नीतीश ने खेला वोट बैंक का दांव ? क्या भूमिहारों के हाथ से जमीन गई और पैसा भी ?

कहा जाता है, भूमिहार वह जाति है, जिससे भूमि भी ह है. भूमिहार जहां कहीं भी रहे हर क्षेत्र में वे अव्वल हैं. धन-संपदा, ज़मीन-जायदाद और पढ़ाई-लिखाई में भी. इसलिए इन आँकड़ों को कोई भी हज़म नहीं कर पा रहा. बिहार में कई बेगूसराय, मुजफ्फरपुर, मोकामा जैसे कई क्षेत्र हैं, जोकि भूमिहार बहुल है. इसलिए भूमिहार व साधने के लिए यह पत्ता फेंका गया है.

मंगलवार को बिहार विधान सभा में जातिगत गरीबी के आंकड़ों की रिपोर्ट रखी गई. इस रिपोर्ट के अनुसार बिहार के सामान्य वर्ग में सबसे गरीब भूमिहार जाति के लोग हैं. गरीबी में यादवों के बाद इनका नंबर है. यादवों में 37 फीसदी गरीब हैं. जबकि सामान्य वर्ग में भूमिहार सबसे ज़्यादा 25.32 फीसदी गरीब हैं. ब्राह्मण 25 फीसदी और राजपूत आबादी में गरीबी का प्रतिशत 24.89 है.

बिहार में कायस्थों की स्थिति अधिक बेहतर है. उनके यहां गरीबी का प्रतिशत 13.89 है. कोई भी इस रिपोर्ट को मानने को तैयार नहीं है. खुद भूमिहार भी यह स्वीकार नहीं कर पा रहे हैं. यह लगभग असंभव-सी प्रतीत होने वाली बात है कि बिहार की सामान्य जातियों में सबसे खराब आर्थिक स्थिति भूमिहारों की होगी.

भूमिहारों ने जमींदारी राजपूतों से ले ली

1757 में प्लासी की लड़ाई में बंगाल के नवाब सिराजुद्दौला की हार के बाद ईस्ट इंडिया कम्पनी ने बंगाल सूबे की दीवानी (राजस्व वसूली) का काम अपने हाथ में लिया था. इसके कुछ कुछ सालों बाद 1793 में लॉर्ड कार्नवलिस ने तत्कालीन बंगाल सूबा (बिहार, बंगाल और ओडीशा) में स्थायी बंदोबस्त (Parmanent Settlement) प्रणाली लागू कर राजस्व वसूलनी शुरू की तो पहले के राजपूत जागीरदार नगद वसूली में कामयाब नहीं हो पाए. उस वक्त भूमिहार आगे आए और उन्होंने नगद रुपए दे कर जागीरदरियां खरीद लीं.

भूमिहार भारत के जातीय पायदान में ब्राह्मणों से नीचे और राजपूतों से ऊपर माने गए हैं. इन्हें अयाचक ब्राह्मण बताया गया है. अर्थात् वे ब्राह्मण, जिन्होंने पुरोहिताई कर्म को नकार दिया. लगभग सभी जगह ये अयाचक ब्राह्मण संपन्न हैं और इन्हें एक योद्धा जाति के तौर पर देखा गया है. लेकिन बिहार में इनकी स्थिति बहुत मजबूत समझी जाती रही है.

गरीबी में भी नीतीश कुमार का दांव

बिहार के मुख्यमंत्री नीतीश कुमार आरक्षण का एक नया दांव खेल रहे हैं. उन्होंने एससी-एसटी और ओबीसी के लिए 65 प्रतिशत आरक्षण की घोषणा की है. यह भी कहा है कि सामान्य वर्ग के गरीबों के 10 प्रतिशत आरक्षण को जोड़ कर इसे 75 प्रतिशत तक किया जाएगा बढ़ाया जाएगा. जातिगत जनगणना के बाद उन्होंने यह नया दांव खेला है. उन्होंने सामान्य वर्ग को अपने साथ लाने के लिए सामान्य वर्ग के बीच परस्पर द्वन्द को बढ़ाने की कोशिश की है. चूंकि बेगूसराय, मुजफ़्फ़रपुर, मोकामा में भूमिहार बहुत मजबूत हैं और संख्या बल में भी अधिक, इसलिए भूमिहार वोट साधने के लिए उन्होंने यह पत्ता फेंका है

इतिहास बताता है बिहार में हिंदुओं की सवर्ण जातियों में भूमिहार और राजपूत बराबर की दबंग जातियां रही हैं. इसके विपरीत ब्राह्मण वहां कमजोर रहे हैं. किंतु जातिगत जनगणना में बिहार सरकार के आंकड़ों ने ब्राह्मण को सबसे आगे 3.65 पर्सेट बताया. उनके बाद राजपूत (3.45) और फिर भूमिहार (2.86) हैं.

