर मुख्य चुनाव आयुक्त ज्ञानेश कुमार को पद से हटाने, SIR रोकने, हटाए गए 13.30 करोड़ मतदाताओं के नाम बहाल करने और बैलेट पेपर से चुनाव कराने की मांग की थी. ज्ञापन में हरियाणा, महाराष्ट्र, मध्य प्रदेश, छत्तीसगढ़, बिहार, दिल्ली और पश्चिम बंगाल के विधानसभा चुनावों में गड़बड़ी का आरोप लगाया गया था.
31 अक्टूबर को राहुल गांधी ने 2024 के लोकसभा चुनाव को भी ‘अवैध’ बताया. उनका आरोप था कि SIR के दौरान 13.3 करोड़ मतदाताओं के नाम हटाए गए, जो देश के कुल मतदाताओं का करीब 15% है. उन्होंने कहा कि 2024 के लोकसभा चुनाव में जीत का अंतर करीब 3% था, इसलिए इतने बड़े पैमाने पर नाम हटने से चुनाव के जनादेश पर सवाल उठता है.
- क्या इन राज्यों में दोबारा चुनाव हो सकता है?
कानून में दोबारा चुनाव कराने का रास्ता है, लेकिन सभी राज्यों के चुनाव एक साथ रद्द करना आसान नहीं है. इसके लिए चुनाव में गड़बड़ी के आरोपों को कानूनी प्रक्रिया के तहत साबित करना होगा. किसी पार्टी या गठबंधन के आरोप लगाने से चुनाव अपने आप रद्द नहीं हो जाता. इसके लिए अदालत का फैसला या चुनाव प्रक्रिया के दौरान चुनाव आयोग की ओर से कानून के तहत लिया गया फैसला जरूरी है.
चुनाव आयोग को संविधान के अनुच्छेद 324 के तहत लोकसभा और विधानसभा चुनाव कराने, वोटर लिस्ट तैयार कराने और चुनाव प्रक्रिया पर निगरानी रखने का अधिकार है. अगर वोटिंग के दौरान किसी बूथ पर हिंसा, बूथ कैप्चरिंग या दूसरी गंभीर गड़बड़ी होती है, तो कानून के तहत उस बूथ या प्रभावित क्षेत्र में दोबारा वोटिंग कराई जा सकती है. लेकिन यह अधिकार पूरे राज्य के चुनाव को बिना कानूनी आधार के रद्द करने का खुला अधिकार नहीं है.
दूसरी स्थिति चुनाव नतीजे आने के बाद की है. अगर किसी उम्मीदवार के चुनाव को चुनौती देनी है, तो उसके खिलाफ हाईकोर्ट में चुनाव याचिका दाखिल करनी होती है. अदालत सबूतों और दलीलों की जांच के बाद तय करती है कि चुनाव में ऐसी गड़बड़ी हुई थी या नहीं, जिससे नतीजा प्रभावित हुआ.
इसलिए राज्यों में दोबारा चुनाव तभी संभव होगा, जब संबंधित चुनावों को कानूनी रूप से चुनौती दी जाए और अदालत या सक्षम चुनाव प्राधिकरण को दोबारा मतदान कराने का आधार मिले. सिर्फ राजनीतिक मांग के आधार पर इन राज्यों की सरकारों को हटाकर फिर से चुनाव नहीं कराए जा सकते.
- क्या कहता है कानून?
भारत में चुनाव रद्द करने और दोबारा कराने के लिए संविधान और जनप्रतिनिधित्व कानून, 1951 में प्रावधान हैं. इनके तहत पूरी प्रक्रिया तय की गई है.
- संविधान का अनुच्छेद 329 (बी): इसके मुताबिक संसद या विधानसभा के चुनाव को अदालत में चुनौती देने के लिए चुनाव याचिका दाखिल करनी होती है. चुनाव प्रक्रिया को सीधे सामान्य याचिका के जरिए रद्द कराने का रास्ता नहीं है.
- जनप्रतिनिधित्व कानून की धारा 80 और 81: धारा 80 कहती है कि चुनाव को चुनौती सिर्फ चुनाव याचिका के जरिए दी जा सकती है. धारा 81 के तहत उम्मीदवार या उस क्षेत्र का कोई मतदाता नतीजा घोषित होने के 45 दिनों के भीतर हाईकोर्ट में याचिका दाखिल कर सकता है.
- धारा 100: किन हालात में चुनाव रद्द हो सकता है? इस धारा के तहत हाईकोर्ट किसी उम्मीदवार का चुनाव रद्द कर सकता है, अगर वह चुनाव लड़ने के योग्य नहीं था, उसके या उसके चुनाव एजेंट ने भ्रष्ट तरीके अपनाए, किसी उम्मीदवार का नामांकन गलत तरीके से खारिज किया गया या वोटों की गिनती और मतदान में ऐसी गड़बड़ी हुई जिससे चुनाव का नतीजा प्रभावित हुआ. संविधान या चुनाव कानून के नियमों का उल्लंघन भी कुछ स्थितियों में चुनाव रद्द करने का आधार बन सकता है.
क्या पूरे राज्य का चुनाव रद्द हो सकता है?
सुप्रीम कोर्ट ने इंद्रजीत बरुआ बनाम चुनाव आयोग मामले में स्पष्ट किया था कि विधानसभा चुनाव को एक इकाई मानकर चुनौती नहीं दी जा सकती. चुनाव कानून के तहत हर विधानसभा सीट का चुनाव अलग माना जाता है. अगर किसी राज्य की सभी सीटों पर एक जैसी गड़बड़ी का आरोप है, तब भी संबंधित सीटों के चुनाव को अलग-अलग चुनौती देनी होगी.

इसका मतलब है कि किसी राज्य की सभी सीटों पर दोबारा चुनाव कराने के लिए हर सीट के चुनाव को कानूनी रूप से चुनौती देने और गड़बड़ी साबित करने की जरूरत पड़ सकती है. एक राज्य के सभी नतीजे या कई राज्यों की सरकारें सिर्फ पॉलिटिकल मांग के आधार पर रद्द नहीं की जा सकतीं.