शिक्षा और राजनीति में अग्रणी रहे भूमिहार

गरीबी और जनसंख्या के ये सारे आंकड़े परंपरा से मेल नहीं खाते. प्रसन्न कुमार चौधरी ने अपनी किताब में बताया है कि स्थायी बंदोबस्त प्रणाली लागू होने के बाद से भूमिहारों ने खूब जमीनें अर्जित कीं. बंगाल सूबे में उस समय 96 हजार जमींदार थे, इनमें से 38 हजार जमींदारी भूमिहारों, कायस्थों और राजपूतों के पास थीं. ऐसी स्थिति में उन्हें कमजोर कैसे माना जाए ! बिहार में भूमिहार और राजपूत राजनीतिक रूप से भी बहुत प्रबल रहे हैं. श्रीकृष्ण सिंह, जिन्हें श्री बाबू कहा जाता था भूमिहार जाति से थे और उनके डिप्टी अनुग्रह नारायण सिंह राजपूत थे.

इन दोनों की जोड़ी ने 1947 से 1961 तक बिहार में एकछत्र राज किया. बिहार में ब्राह्मण राजनीतिक तौर पर श्री बाबू के निधन के बाद मजबूत हुए, जब विनोदानंद झा बिहार के मुख्यमंत्री बने. भूमिहारों और राजपूतों की इस ताकत के पीछे शिक्षा के क्षेत्र में उनका अग्रणी होना था. श्री बाबू आजादी के पहले भी कांग्रेस के शक्तिशाली नेता थे. वे 1938 में जब असेंबली बनीं और चुनाव हुए तब भी वे बिहार के मुख्यमंत्री थे.

आजादी के बाद नये जमींदार बने यादव, कुर्मी और कोइरी

आजादी के बाद जमींदारी उन्मूलन और भूमि सुधार कानूनों के चलते जमीनें इनके हाथ से खिसक गईं. इसके बाद यादव, कुर्मी और कोइरी जातियों ने अपने श्रम और लगन के बूते उन्होंने परती जमीनों को भी उपजाऊ बनाया. एक तरह से कहा जाए, तो गांवों में इनका प्रभाव अगड़ी जातियों से कहीं अधिक था. कायस्थ और ब्राह्मण तथा व्यापारी जातियां गांवों से निकल गईं. अब जमीन को लेकर वहां कुछ प्रबल जातियां बचीं भूमिहार, राजपूत, यादव और कुर्मी. जितने भी भूमि संघर्ष हुए वे इन्हीं जातियों के बीच हुए.

1967 के बाद बिहार में कांग्रेस कमजोर पड़ने लगी और मध्यवर्ती व पिछड़ी जातियों की राजनीतिक लालसा उभरने लगी. अब कांग्रेस में श्री बाबू जैसा कोई नेता सवर्ण जातियों के बीच नहीं था. अनुग्रह नारायण सिंह के बेटे सत्येंद्र नारायण सिन्हा कांग्रेस को मजबूत नहीं कर सके. इसी बीच इंदिरा गांधी ने अर्ध शहरी हो चुके ब्राह्मणों व कायस्थों पर भरोसा किया लेकिन इन जातियों के नेता भी कांग्रेस को मज़बूत नहीं कर सके.

क्या हुआ जब सत्ता से कांग्रेस बाहर हुई ?

नतीजा यह हुआ कि 1989 के बाद बिहार में कांग्रेस सत्ता से बाहर हो गई. और इसी के साथ भूमिहार, राजपूत और कायस्थ जातियों के नेता भी सत्ता से बेदखल हो गए. इसी के साथ 1975 से आज तक बिहार में जो भूमि संघर्ष हुए उनमें दलितों का सर्वाधिक उत्पीड़न हुआ. उन्हें भूमिहार और राजपूत जैसी सामंती दबंग जातियां भी मारतीं और यादव, कुर्मी व कोइरी भी. बिहार का सबसे चर्चित हत्याकांड बेलछी था, जिसमें 14 दलितों को कुर्मी जाति के भूमिधरों ने मार दिया था.

इसके तीन साल बाद राजधानी पटना के ही एक गांव पीपरा में ओबीसी जाति के दबंगों ने 14 दलितों की हत्या की. दंवार बिहटा में अगड़ी जाति के दबंग लोगों ने 22 दलितों की हत्या कर दी. कुछ ही वर्ष बाद 1987 में पिछड़ी जाति के ही एक समुदाय ने दलेलचक भगौरा में कमजोर तबके के 52 लोगों को मार दिया था. 1989 में जनाबाद GF के नोंही – नागवान ज़िले में 18 पिछड़ी जाति के लोगों और दलितों की हत्या कर दी गई.

MCC के निशाने पर रहे भूमिहार

भूमि संघर्ष के निशाने पर दलित ही आते रहे. वर्ष 1991 में जब लालू यादव की सरकार थी उस समय पटना जिले के तिस्खोरा में 15 और भोजपुर ज़िले के देव-सहियारा में 15 दलितों की हत्या कर दी गई. यह वह कालखंड था, जब माओवादी प्रबल होने लगे थे. उनके निशाने पर भूमिहार थे. 12 फरवरी 1992 को माओवादियों ने भूमिहार जाति के 35 लोगों की हत्या कर दी थी. माओवादियों (MCC) ने अत्यंत निर्मम तरीके से इनकी हत्या की.

माओवादियों के दस्ते ने इनकी गला रेत कर हत्या की. MCC में अधिकांश यादव थे, इसलिए इसे भूमि संघर्ष नहीं बल्कि जाति संघर्ष कहा गया. इनके निशाने पर सिर्फ भूमिहार थे. इसके चार साल बाद 1996 में भोजपुर जिले के बथानी टोला गांव में दलित, मुस्लिम और पिछड़ी जाति के 22 लोगों को मार दिया गया. इसके 23 अभियुक्तों को बरी कर दिया गया था.

रणवीर सेना ने मोर्चा संभाला

इसी बीच 1984 में रणवीर सेना का गठन हुआ. इसके गठन के पीछे भोजपुर के भूमिहार ही आगे थे. वे भाकपा (माले) की आर्थिक नाकाबंदी से परेशान थे. अपनी जमीन जोत-बो नहीं सकते. किसानी के अलावा भूमिहारों के पास और कोई विकल्प नहीं था. अन्य सवर्ण जातियां, ब्राह्मण, राजपूत और कायस्थों ने 1980 से ही बिहार से पलायन करना शुरू कर दिया था. अथवा वे बिहार के शहरी क्षेत्रों की तरफ निकल गया था.

एक तरह से किसानी उनका अब प्रथम विकल्प नहीं था. लेकिन भूमिहारों का गरीब तबका इस नाकाबंदी को बुरी तरह झेल रहा था. इसलिए भाकपा (माले) के लिबरेशन गुट को काउंटर करने के लिए उन्होंने रणवीर सेना बना ली. ब्रह्मेश्वर मुखिया इसके अध्यक्ष बने. सरथुआ गांव में मुशहर जाति के पांच लोगों की हत्या कर दी गई. इसमें रणवीर सेना का नाम आया. बिहार सरकार ने आनन- फानन में इसे प्रतिबंधित कर दिया.

अदालत के खर्चों में निपटे भूमिहार

लेकिन 1997 में इस प्रतिबंधित सेना ने जहानाबाद के लक्ष्मण पुर बाथे गांव में 61 लोगों की हत्या कर दी. इनमें अधिकतर दलित और पिछड़ी जातियों के लोग थे. किंतु पुलिस साक्ष्य नहीं तलाश कर सकी और सभी 26 अभियुक्तों को हाई कोर्ट ने बरी कर दिया. लेकिन 1999 में जहानाबाद के सेनारी गांव में 35 लोग मार दिए गए, इनमें अधिकतर भूमिहार थे.

किंतु याद रखना चाहिए कि शंकरबिघा में 23 और नारायण पुर में 11 दलित मारे गए थे. औरंगाबाद के मियाँपुर गांव में 35 दलितों को मारा गया था. इसके अभियुक्त हाई कोर्ट से बरी हो गए थे. जबकि निचली अदालत ने उन्हें उम्रकैद दी थी. अपनी जाति के अभियुक्तों को बरी कराने में भूमिहारों को अपनी जमीनें बेचनी पड़ीं और इस जाति के अधिकांश लोग भूमिहीन होते गए.

किंतु याद रखना चाहिए कि शंकरबिघा में 23 और नारायण पुर में 11 दलित मारे गए थे. औरंगाबाद के मियाँपुर गांव में 35 दलितों को मारा गया था. इसके अभियुक्त हाई कोर्ट से बरी हो गए थे. जबकि निचली अदालत ने उन्हें उम्रकैद दी थी. अपनी जाति के अभियुक्तों को बरी कराने में भूमिहारों को अपनी जमीनें बेचनी पड़ीं और इस जाति के अधिकांश लोग भूमिहीन होते गए.

गांवों से पलायन में भी भूमिहार चूके

ब्राह्मण और कायस्थ 1970 के दशक से ही बिहार छोड़ कर कलकत्ता, मुंबई और दिल्ली जाने लगे थे. 1980 के बाद से राजपूतों ने भी शहरों पर भरोसा किया. लेकिन भूमिहार इस चातुर्य में पिछड़ गए. वे अपनी जमीनों से ऐसे चिपके कि गांव में नये पनपते जमींदारों से वे मात खाने लगे. पिछले 40-45 वर्षों के भूमि संघर्ष और जाति संघर्ष के चलते उनका पैसा खर्च ही हुआ और वे कमा नहीं पाए. नतीजा यह है कि भूमिहार इस सच्चाई को मानें या न मानें, वे अब बिहार में आर्थिक और राजनीतिक रूप से कमजोर पड़ते जा रहे हैं.

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